बालकथा
फूल शुभकामनाओं के
ब्रजेश कानूनगो
पिंकी अपने नए घर में आकर बहुत खुश थी. पिछला घर इतना छोटा था कि न तो वहां वह भली प्रकार खेल ही पाती थी और ना ही पौधे लगाने के लिए खुली जगह थी. नए घर में उसे दोनों ही सुविधाएं मिल गई थी.
पिंकी के पापा नर्सरी से बहुत से पौधे लाए जिनमें गुलाब के पौधे भी थे. पिंकी ने उन्हें बड़े प्यार से अपनी बगिया में लगाया. वह रोज फव्वारे से पौधों को सींचती और हर नई निकलने वाली पत्ती को देखती और खुश हो जाती. उसे कलियों के आने का इंतजार रहता. एक दिन अचानक उसने गुलाब के पौधे में दो नयी नयी ताजा कलियां देखी तो वह खुशी से दौड़ती अपनी मम्मी को बुला लाई. उसकी मम्मी को पिंकी की मेहनत के फूल खिलते देख बहुत खुशी हुई.
अगले दिन कलियां खिल कर गुलाब के फूलों में बदल गई थी. स्कूल पहुंचकर वह दिन भर अपनी सहेलियों से अपने घर खिले गुलाब के फूलों की ही चर्चा करती रही. वह शाम को घर लौट कर घर में खिले पहले फूलों को अपने पापा को भेंट कर रोमांचित कर देना चाहती थी. लेकिन घर पहुंचते ही उसे भारी झटका लगा. फूल अपने स्थान पर नहीं थे. वह रुआंसी हो गयी. उसने सोचा भी नहीं था कि फूलों की इस तरह चोरी हो जाएगी.
अगली सुबह फिर बगिया में कुछ गुलाब खिल गए थे. पिंकी का चेहरा भी उन्हें देख कर खिल उठा. लेकिन शाम को जब वह स्कूल से घर लौटी, फूल फिर गायब थे. वह फूलों की रोज-रोज होने वाली चोरी से परेशान हो उठी.
अगले दिन रविवार था. स्कूल की छुट्टी होने के कारण पिंकी ने तय कर लिया कि आज चुपके चुपके वह अपने फूलों पर नजर रखेगी और देखेगी कि गुलाबों की चोरी आखिर कौन करता है? सुबह से ही उसने अपना खेलना पढ़ना आदि बगिया के आसपास ही जारी रखा. बरामदे से हर आने-जाने वाले पर अपनी निगाह रखती रही.
कमलाबाई पिंकी के घर रोज काम करने आती थी. लेकिन चार-पांच दिनों से उसकी जगह उसका दस-बारह साल का लड़का राजू घर का छोटा-मोटा काम निपटाने आ जाया करता. उस दिन भी राजू आया था. उसने पिंकी के घर का गेहूं पिसवाया और बाजार से सब्जी ला कर दी. जब काम समाप्त करके वह घर लौटने लगा तब उसने चुपके से गुलाब के फूल पौधों से तोड़ लिए.
पिंकी यह सब देख रही थी. उसकी इच्छा हुई कि वह जोर जोर से चिल्लाए – ‘चोर चोर’, लेकिन कुछ सोचकर उसने ऐसा नहीं किया. वह जानना चाहती थी कि राजू फूलों का आखिर करता क्या है? वह राजू के पीछे-पीछे चल पड़ी. राजू का घर कुछ ही दूर था. राजू जब घर पहुंचा तो पिंकी भी उसके पीछे पीछे होकर दरवाजे की ओट से अंदर देखने लगी.
एक चारपाई पर राजू की मां कमलाबाई सोई हुई थी. एक तिपाही पर एक बोतल में कुछ मुरझाए हुए से फूल सजे थे. राजू ने बोतल से बासी फूल निकालकर उनकी जगह ताजे फूलों को सजा दिया. कमलाबाई ने राजू को प्यार से अपनी बाहों में भर लिया.
तभी कमलाबाई की निगाह दरवाजे की ओट में छिपी पिंकी पर पड़ी. उन्होंने पिंकी को अपने पास बुलाया. पिंकी तो पहले ही गुस्से से भरी पड़ी थी, वह बोल उठी – ‘यह गुलाब हमारे हैं.. राजू ने इन्हें चुराया है.’ कमला बाई ने राजू की ओर देखा. राजू रो पड़ा , बोला ‘अम्मा गुरु जी ने कहा था फूलों को बीमार व्यक्ति के पास सजाने से बीमारी जल्दी भाग जाती है इसलिए मैंने......’ उसने सिसकते हुए अपना चेहरा कंबल में छुपा लिया. कमला बाई ने राजू को समझाया- ‘बेटा फूलों के कारण बीमारी तो जरूर भाग जाती है मगर फूल चोरी के नहीं होना चाहिए, देखो तभी तो मैं ज्यों की त्यों तीन दिनों से ऐसी ही बीमार पड़ी हुई हूँ.’
अगले दिन जब सुबह राजू पिंकी के यहां काम करने आया तो पिंकी ने एक सुंदर सा गुलदस्ता बनाकर कमलाबाई के लिए उसे दिया. राजू ने गुलदस्ता अपने हाथों में लिया तो उसकी आंखें भर आईं. अब उसकी मां जल्दी स्वस्थ हो जाएगी, क्योंकि फूल चोरी के नहीं सच्ची शुभकामनाओं के थे.
पिंकी को ओस की बूंद पर सूरज के प्रकाश के पडने से बगिया के पौधों पर सैकड़ों सतरंगे फूल खिले नजर आने लगे.
ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रीजेंसी, चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर 452018
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