Friday, July 26, 2019

बालकथा : बड़ी बात


बालकथा
बड़ी बात

दीपक के घर का बहुत सा काम सीताबाई करती थी। सीताबाई दीपक के यहां काम करने वाली महरी थी। सीताबाई का एक बेटा भी था, जिसकी उम्र दीपक के बराबर ही थी। उसका नाम चुन्नीलाल था लेकिन सब उसे चुन्नू ही कहते थे। 

चुन्नू के बापू किसी कारखाने में काम करने जाते थे, इसलिए सीताबाई चुन्नू को घर पर अकेला नहीं छोड़ती थी और अपने साथ दीपक के यहां ले जाती थी। 
चुन्नू दीपक को अपने खिलौनों से खेलते देखता, उसकी इच्छा भी होती कि वह भी दीपक के साथ खेले। चुन्नू दीपक के किसी खिलौने को हाथ लगाने लगता तो दीपक चिल्लाकर बोलता 'उसे हाथ मत लगाओ वह मेरा है' 

दीपक को अपनी चीजों से बड़ा लगाव था। वह केवल चुन्नू ही नहीं, किसी भी दोस्त को अपनी चीजों को हाथ नहीं लगाने देता था। 

दीपक की मम्मी ने उसे कई बार समझाने की कोशिश करी थी  कि बार-बार 'मेरी है या मेरा है' कहना अच्छी बात नहीं होती है लेकिन दीपक पर इसका कोई असर नहीं होता था। 

एक दिन जब दीपक के स्कूल की छुट्टी हुई तो उसने देखा कि आकाश में बादल छाए हुए थे। वह तेजी से अपने घर की ओर बढ़ा। अभी वह कुछ दूर ही पहुंचा था कि बरसात शुरू हो गई। वह पानी में भीग गया। 
उसकी कक्षा का ही एक दोस्त प्रकाश उसके पास से गुजरा,उसके पास छाता भी था। दीपक दौड़कर प्रकाश के छाते में आ गया लेकिन प्रकाश ने उसके ऊपर से अपना छाता हटा लिया। और बोला 'ये छाता मेरा है निकलो बाहर' 
दीपक को बहूत बुरा लगा, मगर वह कर भी क्या सकता था। भीग जाने के कारण दीपक को सर्दी लगने लगी। वह कांपने लगा था।उसके दांत बजने लगे थे। 

तभी उसकी निगाह छाते वाले अन्य लड़के पर पड़ी। उस लड़के की छतरी टूटी थी और वह खुद को भी बरसात से बचा नहीं पा रहा था। दीपक ने जैसे ही उस लड़के का चेहरा देखा, उसकी हिम्मत नहीं हुई कि वह उसके छाते के नीचे हो ले। 
वह लड़का और कोई नहीं चुन्नू ही था। चुन्नू ने दीपक को जैसे ही देखा तो तुरंत अपना टूटा छाता उसके ऊपर कर दिया। 

पास ही चुन्नू का घर था वह दीपक को अपने घर ले गया। चुन्नू की माँ सीताबाई उस वक्त घर पर ही थी। दीपक को भीगा देखकर घबरा गई। 
सीताबाई ने दीपक के गीले कपड़े उतारे और चुन्नू के धुले हुए कपड़े उसे पहनाए। दीपक को बहुत अच्छा लगा। उसकी ठंड भी अब कम पड़ गई थी। 

थोड़ी देर में सीताबाई एक गिलास लेकर आई। 'इसमें गरम गरम दूध है, इसे पी लो तुम्हें आराम मिलेगा' सीताबाई बोली।
दीपक को सीताबाई का व्यवहार बहुत अच्छा लग रहा था। उसने दूध का गिलास ले लिया और धीरे धीरे पीने लगा। कुछ समय बाद सीताबाई दीपक को उसके घर तक छोड़ने गई। 

रात को जब दीपक अपने पलंग पर लेटा हुआ था तब उसके नन्हें से दिमाग में कई सवाल चक्कर काट रहे थे। 'अगर चुन्नू  आज अपने छाते में नहीं आने देता तो? अगर चुन्नू अपने सूखे कपड़े उसे ना पहनने देता तो? अगर सीताबाई उसे प्यार करने के बजाय दूर छिटक देती तो ? चुन्नू भी अगर प्रकाश की तरह या खुद उसी की तरह बोलता 'मेरा छाता है, मेरे कपड़े हैं, मेरी मां है तब क्या होता? उसे कितनी परेशानी उठानी पड़ती। मगर चुन्नू ने ऐसा नहीं किया था।

अगले दिन चुन्नू दीपक को गेंद खेलते देख रहा था। तभी दीपक उसके पास आया और बोला 'चुन्नू मैं गेंद से खेल रहा हूँ, तुम साइकिल चलाओ ना। और अपनी साइकिल लाकर चुन्नू को दे दी। 

एक छोटी सी घटना ने दीपक को सच्चा सबक सिखा दिया था कि 'यह तेरा है यह मेरा है' कहने में कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात तो तब है जब अपनी चीजें दूसरों के काम आएँ।

ब्रजेश कानूनगो 

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