Saturday, July 20, 2019

बाल कथा : एकता का अस्पताल

बाल कथा
एकता का अस्पताल
ब्रजेश कानूनगो

एकता का नया घर बहुत सुंदर स्थान पर था। सामने खुला मैदान था और दूर पहाड़ियाँ नजर आती थीं। शाम को जब सूरज पहाड़ियों की ओट में छिपने लगता तो एकता बहुत देर तक प्रकृति के इस सौंदर्य  को निहारती रहती।

सैकड़ों तोते, कबूतर और अन्य पक्षी सांझ ढले रोज पहाड़ियों की ओर जाते तो एकता को उन्हें निहारना बहुत अच्छा लगता था।

एकता के घर के ऊपर से बिजली के तार भी होकर निकलते थे। शाम को जब पक्षी बहुत नीचे से गुजरते तो एक न एक पक्षी रोज ही तारों से टकराकर घायल हो जाता और दम तोड़ देता। एकता को बहुत दुख होता पर वह कर ही क्या सकती थी।

ऐसे ही एक दिन शाम को एकता अपने घर की खिड़की से पक्षियों को उड़ते देख रही थी कि तोते का एक बच्चा बिजली के तारों से टकराकर सड़क पर आ गिरा।

एकता ने देखा वह मरा नहीं था। वह तुरंत दौड़कर सड़क पर आई। तोते के बच्चे पर उसने पानी छिड़का और उठाकर अपने साथ घर में ले गई। तोते के घावों पर उसने मरहम पट्टी की और कमरे के एक कोने में बैठा दिया।

दूसरे दिन उसने अपने पापा से कह कर बाजार से एक पिंजरा मंगवाया और तोते को उसमें बंद कर दिया।

एकता रोज उसे हरी मिर्च खिलाती। बिस्कुट खिलाती। पानी का सिकारा भरकर पिंजरे में रखती।
उसका अकेलापन तोते को पाकर बहुत कुछ कम हो गया था। उसे रोज 'राम-राम' बोलना सिखाने का प्रयास करती।



एक रात जब वह सो रही थी तो अचानक उसे लगा जैसे वह अपने मम्मी पापा से बिछड़ गई है और एक तोते के बच्चे में बदल गई है। किसी शैतान बच्चे ने उसे एक पिंजरे में बंद कर रखा है।

वह घबरा गई ।नींद में ही उसके मुंह से चीख निकल गई। 'मम्मी...' । चीख सुनकर उसके मम्मी पापा भी जाग गए। एकता ने अपना डरावना सपना उन्हें सुनाया।

पापा ने उसे समझाया कि तोते के बच्चे को कैद करके जहां उसे एक दोस्त मिला है वहीं उसके मन में उसे कैद कर लेने का दुख भी सता रहा है। यही कारण है कि उसे ऐसा बुरा सपना दिखाई दिया।

सुबह उठकर एकता ने तोते को पिंजड़े से आजाद कर दिया। अब एकता रोज शाम को खिड़की के खिड़की में बैठकर तोतों को आसमान से गुजरते देखती है। कभी कोई पक्षी तारों से टकराकर गिरता तो उसकी देखभाल और इलाज करती है। स्वस्थ  हो जाने पर पुनः आकाश में स्वच्छंद विचरण करने के लिए आजाद कर देती है। उसका पिंजरा पक्षियों का कैदखाना नहीं बल्कि एक छोटा सा अस्पताल बन गया था जिसकी डॉक्टर  एकता थी।

ब्रजेश कानूनगो

No comments:

Post a Comment