बालकथा
रावण दहन
ब्रजेश कानूनगो
हर साल की तरह मोहल्ले के बच्चों ने फिर से तय किया कि दशहरे पर रावण दहन किया जाए. राजू, दीपक, बबलू, चिंटू, स्माइल, बलवीर, दीपा, भावना, सब बच्चे जमा हुए. रावण दहन की रुपरेखा तैयार हुई. यह भी तय किया गया कि हर बच्चा अपने जेब खर्च में से कुछ बचा कर रावण दहन समिति को देगा तथा कुछ धन मोहल्ले की दुकानों से चंदा करके इकट्ठा किया जाएगा.
चुन्नू के बाडे में शाम को रोज सब बच्चे एकत्र होने लगे. देखते ही देखते रावण का पुतला आकार लेने लगा. दो लंबे बांसों को अंग्रेजी के अक्षर ‘ए’ की तरह बांधा गया. बीच में टाट के बोरे को बांधकर रावण का पेट बनाया गया, जिसमें मोहल्ले भर का कचरा, कागज, कपड़ों की चिंदियां आदि समाते चले गए. एक बाँस आड़ा बांधकर उसे हाथों की शक्ल दी गई और टाट लपेट कर उसमें घास भर दी गई. हां, आतिशबाजी और पटाखे रखने के लिए पर्याप्त जगह रखी गई ताकि चंदा इकट्ठा होने पर पटाखे खरीद कर उसमें लगाए जा सकें.
इस्माइल एक अच्छा चित्रकार था उसने एक मटके पर रावण का बहुत ही शानदार चेहरा बनाया. बड़ी बड़ी मूछें, गोल-गोल डरावनी सी आंखें. बाकी के नौ सिर एक गत्ते को काटकर बनाए गए और उन्हें मटके के आसपास बांधकर रावण की गर्दन से जोड़ दिया गया.
रावण निर्माण के बाद बच्चे चंदा अभियान में जुट गए और देखते ही देखते हैं उन्होंने हजार रुपए जमा कर लिए जो मोहल्ले के रावण का पेट खाने के लिए पर्याप्त थे. पटाखे खरीद कर उन्हें रावण के पुतले में लगाया गया. दोनों हाथों में दो राकेट पकड़ाए और नाभि में एक शक्तिशाली ‘एटम बम’ रखा. नाभि से ही एक सुतली निकाली गई जो लगभग तीन मीटर लंबी रही होगी. रावण दहन के समय इसी सुतली में आग लगाने की योजना थी.
और आ पहुंचा विजयादशमी का दिन. बच्चों की सप्ताह भर की मेहनत रावण का आदम का पुतला मोहल्ले के लोगों के सामने चौराहे पर खड़ा हुआ था. लेकिन इधर बच्चों का दल किसी बहस में उलझा हुआ था वह तय नहीं कर पा रहे थे कि रावण के पुतले का अग्नि संस्कार कौन करेगा? तभी बलवीर ने सलाह दी कि मोहल्ले के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति से रावण के पुतले में आग लगवाई जाए.
भावना के दादा जी यानी प्रधान जी एक रिटायर्ड अध्यापक थे और वही सबसे बुजुर्ग भी थे. बच्चों का दल उनके पास प्रार्थना करने गया कि शाम को सात बजे वे अपने करकमलों से रावण दहन की रस्म पूरी करें. प्रधान जी बच्चों की सक्रियता एवं कार्यक्रम से बहुत खुश हुए. उन्होंने बच्चों से पूछा कि क्या वह जानते हैं रावण क्या है? और उसे क्यों जलाया जाता है? बच्चों ने पढ़ी हुई पौराणिक कथा के आधार पर रावण का परिचय दिया तो प्रधान जी बोले- ‘नहीं रावण तो एक प्रतीक मात्र है बुराइयों का, जो हम सब में विद्यमान है उसके दस सर दस बुराइयां हैं. एक सिर काटा जाए तो वहां दूसरा निकल आता है. अकेले-अकेले बुराइयों को नष्ट नहीं किया जा सकता. इन सबके प्राण रावण की ‘नाभि’ में होते हैं अगर नाभि को लक्ष्य किया जाए तो ही रावण पर विजय प्राप्त की जा सकती है. और सारी बुराइयां एक साथ नष्ट की जा सकती है, नाभि का लक्ष्य सिर्फ ‘संकल्प’ रूपी बाण से ही किया जा सकता है. रावण दहन हमारे अंदर के रावण को नष्ट करने के संकल्प का वार्षिक नवीनीकरण है. जानते हो रावण के दस सिर क्या हैं ? झूठ, क्रोध, घृणा, हिंसा, आलस्य, ईर्ष्या, अनादर कठोरता, देशद्रोह, और कुविचार, अगर तुम रावण दहन से पूर्व अपने अंदर बैठे रावण को खत्म करने का संकल्प लो तो ही मैं तुम्हारे रावण के पुतले का दहन करूंगा.’
सभी बच्चे सभी बच्चे प्रधान जी की विद्वता से पूर्ण तरह परिचित थे. उनका सम्मान करते थे. उन्होंने प्रधान जी को आश्वस्त किया कि वे अपने अंदर रावण के किसी भी सिर को सर नहीं उठाने देंगे.
शाम को चौराहा मोहल्ले के बड़े बूढ़ों और बच्चों से भरा था. रावण की नाभि से निकली सुतली तीन मीटर दूर तक लाई गई थी. प्रधान जी ने ज्यों ही अग्नि बताई, सुतली सुलगती हुई रावण की नाभि की ओर बढ़ने लगी, एक धमाका हुआ और सारा पुतला धू-धू कर के जल उठा. पटाखों की लड़ें तड़ तड़ करने लगी...तभी एक रॉकेट सुलगा और आकाश की ओर उड़ चला और फिर दूसरा... आकाश में सितारे बिखर गए.
रावण का पुतला जल गया था लेकिन बुराइयों पर विजय का बच्चों का संकल्प फिर नया हो गया था.
ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रीजेंसी, चमेली पार्क कनाडिया रोड, इंदौर-452018
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