उपन्यास :डेबिट क्रेडिट: ब्रजेश कानूनगो
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जामुन की मिठास
नवजात पोते के साथ पहली बार घर आ रहे बहू बेटे के स्वागत की तैयारियों में सब लोग व्यस्त थे। भाई ज्ञानू का बेटा सार्थक अपनी पत्नी नैन्सी और छः माह के बेटे के साथ पहली बार नैरोबी से आनेवाला था और इधर आज सुबह से ही दादी याने बकुलेश की माँ जामुन की रट लगाए बैठीं थीं।
कल मानसून पूर्व की बारिश हुई थी । तेज धूल भरी आंधी आई फिर बड़ी-बड़ी बूंदों ने कार पार्किंग के टीन शेड पर ताल देकर सामने लगे नीम की डालियों और पत्तियों के नृत्य को संगत दी। कुछ निम्बोलियाँ भी टपक कर सड़क पर बिखर गईं।
मौसम के इस बदलते राग को सुनते हुए दादी को फिर से याद आया अपना घर-आंगन। जामुन पक गए होंगे। तेज हवा से पके हुए जामुन आंगन की मिट्टी में गिर रहे होंगे। पता नहीं ज्ञानू ने पेड़ के नीचे चादर बांधी होगी या नहीं। गिरे हुए जामुनों में मिट्टी ,कंकर भीतर प्रवेश कर लेंगे तो जामुन खाने योग्य नहीं रह जाएंगे।
गाँव में बकुलेश के पुश्तैनी घर के आंगन में अमरूद, सहजन,आंवला,नीम, अनार,पपीता आदि बहुत से फलदार और औषध पेड़ पौधे लगे हुए हैं लेकिन जामुन पर माँ ख़ास तौर से जान छिड़कती थीं।
अक्सर बताती कि बचपन से ही उन्हें जामुन खाने का बड़ा शौक था। उनके पिताजी के खेतों पर बावड़ी के नजदीक जो खास पेड़ थे, उनमें एक कबीट का था और दूसरा जामुन का।
उनकी जमीन पर तीन कुएं और दो बावड़ियां थीं। खेत की पहचान भी पेड़, कुओं, बावड़ियों आदि के नाम से होती थी। एक पुरानी बावड़ी की दीवार टूट गई थी तो पास वाला खेत फूटी बावड़ी वाला खेत कहलाता था। जब उसके पास लगे पेड़ पर जामुन फलने लगे तो फिर वह जामुन वाला खेत के नाम से पुकारा जाने लगा। ऐसे ही भंवरिया कुआं के पास आम वाला खेत था। नई बावड़ी के पास बगिया लगी थी, जिसमें गुलाब, गुलदावदी सहित नींबू के पेड़ लगे थे। ब्याह के बाद माँ ने ससुराल आकर भी उसी वातावरण को बनाये रखने के लिए यहां भी जामुन आदि के पेड़ पौधों को पाल पोसकर बड़ा किया था।
महानगर में बचे छोटे से गाँव के टुकड़े जैसा था बकुलेश के घर का यह नया विकसित इलाका. कुछ पेड़ पौधे अब भी उनके पड़ोसी थे। बारिश की शुरुआत में पेड़ से निम्बोलियाँ गिरते देख घर के जामुन याद आ रहे थे माँ को । बहुत दिनों से बकुलेश मन ही मन सोच रहा था कि आते जाते ग्रेटर कैलाश रोड या तिलकनगर से उनके लिए जामुन लेता आए। वहां मिल भी जाते थे , नई आवक के महंगे फल वहीं मिल पाते थे , खरीदने वाले भी उधर ही होते हैं।
गांव से साइकिलों पर आए किसानों से खरीदकर स्थानीय फल वाले मुनाफे पर बेचते हैं शौकीनों को। शुरुआत में तो तीन सौ रुपये किलो तक भाव होता है जामुनों का । हर कोई तो जामुन खरीदता नहीं। शौकीन तबीयत नौजवान और अस्पताल के बाहर दवाई की तरह भी खरीद लेते हैं कुछ शुगर पीड़ित लोग।
माँ को मधुमेह था। जबरदस्त जामुन शौकीन होने के बावजूद न जाने क्यों इस ढीठ बीमारी ने उन्हें घेर लिया था। जब से पता चला इस बीमारी का तब से घर के जामुन के पेड़ और जामुनों की कद्र व देखभाल और ज्यादा बढ़ गई थी। जामुन तो जामुन, गुठलियों को भी प्यार मिलने लगा। जामुन की गुठलियों, मैथी दाना और नीम पत्तियों आदि का चूर्ण बनाकर वे अपने पास रखती थीं । अब इस चूर्ण से उन्हें कितना लाभ मिलता होगा यह तो वही जानें।
जामुन के कारण ही शायद उन्हें जामुनी रंग से भी भारी लगाव पैदा हो गया था। कोई उन्हें जामुनी शॉल या साड़ी भेंट कर देता तो वे उसी तरह अब भी खिल उठती थीं जैसे कभी फूटी बावड़ी के जामुन के पेड़ के तले युवा पति के साथ जामुन खाते हुए लजाते खिल उठती होंगी।
अपनी बीमारी के चलते उन्हें यहां बकुलेश के पास महानगर में आना पड़ा। यह मजबूरी थी उनकी, वरना अपने पति की स्मृतियों से भरा घर छोड़ना वे कभी स्वीकार नहीं करती।
नाराज तो थी हीं वे सबसे खासकर ज्ञानू और सार्थक से । वे चाहती थी पोता सार्थक इधर देश में ही जाति, बिरादरी की लड़की से विवाह करे। यह भी क्या कि परदेस में जाकर वहीं की लड़की से ब्याह कर लिया। नैरोबी में अपने साथ काम करने वाली सहयोगी को सार्थक अपना दिल दे बैठा था। ऊपर से वह सांवली भी थी। इस मामले में बकुलेश की माँ की सौंदर्य दृष्टि पारंपरिक ही थी। फिर भी पौत्र वधु और प्रपौत्र के स्वागत के लिए बहुत उत्साह था उनके मन में।
सार्थक की टैक्सी घर के सामने रुकी। वसुधा ने बच्चों की आरती उतारी । नैंसी की गोद में जामुनी टॉवेल में लिपटा माँ का पड़पोता किसी मखमली सॉफ्ट टॉय सा खूबसूरत लग रहा था।
माँ ने नन्हे को गोद में लिया स्नेह से दुलारा, प्यार से उसकी चुम्मी ली, ममत्व भरी खुशी से बोल उठीं ‘मेरा प्यारा जामुन'! माँ की आँखें छल छला आईं।
वसुधा की बीमारी और पीड़ादायक इलाज के चलते बकुलेश के घर परिवार में उदासी का जो कसैलापन व्याप्त हो गया था, कुछ दिनों के लिए ही सही ‘जामुन’ जैसे प्यारे शिशु की अठखेलियों की मिठास ने थोड़ा कम कर दिया था.
नवजात पोते के साथ पहली बार घर आ रहे बहू बेटे के स्वागत की तैयारियों में सब लोग व्यस्त थे। भाई ज्ञानू का बेटा सार्थक अपनी पत्नी नैन्सी और छः माह के बेटे के साथ पहली बार नैरोबी से आनेवाला था और इधर आज सुबह से ही दादी याने बकुलेश की माँ जामुन की रट लगाए बैठीं थीं।
कल मानसून पूर्व की बारिश हुई थी । तेज धूल भरी आंधी आई फिर बड़ी-बड़ी बूंदों ने कार पार्किंग के टीन शेड पर ताल देकर सामने लगे नीम की डालियों और पत्तियों के नृत्य को संगत दी। कुछ निम्बोलियाँ भी टपक कर सड़क पर बिखर गईं।
मौसम के इस बदलते राग को सुनते हुए दादी को फिर से याद आया अपना घर-आंगन। जामुन पक गए होंगे। तेज हवा से पके हुए जामुन आंगन की मिट्टी में गिर रहे होंगे। पता नहीं ज्ञानू ने पेड़ के नीचे चादर बांधी होगी या नहीं। गिरे हुए जामुनों में मिट्टी ,कंकर भीतर प्रवेश कर लेंगे तो जामुन खाने योग्य नहीं रह जाएंगे।
गाँव में बकुलेश के पुश्तैनी घर के आंगन में अमरूद, सहजन,आंवला,नीम, अनार,पपीता आदि बहुत से फलदार और औषध पेड़ पौधे लगे हुए हैं लेकिन जामुन पर माँ ख़ास तौर से जान छिड़कती थीं।
अक्सर बताती कि बचपन से ही उन्हें जामुन खाने का बड़ा शौक था। उनके पिताजी के खेतों पर बावड़ी के नजदीक जो खास पेड़ थे, उनमें एक कबीट का था और दूसरा जामुन का।
उनकी जमीन पर तीन कुएं और दो बावड़ियां थीं। खेत की पहचान भी पेड़, कुओं, बावड़ियों आदि के नाम से होती थी। एक पुरानी बावड़ी की दीवार टूट गई थी तो पास वाला खेत फूटी बावड़ी वाला खेत कहलाता था। जब उसके पास लगे पेड़ पर जामुन फलने लगे तो फिर वह जामुन वाला खेत के नाम से पुकारा जाने लगा। ऐसे ही भंवरिया कुआं के पास आम वाला खेत था। नई बावड़ी के पास बगिया लगी थी, जिसमें गुलाब, गुलदावदी सहित नींबू के पेड़ लगे थे। ब्याह के बाद माँ ने ससुराल आकर भी उसी वातावरण को बनाये रखने के लिए यहां भी जामुन आदि के पेड़ पौधों को पाल पोसकर बड़ा किया था।
महानगर में बचे छोटे से गाँव के टुकड़े जैसा था बकुलेश के घर का यह नया विकसित इलाका. कुछ पेड़ पौधे अब भी उनके पड़ोसी थे। बारिश की शुरुआत में पेड़ से निम्बोलियाँ गिरते देख घर के जामुन याद आ रहे थे माँ को । बहुत दिनों से बकुलेश मन ही मन सोच रहा था कि आते जाते ग्रेटर कैलाश रोड या तिलकनगर से उनके लिए जामुन लेता आए। वहां मिल भी जाते थे , नई आवक के महंगे फल वहीं मिल पाते थे , खरीदने वाले भी उधर ही होते हैं।
गांव से साइकिलों पर आए किसानों से खरीदकर स्थानीय फल वाले मुनाफे पर बेचते हैं शौकीनों को। शुरुआत में तो तीन सौ रुपये किलो तक भाव होता है जामुनों का । हर कोई तो जामुन खरीदता नहीं। शौकीन तबीयत नौजवान और अस्पताल के बाहर दवाई की तरह भी खरीद लेते हैं कुछ शुगर पीड़ित लोग।
माँ को मधुमेह था। जबरदस्त जामुन शौकीन होने के बावजूद न जाने क्यों इस ढीठ बीमारी ने उन्हें घेर लिया था। जब से पता चला इस बीमारी का तब से घर के जामुन के पेड़ और जामुनों की कद्र व देखभाल और ज्यादा बढ़ गई थी। जामुन तो जामुन, गुठलियों को भी प्यार मिलने लगा। जामुन की गुठलियों, मैथी दाना और नीम पत्तियों आदि का चूर्ण बनाकर वे अपने पास रखती थीं । अब इस चूर्ण से उन्हें कितना लाभ मिलता होगा यह तो वही जानें।
जामुन के कारण ही शायद उन्हें जामुनी रंग से भी भारी लगाव पैदा हो गया था। कोई उन्हें जामुनी शॉल या साड़ी भेंट कर देता तो वे उसी तरह अब भी खिल उठती थीं जैसे कभी फूटी बावड़ी के जामुन के पेड़ के तले युवा पति के साथ जामुन खाते हुए लजाते खिल उठती होंगी।
अपनी बीमारी के चलते उन्हें यहां बकुलेश के पास महानगर में आना पड़ा। यह मजबूरी थी उनकी, वरना अपने पति की स्मृतियों से भरा घर छोड़ना वे कभी स्वीकार नहीं करती।
नाराज तो थी हीं वे सबसे खासकर ज्ञानू और सार्थक से । वे चाहती थी पोता सार्थक इधर देश में ही जाति, बिरादरी की लड़की से विवाह करे। यह भी क्या कि परदेस में जाकर वहीं की लड़की से ब्याह कर लिया। नैरोबी में अपने साथ काम करने वाली सहयोगी को सार्थक अपना दिल दे बैठा था। ऊपर से वह सांवली भी थी। इस मामले में बकुलेश की माँ की सौंदर्य दृष्टि पारंपरिक ही थी। फिर भी पौत्र वधु और प्रपौत्र के स्वागत के लिए बहुत उत्साह था उनके मन में।
सार्थक की टैक्सी घर के सामने रुकी। वसुधा ने बच्चों की आरती उतारी । नैंसी की गोद में जामुनी टॉवेल में लिपटा माँ का पड़पोता किसी मखमली सॉफ्ट टॉय सा खूबसूरत लग रहा था।
माँ ने नन्हे को गोद में लिया स्नेह से दुलारा, प्यार से उसकी चुम्मी ली, ममत्व भरी खुशी से बोल उठीं ‘मेरा प्यारा जामुन'! माँ की आँखें छल छला आईं।
वसुधा की बीमारी और पीड़ादायक इलाज के चलते बकुलेश के घर परिवार में उदासी का जो कसैलापन व्याप्त हो गया था, कुछ दिनों के लिए ही सही ‘जामुन’ जैसे प्यारे शिशु की अठखेलियों की मिठास ने थोड़ा कम कर दिया था.
थोड़ा ठीक
होते ही माँ भी ज्ञानू के साथ गाँव लौट गईं.
००००००
००००००
22
लाल सलाम
सभागृह में बड़ी गहमा गहमी थी. लगभग पांच सौ
श्रोताओं के बैठने की क्षमता वाले सभागृह में कुछ अतिरिक्त कुर्सियां भी लगाना
पडीं थीं. संगठन की प्रदेश इकाई ने युवा और महिला कर्मियों के लिए विशेष सम्मलेन
का आयोजन किया था. राज्य भर से बड़ी संख्या में बैंककर्मी एक दिन पहले ही आ गए थे.
स्थानीय बैंककर्मी तो शामिल थे ही.
सेवानिवृत्ति के बाद भी बकुलेश को संगठन के
कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए विशेष आमंत्रण मिलता था. सुरेश भाई और बकुलेश
पहले भी बहुत सक्रिय थे और अब भी दोनों मिलकर अंत तक बैठकर रिपोर्ट तैयार करने की
जिम्मेदारी पूरे मन से निभा रहे थे. सारी गतिविधियों और भाषणों पर उनका पूरा ध्यान
बना रहता था. आज भी सबसे पहले दोनों आकर पहली पंक्ति में बैठ गए थे.
आज के सम्मलेन का बकुलेश के लिए विशेष महत्त्व भी
था. उसकी दसवीं किताब का लोकार्पण भी आज इसी सम्मलेन के दौरान होना प्रस्तावित था.
प्रकाशक ने कल ही लखनऊ से उसके नए व्यंग्य
संग्रह की कुछ प्रतियाँ डाक से भेजी थीं. संग्रह बकुलेश ने आनंद बाबू को समर्पित
किया था. वह चाहता था कि किताब का लोकार्पण बैंककर्मियों के इस वृहद् सम्मलेन में
विद्वान अतिथियों के हाथों संपन्न हो और यहीं पर पुस्तक की पहली प्रति वह आनंद
बाबू को भेंट करे. रात को आनन्द बाबू से इसकी अनुमति चाही तो उन्होंने कहा था-
’पुस्तकें तो ले ही आना बकुलेश..आयोजन समिति से बात करके समय रहा तो लोकार्पण करवा
लेंगें.’ सामान्यतः आनंद बाबू के कहे को
कोई टाल नहीं सकता था लेकिन निर्णयों के लिए वे हमेशा लोकतांत्रिक तरीके पर
विश्वास रखते थे. पूर्व निर्धारित रूपरेखा में तात्कालिक रूप से कोई परिवर्तन या
विचलन संभव नहीं होता था. यद्यपि बकुलेश ने लोकार्पण के लिए अपनी तैयारी रखी थी
लेकिन वह पूरी तरह आश्वस्त नहीं था. सब कुछ अतिथियों के व्याख्यान के समय और
सुविधा पर निर्भर करता था.
‘ये आयोजन बहुत जरूरी है सुरेशजी.’ बकुलेश ने एक
नजर मंच पर डालते हुए कहा.
मंच संचालन का जिम्मा पाण्डेयजी के पास था. वे पोडियम
पर लगे माइक को चेक कर रहे थे. पास ही संगीत समूह के निर्देशक गरुड़जी भी अपने
साजों को व्यवस्थित करते हुए सहकलाकारों को कुछ समझाने में व्यस्त दिखाई दे रहे
थे. कार्यक्रम की शुरुआत में उन्हें सांगठनिक गीत प्रस्तुत करना था.
‘हाँ, यह तो है..बैंकों में भर्ती होने वाली नई
पीढी को हमारे संघर्षों और इतिहास की जानकारी के साथ, वर्त्तमान समय में अधिकारों
की लड़ाई और समाज की बेहतरी के लिए सही दिशा समय रहते मिलना जरूरी है.’ सुरेश भाई
का ट्रेड यूनियन आन्दोलनों से बहुत निकट का अनुभव रहा था.
‘सभी कॉमरेड कृपया अपना स्थान ग्रहण करें.. हमारे
अतिथि मंच पर आ रहे हैं..’ पाण्डेयजी ने उद्घोषणा की.
आनंद बाबू और अन्य बैंककर्मी नेताओं के साथ अतिथिगण
मंच पर आये तो पूरा हाल ‘इन्कलाब जिंदाबाद.. कर्मचारी एकता जिंदाबाद.. आनंद बाबू..
लाल सलाम.. लाल सलाम..’ के नारों से तब तक गूंजता रहा जब तक कि अतिथि अपनी
कुर्सियों पर बैठ नहीं गए.
मंच पर पहुंचे अतिथियों ने सबसे पहले बैंककर्मियों
के नेता साथी प्रभातकार और साथी परवाना के चित्रों पर पुष्प मालाएं पहनाईं. उसके
तुरंत बाद गरुड़जी के निर्देशन में कलाकारों ने ओजस्वी स्वर में संगठन गीत गाना
शुरू कर दिया..’ ए आई बी ए लाल सलाम..ए आय बी ओ ए लाल सलाम...’
सभागृह में बैठे सैकड़ों स्वर जोशीले अंदाज में
गीत को दोहराते जा रहे थे...’लाल सलाम..लाल सलाम...
मंच से लेकर हवाओं और दिलों तक में जैसे लाल रंग
घुलता चला जा रहा था...
००००
‘दोस्तों, विगत कुछ वर्षों में बड़ी संख्या में
युवा साथी बैंकिंग उद्योग में आये हैं.
इनमें बड़ी संख्या में महिलायें भी हैं..इन युवा बैंककर्मियों को ट्रेड यूनियन
आन्दोलन की मुख्य धाराओं में सक्रिय और प्रभावी स्वरूप में जोड़ना सांगठनिक
प्राथमिकता भी है और चुनौतीपूर्ण दायित्व भी....मौजूदा दौर के संघर्षों में नई
चुनौतियों पर विचार विमर्श के लिए हमारे सम्मलेन में आज विद्वान वक्ता मौजूद
हैं..’टेक्नालोजी इन बैंकिंग’ पर प्रख्यात विशेषज्ञ डॉ अनुपम और ‘ट्रेड यूनियन एवं
युवा बैंककर्मी’ विषय पर डॉ रायलु हमें संबोधित करेंगे...
बैंकिंग उद्योग में बड़े-बड़े घोटाले प्रकाश में आते
रहे हैं, ये सब कार्पोरेट की देन हैं.. नियामक संस्थानों की हटधर्मिता के कारण बड़ी
संख्या में छोटे और आम ग्राहक परेशानी से जूझ रहे हैं..बड़े कारपोरेटों के घोटालों
को रोका तो नहीं जा रहा, उलटे मूल मुद्दों से ध्यान भटकाने के प्रयास हो रहे
हैं..कारपोरेट सेक्टर के पाप की सजा आमजनों को क्यों भुगतना जरूरी हो रहा....घोर
पूंजीवादी लूट की व्यवस्था में सार्वजनिक संस्थान संकट में आ रहे हैं.. बैंकिंग
क्षेत्र का यह बहुत कठिन दौर है.... ट्रेड यूनियन अस्मिता और उसकी प्रभावी
हस्तक्षेपकारी भूमिका और लड़ाई अब और गहरानी तय है..निसंदेह हमारे युवा साथी
संगठनों के संघर्षों के लिए इस दौर का नया इतिहास बनायेंगे और वे इसके लिए तैयार
भी हैं...’
आनंद बाबू ने अपना स्वागत भाषण समाप्त किया तो
तालियों और नारों से सभागृह गूंजने लगा. ‘लाल सलाम..लाल सलाम आनंद बाबू लाल
सलाम..’ आनन्द बाबू संघर्ष करो ..हम तुम्हारे साथ है...
पांडेयजी का सत्र संचालन बहुत प्रभावी हुआ करता
था. अपने संचालन के दौरान अक्सर वे ख्यात शायरों और कवियों की महत्वपूर्ण कविताओं
की कुछ पंक्तियों अथवा शेरों को पढ़कर विषय को रेखांकित कर दिया करते थे. इससे
श्रोताओं की कार्यक्रम में रूचि भी बनी रहती थी.
‘इससे पहले कि मैं हमारे आज के विशेषज्ञ अतिथियों
को आपके बीच व्याख्यान के लिए आमंत्रित करूँ एक छोटी सी गतिविधि की अनुमति चाहता
हूँ. मंच से अनुमति मिली तो उन्होंने बात आगे बढ़ाई ‘हमारे वरिष्ठ साथी और
साहित्यकार बकुलेश भटनागर जी की नई पुस्तक प्रकाशित होकर आई है. इस व्यंग्य संग्रह
को मिलाकर अब उनकी दस पुस्तकें हमारे बीच हैं.. हमारे साथी की इस उपलब्धि पर हम
सबको गर्व है.. मैं बकुलेशजी से अनुरोध करता हूँ कि मंच पर आकर अपनी पुस्तक का
लोकार्पण सम्माननीय अतिथियों से करवाएं..
बकुलेशजी पुस्तकों के पैकेट को लेकर मंच पर पहुंचे...
अतिथियों ने रिबन खोलकर पुस्तक का कवर श्रोताओं के सम्मुख कर दिया.. फोटोग्राफरों के
कैमरे की फ्लश गन चमकी तो तालियाँ फिर गूँज उठी.. बैंककर्मियों ने नारा लगाया
’कामरेड बकुलेश लाल सलाम...’ बकुलेश नहीं जानता था कि वह इस ख़ास अभिवादन का कितना
हकदार था.. हाँ यह जरूर था..पुस्तक की पहली प्रति पाने वाले आनंद बाबू सचमुच ऐसा
महत्वपूर्ण कार्य कर रहे थे जिनके लिए जिंदाबाद का नारा लगातार गूंजते रहना जरूरी
था..
०००००
23
विश्वास का नाता
बकुलेशजी की पुस्तक का लोकार्पण होते ही पाण्डेयजी
ने माइक संभाल लिया.
मुख्य वक्ता डॉ अनुपम ने वित्तीय क्षेत्रों में आ
रहे परिवर्तनों और नई तकनीकों को लागू किये जाने और इससे आम लोगों पर पड़ने वाले
प्रभावों पर काफी शोध कार्य और चिंतन मनन किया था. इसी को ध्यान में रखकर
बैंककर्मियों के युवा सम्मलेन में उनके लिए व्याख्यान का विषय भी इसी के अनुरूप तय
किया गया था.
‘इसके पहले कि मैं हमारे मुख्य वक्ता डॉ अनुपम को
यहाँ उद्बोधन के लिए आमंत्रित करूँ विख्यात शायर डॉ राहत इन्दौरी का एक शेर सुनाना
चाहता हूँ.’ पाण्डेयजी ने शेर पढ़ा-
‘जुगनुओं को साथ
लेकर रात रोशन कीजिये
रास्ता सूरज का देखा
तो सहर हो जायेगी.’
तालियों की गडगडाहट के बीच डॉ अनुपम उठकर आये और
बैंककर्मियों की महती सभा को संबोधित करना शुरू किया..
‘दोस्तों, आप शायद जानते होंगे कि बैंकर और
कस्टमर के बीच जो नाता होता है, वह आपसी विश्वास का नाता होता है..’. डॉ अनुपम
हिन्दी और अंगरेजी के मिले जुले वाक्यों में अपनी बात कह रहे थे. ‘और यह रिश्ता
बहुत गहरा होता है. हमारी जिन्दगी का सारा बचा हुआ पैसा इसी विश्वास के दम पर हम
बैंक में जमा करवाते हैं. बैंकर्स ही यह जानते हैं कि इस विश्वास को कैसे कायम रखा
जाए और कैसे इसे और बढाया जाए. एक एक अधिकारी और कर्मचारी का नाम लेकर ग्राहक बैंक
में आकर पूछता है कि फलां व्यक्ति है या नहीं. वह जानता है कि यदि मैं उससे बात करूंगा
तो मेरा काम अवश्य हो जाएगा, ये बैंकिंग का अद्भुत पारंपरिक रिश्ता रहा है अपने
ग्राहक के साथ.
दूसरी तरफ तकनीक से जो नाता होता है वह सहूलियत
का होता है. काम थोड़ा आसान हो जाए, सुविधा हो जाए, परेशानी न हो इसीलिये हम तकनीक
चाहते हैं. इसी के कारण तकनीक का इस्तेमाल अब सभी जगह बढ़ रहा है. लेकिन हो यह रहा
है कि इन दोनों नातों में याने विश्वास और सहूलियत के नाते में ठीक से तालमेल नहीं
बैठ पा रहा. इसमें कई दिक्कतें हैं.’
सभागृह में बैठा हर व्यक्ति डॉ अनुपम के
व्याख्यान को बहुत गंभीरता से सुन रहा था. उन्होंने अपनी बात आगे बढ़ाई -‘आपने
महसूस किया होगा पिछले सात-आठ सालों में तीन शब्द जो नई तकनीक ने इस बैंकिंग क्षेत्र को दिए हैं, वे हैं
केशलेस, प्रेजेंसलेस और पेपरलेस. केशलेस करने के लिए नोटबंदी के अंतर्गत पांच सौ
और एक हजार के नोटों को चलन से बाहर कर दिया गया. उसके एक या दो हफ़्तों बाद ही
लोगों के कथन आने लगे कि अब पैसों का ज़माना नहीं चलेगा, आप जो भी लेन देन करेंगे
उसके लिए आपके जेब में जो डिवाइस पडा है, वह इसमें सहूलियत करेगा. कितना आसान हो
जाएगा सब कुछ. आपको जेब में पैसा नहीं रखना है अपने मोबाइल फोन से कभी भी पैसा हस्तांतरित
कर दीजिये. पेटीएम करो.. बैंक की जरूरत ही नहीं है.
दूसरी बात प्रेजेंसलेस की, इसका मतलब आपको बैंक
जाने की जरूरत ही नहीं है. ये डिवाइस ही आपका बैंक बन गया है. और तीसरी बात है
पेपरलेस, मतलब आपको किसी लेनदेन स्टेटमेंट को देने की जरूरत ही नहीं है, कोई ऑडिट ट्रेल रखने की जरूरत नहीं है, सब आपके
मोबाइल पर आ जाएगा. जो लोग आसानी और सहूलियत की बात करते हैं वे लोग तो कस्टमर और
बैंक के बीच के विश्वास के नाते को जानते तक नहीं. अजीब स्थिति है. ये विश्वास का
नाता इसलिए है क्योंकि बैंकर जानता है कि कस्टमर के जोखिम को कैसे कम किया जाए.
कहीं पर वह पैसे रखे तो उसकी चोरी न हो जाए, पैसे की कीमत कम न हो जाए.
मुद्रास्फीति तो बढ़ती जाती है, इसके साथ ग्राहक का पैसा भी बढ़ना चाहिए. अगर वह
नहीं हुआ तो पैसे की कीमत घट जायेगी. ये जानने समझने वाले तो बैंकर ही होते हैं,
तकनीकी वाले तो ये कुछ जानते नहीं.
हम जो पैसा बैंक में रखते हैं कि हम चाहें तब
जरूरत के समय हमें वापिस मिल जाए. इस विश्वास के लिए बैंकों में पैसा रखते हैं,
इसलिए नहीं कि तकनीक के जरिये सहूलियत का इस्तेमाल करें.’
लगभग पैंतालिस मिनटों तक डॉ अनुपम बैंक खातों को
आधार से लिंक किये जाने के जोखिमों आदि के
बारे में भी विस्तार और उदाहरण सहित बताते रहे. उन्हने बताया कि तकनीक के दौर में
आइडेंटिफिकेशन और ओथेनटिकेशन के अंतर को ख़त्म करके अनेक जोखिमों को बढ़ावा दिया जा
रहा है. प्रेजेंसलेस तकनीक के बहुत दूरगामी खतरे बैंकिंग जगत में दिखाई देने लगे
हैं. अंत में डॉ अनुपम ने युवा बैंक कर्मियों को सचेत करते हुए कहा -‘ये अब हमारी
जिम्मेदारी है कि देखें कि तकनीक हमें सहायता कर रही है या बाधा डाल रही है और
इससे कहीं कोई फ्राड तो नहीं हो रहा. ये बात हमें तकनीक के इस्तेमाल के पहले चार
बार सोचना चाहिए.’
व्याख्यान इतना जोरदार था कि सभागृह में बैठे सभी
लोगों ने खड़े होकर उनका करतल ध्वनि से अभिनंदन किया. डॉ अनुपम को जल्दी जाना था.
उनकी फ्लाईट का समय हो गया था. अगले दिन इसी विषय पर सुप्रीम कोर्ट में दाखिल एक अपील
प्रकरण में की पेशी थी जिसकी तैयारी दिल्ली में होने वाली थी. अध्यक्ष और आनंद
बाबू की अनुमति लेकर वे सबका अभिवादन करके सभागृह से बाहर निकल गए.
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मजदूर एकता जिंदाबाद
श्रोताओं के सीटों पर पुनः व्यवस्थित होते ही
पाण्डेयजी ने अगले वक्ता को आमंत्रित करने से पहले मार्टिन नइमोत्तर की प्रसिद्द
कविता पढ़ना शुरू की..
जब उन्होंने
यहूदियों पर हमला किया
तो मैं चुप रहा
क्योंकि मैं यहूदी
नहीं था
इसके बाद वे आये
कम्युनिस्टों को मारने
तब मैं चुप रहा
क्योंकि मैं
कम्युनिस्ट नहीं था
इसके बाद उन्होंने
ट्रेड यूनियन
के लोगों को अपना
निशाना बनाया
और मैं चुप रहा
क्योंकि मैं किसी
ट्रेड यूनियन में नहीं था
एक दिन उन्होंने
मेरा दरवाजा खटखटाया
तब मुझे बचाने वाला
कोई नहीं बचा था.
‘अब मैं आमंत्रित कर रहा हूँ डॉ रायलू को. वे आएँ
और युवा बैंककर्मियों को ट्रेड यूनियन के महत्त्व और उसके संघर्षों के बारे में
मार्गदर्शन दें.’ सूत्रधार पाण्डेय जी ने सम्मलेन के दूसरे मुख्य वक्ता को
व्याख्यान हेतु माइक थमा दिया.
‘दोस्तों, मुझे कहा गया है कि मैं बैंकों और
ट्रेड यूनियन के संबंधों के बारे में आपसे बात करूँ. तो पहले तो बात हम ये करलें
कि किसानों के साथ, लघु उद्योगों के साथ और उस उद्यमी के के साथ हमारा क्या
सम्बन्ध है. है भी या नहीं है? है तो कैसा है?
किसान जो देश के लिए संपत्ति पैदा करता है, जो देश को खाना खिला रहा है.
देश के तन को ढँक रहा है, वो किसान खुद बदहाली में है. उस किसान के पास अपने
बच्चों को खिलाने, पालने के लिए पैसा नहीं है. उस किसान की पत्नी की पूरी उम्र
गुजर जाती है, नई साडी नहीं पहन पाती. उस किसान का बेटा पढाई से वंचित रह जाता है.
नागपुर जिले के पास जो जिला है यवतमाल वहां तो पिछले दस सालों में पच्चीस हजार
किसानों ने आत्म हत्या कर ली. कहीं न कहीं हमारी इस मुद्रा के साथ हमने उस किसान
का सम्बन्ध तोड़ दिया है. यह पहली ट्रेजेडी है.
दूसरी ट्रेजेडी यह है कि जो लघु उद्योग हैं, छोटे
छोटे उद्योग, घरेलू उद्योग, जब से वैश्वीकरण हुआ है इन लघु उद्योगों की कमर ही टूट
गयी है. नागपुर में एक जमाने में अस्सी हजार दरजी हुआ करते थे आज उनकी संख्या
मुश्किल से बीस हजार रह गयी है. हर जगह यह हुआ है. लेकिन सबसे ज्यादा कोई फल फूल
रहा है तो वह है बड़ा कारपोरेट सेक्टर. जो बैंकों का जबरदस्त इस्तेमाल करता है. ये
हमारे देश की सच्चाई है.’
बकुलेशजी और सुरेश भाई पूरे ध्यान से वक्ताओं के
व्याख्यान सुनते हुए मुख्य-मुख्य बातें अपनी कॉपी में नोट करते जा रहे थे. उसी के
आधार पर प्रेस न्यूज और सम्मलेन की विस्तृत रिपोर्ट बनाने में उन्हें थोड़ी आसानी
हो जाती थी.
‘हम कहें कि बैंक इस मुद्रा का संचालन करता है तो
इसकी जब शुरुआत हुई थी आज से करीब दो सौ साल पहले. तब ये बैंक आम आदमी के लिए तो
उपलब्ध ही नहीं थे. आम आदमी बैंक में खाता नहीं रखता था उस जमाने में. कई प्रायवेट
बैंकों ने लोगों के पैसे डुबाये उस जमाने में. कोई मौक़ा आता था तो बैंक बंद, विघटन
हो गया, दिवालिया होने की घोषणा हो गयी. और दो-तीन हजार लोगों के पैसे डूब जाते
थे. .अंग्रेज सरकार का कोई लेना देना नहीं होता था. उनका उद्देश्य तो केवल
इंग्लेंड के केपिटल स्ट्रक्चर को बचाना भर होता था.. ये कई सालों तक चलता रहा. फिर
हम आये तो 1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया. हमारे कई अर्थशास्त्री कहते
हैं बैंकों का राष्ट्रीयकरण जबरन किया गया. जरूरत नहीं थी. पब्लिक सेक्टर कि कोई
जरूरत नहीं थी. कई लोग कहते हैं बैंकों के निजीकरण को रोका न जाए. राष्ट्रीयकरण तो
एक एक्सीडेंट था. मैं आपको याद दिलाना चाहता हूँ इतिहास पढ़ें क्योंकि एक महान
दार्शनिक ने कहा है जो इतिहास को याद नहीं रखते वो इतिहास की गलतियों को दोहराते
ही रहते हैं. आप जैसे युवा लोगों को याद रखना चाहिए कि जो नौकरी आज हमें मिली है,
आरामदेह नौकरी, पद मिला है वह पुराने जन्मों के पुण्यों की वजह से नहीं मिला है.
हमने अभी कॅा प्रभातकार और कॅा परवाना के चित्रों को नमन किया. ये दोनों किसी शहीद
से कम नहीं हैं. इन दोनों का नाम किन्ही योद्धाओं से कम नहीं है. इस चीज को हमारे
युवा साथियों को जानना और समझना चाहिए. इन्हें याद रखें, इनके संघर्षों को याद
रखें वरना कारवां गुजर जाएगा और हम गुबार देखते रह जायेंगे.’
डॉ रायलू ने विस्तार से बैंक राष्ट्रीयकरण के
उद्देश्यों और सामाजिक आर्थिक क्षेत्रों के विकास में में सार्वजनिक क्षेत्र के
बैंकों की भूमिका के बारे में विस्तार से वक्तव्य दिया. वे आगे कह रहे थे
‘बैंकों में लगातार घोटाले उजागर हो रहे हैं.
रिकवरी की कोई असरदार पालिसी ही नहीं है. करोड़ों का चूना लगाकर बड़े कारोबारी फरार
हो जाते हैं.
शायद ऐसे ही लोगों के लिए कवि ने कहा है-
अबे सुन ओ गुलाब
मत इतरा, गर पाई
रंग,खुशबू और आब,
खून चूसा तूने खाद
का अशिष्ट
नालायक डाल पर इतरा
रहा है कैपिटलिस्ट.
अंत में फैज अहमद फैज की कुछ पंक्तियों से डॉ
रायलू ने अपनी बात को विराम दिया-
‘मताए लौ कलम छीन गयी तो क्या गम है
कि खून-ए- जिगर में
डुबो ली है अंगुलियाँ मैंने
जुबाँ पे मुहर लगी
तो क्या
कि हर एक हलक-ए-
जंजीर पे रख दी है जुबां मैंने.’
सच कहा था डॉ रायलू ने . ‘हलक-ए-जंजीर हम लोग,
हलक-ए-जंजीर युवा साथी, हलक-ए-जंजीर बन जाएँ तो एक नहीं हजारों लाखों प्रभातकार
पैदा होंगे, हजारों लाखों भगतसिंह पैदा हो जायेंगे, हजारों लाखों झांसी की रानियाँ
पैदा हो जायेंगी. इस देश को हम बचायेंगे, हम ही बचायेंगे हमारे सिवा कौन बचाएगा.
इन्कलाब जिंदाबाद, मजदूर एकता ज़िंदाबाद.’
बकुलेशजी ने सुरेश भाई से नोट्स कि कॉपी ली और
प्रेस नोट बनाने के लिए यूनियन कार्यालय की ओर चल दिए.
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25
दंश
शहर से थोड़ा दूर भले ही रहने आ गए वसुधा और बकुलेशजी मगर बहुत शान्ति थी इधर. वसुधा की तबीयत भी ठीक रहने लगी थी. वे कहते थे यहाँ आकर उन्होंने शहर के ‘कैंसर’ से भी मुक्ति पा ली थी. जब भी किसी भीड़ भरे चौराहे से गुजरना होता , बकुलेश कहते ‘देखो वसुधा, केकड़ा आ गया’. उनके अनुसार चौराहा केकड़े का पेट और उससे जुडी गलियाँ केकड़े के पैर होते थे.
शुरू-शुरू में कुछ अकेलापन लगा यहाँ आकर लेकिन जब कुछ और परिवार आकर रहने लगे तो सब ठीक हो गया था. टाउनशिप में सब सुविधाएं थीं. किराना दूकान से लेकर क्लब हाउस और एक छोटा-सा मंदिर भी. बकुलेश जानते थे कि वसुधा सुबह-सुबह स्नान के बाद मंदिर में पूजा-अर्चना और देव दर्शन के बाद ही दूसरे काम हाथ में लेती थी . इसीलिए उन्होंने बायपास की इस टाउनशिप में फ्लेट को प्राथमिकता दी थी. और फिर यहाँ से ‘सेंटर’ भी पास पड़ता था जहां हर तीन महीने में वसुधा को चेकअप के लिए जाना जरूरी था. पांच वर्षों तक निगरानी आवश्यक थी ताकि बीमारी नियंत्रण में रहे.
कई दिनों से वसुधा सोच रही थी कि शहर में जा कर एक बार सराफा और राजबाड़ा घूम आएं. मौसम भी बड़ा सुहावना बना हुआ था. सावन के महीने में सब कुछ वैसे भी बहुत भला लगता है. किसी आस्तिक को तो फिर शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर जल अर्पित करने से ही असीम संतुष्टि मिल जाती है. वसुधा ने बकुलेश से जूने शहर चलने को कहा तो पहले तो वे हिचकिचाए. शहर की भीड़ में अब इस उम्र में कुछ परेशानी-सी महसूस होती है उन्हें. मगर पत्नी की खुशी उनके लिए सर्वोपरि थी अतः राजी हो गए.
थोड़ी ही देर में दोनों खुशनुमा मौसम और मारुति के सफ़र का भरपूर मजा ले रहे थे.
‘वसुधा,याद है तुम्हे आज हमारी कार की सालगिरह है!’ बकुलेश ने स्टीयरिंग से एक हाथ उठा कर मुस्कुराते हुए कहा.
‘अरे वाह! बधाई. मुझे तो याद ही नहीं रहा. मगर आप ज़रा आगे सड़क पर ध्यान दे कर गाडी ड्राइव करिए’. बकुलेश वैसे तो बहुत इतमिनान से अच्छी तरह ड्राइव करते थे मगर वसुधा उन्हें टोके बगैर रहती नहीं.
रिटायरमेंट के थोड़ा पहले बकुलेश ने कार चलाना सीख कर बहुत अच्छा काम किया था. हालांकि इस महानगर में जब शुरू में पर्यटन के लिए आये थे तो कहते थे ’यहाँ यदि ट्रांसफर हो जाए तो मेरे लिए तो बहुत मुश्किल होगा वसुधा! मैं तो स्कूटर भी नहीं चला पाउँगा.’ और सचमुच हुआ भी यही. जब वाकई यहाँ ट्रांसफर होकर आये तो दो महीने के भीतर ही उनके बाँए हाथ में दो माह के लिए प्लास्टर पट्टा चढ़ गया था. फिर तो ऐसे रमें इस शहर में कि बस यहीं के हो गए. शहर की तासीर से एकरस होते गए.
बायपास को पार कर वे शहर की लिंक रोड पर आ गये थे. बकुलेश मजे लेकर कार ड्राइव कर रहे थे. मदन मोहन के संगीत वाले गीतों का एक कैसेट कार के प्लेयर में लगभग स्थायी रूप से बजा करता । बच्चे आते थे तब ही वह बदलता था. उनके जाते ही कभी मदन मोहन तो कभी कुमार गन्धर्व. बस और कुछ नहीं. नई नई नौकरी में बच्चों का बार-बार इधर आना संभव भी नहीं होता. और इस नई टेक्नोलोजी पढ़े हुए लोगों के लिए तो इधर कोई वैसा जॉब भी नहीं कि यहाँ आकर रहें उनके पास.
उन दिनों तो तीन चार महीने ही हुए होंगे बेटे की नौकरी को , जब वसुधा की बीमारी का पता चला था. यह बहुत अच्छा रहा कि बीमारी प्रारम्भिक स्टेज पर ही थी. ख्यातिप्राप्त डॉ जोसफ ने ऑपरेशन करके प्रभावित अंग को ही निकाल दिया था. बेटा कब तक पास रहता. पंद्रह दिन सेवा करके उसे लौटना ही पडा .बकुलेश जानते थे कि इलाज लंबा चलेगा. कीमो थेरेपी, रेडियेशन और बाद की देखभाल. वे चिंतित तो थे ही उनके बैंक के मर्जर ने उनकी चिंता और बढ़ा दी थी. घर से तीन सौ किलोमीटर दूर ट्रांसफर हो गया उनका. विलयीकरण की प्रक्रिया में दोनों बैंकों के प्रबंधन में ही इतनी समस्याएँ आ रहीं थी कि बकुलेश के अटेचमेंट के निवेदन पर ध्यान ही नहीं दिया गया. बहुत सोच विचार कर आखिर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का रास्ता चुन लिया.
और यह कार ‘मारुति-800’ घर की भरोसेमंद सदस्य बन गयी थी। भले ही पांच साल पहले रिटायर्ड हुए बकुलेश लेकिन अपने साथियों से भी थोड़े ज्यादा वरिष्ठ दिखाई देने लगे थे। हालाकि इतनी अधिक उम्र भी नहीं थी बकुलेश की. कार बहुत इत्मीनान से चलाते थे। वसुधा अच्छी तरह जानती थीं उनके इस ढलान का कारण. शायद वसुधा की खुशी में वे अपना ख़याल नहीं रख पाते थे। उस दिन भी वसुधा के एक बार कहते ही चल दिए थे साथ में... जूने शहर की ओर..... मदन मोहन की गजलों को गुनगुनाते हुए.
‘पता है वसुधा! ये बायपास क्यों बनाया जाता है, शहर के बाहर.’ बकुलेश ने वसुधा की तंद्रा तौडते हुए पूछा.
‘शहर के विकास के लिए और क्या. शहर बड़ा होने लगता है तो नई कोलोनिया जरूरी हो जाती है. कुछ लोग योजना की भनक लगते ही पहले से ही सस्ते दामों पर आसपास की जमीन किसानों से खरीद लेते है. फिर विकास के साथ मुनाफ़ा कमाते हैं’ वसुधा ने अपनी समझ से कहा.
'ये तो है ही वसुधा, मगर असल में बायपास बनाने का मतलब शहर की सर्जरी
करना है. जब शहर का दिल संकरी गलियों और पतली सडकों के कारण अवरुद्ध होने लगता है
तो शहर को हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है. बायपास बनाकर शहर की रक्त वाहिनियों में
यातायात के संचरण को सुगम किया जाता है.’ बकुलेश ने जोरदार ठहाका लगाया.
अब वे शहर की सड़क पर आ गए थे. भीड़ और चहल पहल आज कुछ ज्यादा दिखाई दे रही थी. ‘ओह! आज तो सोमवार भी है सावन का.’ वसुधा को याद आया. जब वे प्रमुख चौराहे के नजदीक से गुजर रहे थे. हालांकि सिग्नल की बत्तियाँ अपने निर्धारित समय पर जल बुझ रही थीं मगर इसका कोई महत्व फिलहाल दिखाई नहीं दे रहा था. यातायात के सिपाही और कुछ पुलिस कर्मचारियों ने व्यवस्था अपने हाथ में ले रखी थी. जिस मार्ग पर उन्हें आगे जाना था उधर बेरिकेट्स लगा दिए गए थे. कोई ‘शोभा यात्रा’ गुजर रही थी उधर. पीले वस्त्रों में सिर पर कलश उठाए सैकड़ों स्त्रियाँ पेंग्विन पक्षियों के झुण्ड की तरह मंगल गीत गाते हुए मंथर गति से आगे बढ़ रहीं थीं.
चौराहे के दो तरफ स्वागत मंच बने थे जिनसे कुछ नेता टाइप व्यक्ति शोभायात्रा पर पुष्प वर्षा कर रहे थे. पुलिस जवान मुस्तैदी से गाड़ियों को मुख्य सडकों से जुडी गलियों की ओर डाइवर्ट कर रहे थे. इसके कारण अफरा तफरी फ़ैली थी, लंबा और घना जाम चौराहे पर लग गया था.
बकुलेश ने किसी तरह अपनी कार पास की गली की ओर घुमाना चाही तो साइड मिरर एक बाइक सवार के कंधे से जा टकराया. वह वहीं रुककर गालियाँ देने लगा. उसके रुकने से और गाड़ियां भी रुक गईं. गाड़ियों के इंजनों और हॉर्नों की चिल्ल-पों ऐसी मची कि बकुलेश को घबराहट सी होने लगी. गाडी बुरी तरह फंस गयी थी. न वे आगे जा पा रहे थे न गाडी को पीछे ले जा पा रहे थे. एक ऑटो चालक ने खुद खड़े हो कर बीच से रास्ता बनाया और किसी तरह कार ने एक गली में प्रवेश कर लिया.
यह गली भी पूरी तरह आगे से जाम थी. हुआ यों था कि उसमें भी अगले चौराहे से डायवर्ट होकर वाहन आ रहे थे. बकुलेश के चेहरे पर पसीने की बूंदे छलक आईं थी. उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि करें तो क्या करें.
‘वसुधा, मुझे घबराहट सी हो रही है..सीने में जैसे कुछ फंस गया है..’ कहते कहते बकुलेश का हाथ हॉर्न के स्विच पर ठहर गया. कार की चीख इतनी तेज गूँज रही थी कि उसके आगे सारा कोलाहल जैसे बे-आवाज हो गया.
बकुलेशजी को ही नहीं, शहर को भी दिल का दौरा पडा था. बड़े अस्पताल का चमचमाता बोर्ड सामने ऊंची इमारत पर बहुत आसानी से दिखाई दे रहा था. मगर अस्पताल तक पहुँचना इतना आसान नहीं था. तगड़ा ट्रेफिक जाम लगा था. धड़कने रुकने को अभिशप्त थीं.
आँख खुली तो अस्पताल के पलंग पर
अपने को पाया बकुलेशजी ने. पास में ही वसुधा, आनंद बाबू, पांडेयजी और गाँव से आया भाई
ज्ञानू चिंतित और उदासी से घिरे बैठे दिखाई दिए. उन्होंने कुछ कहना चाहा. वसुधा ने
उनके होठों पर पर अपना हाथ रख कर कुछ कहने से मना कर दिया.
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26
क्रेडिट डेबिट
अपने घर में ही किसी रिसोर्ट या फार्म हाउस के
आनंद का सुख बकुलेशजी को सहज ही मिल गया था. बरसात होते ही सामने का मैदान हरा भरा
हो जाता था। बकुलेशजी गैलरी में बैठकर बाहर के नज़ारे को देखते हुए ट्रांजिस्टर पर
विविध भारती सुनते या जब भी मन करता कुछ लिखने लगते थे. कई नई कविताओं का सृजन भी
यहीं सम्भव हुआ था।
यह बहुत आश्चर्यजनक था कि महानगर के पास का यह
टुकड़ा अब तक कांक्रीट में बदलने से बचा हुआ था. जब से इस घर में आये थे तभी से
सामने का मैदान खाली पडा हुआ था। अभी तक कोई नई कॉलोनी नहीं काटी गयी थी. जमीन के
इस छोटे से टुकड़े पर थोड़ी बहुत खेती भी होती थी. मौसमी सब्जियां वगैरह के अलावा
सोयाबीन और गेहूँ चने की पैदावार भी ली जाती थी. जमीन तो शायद किसी बिल्डर ने खरीद
ली थी लेकिन खेत की देखभाल वही किसान करता था, जिससे बायपास के पास अंतरराष्ट्रीय
स्टेडियम की योजना घोषित होते ही औने-पौने दाम पर हथिया ली गयी थी. किसान से
ज्यादा बिल्डर को पता था कि विकास के असली मायने क्या होते हैं.
हालांकि ऑपरेशन के बाद फिर से लिखने पढ़ने की
शुरुआत तो उन्होंने थोड़ा स्वस्थ होते ही अस्पताल में ही कर दी थी, फिर भी यहाँ
अपने घर की गैलरी में बैठकर लिखने का मजा कुछ और ही होता था. आज भी बहुत देर से वे
अपनी तख्ती थामें कुछ लिखने में व्यस्त थे.
घास के बीच बरसाती पानी के कुछ पोखर से बन गए थे
जिनमे कुछ बगुले अपनी चोंच गडाकर भोजन तलाश रहे थे। बादल घिर आये थे. हल्की
फुहारें शुरू हुई तो वातावरण में थोड़ी ठंडक घुल गई. हवा चली तो नीम की डालियाँ
लहराने लगीं . कविता लिखने में ध्यान मग्न बकुलेशजी को पता ही नहीं चल रहा था कि
पत्तियों से उछलकर पानी की बूंदों ने उनके शरीर को भिगो दिया है.. भीतर जब मन
संवेदनाओं की तेज बारिश में भीग रहा हो तो बाहर की हलचल का कैसे पता चल सकता है..
‘अब उठिए भी.. बहुत देर हो गयी भीतर आइये
आप..ज्यादा भीग गए तो जुकाम हो जाएगा..अभी अभी तो ठीक हुए हैं...!’ वसुधा ने
उन्हें गैलरी में से उठ जाने के लिए विवश कर दिया.
बकुलेशजी भीतर आये और अपनी कविताओं की पहली और सच्ची
श्रोता वसुधा को ताजी कविता सुनाने लगे..
चांदनी में नहाए
किसी ख़ूबसूरत लम्हे
में
लाड में आकर तुम
कहीं पूछ बैठो
कितना प्यार मिला
जीवन में ?
तो क्या कहूंगा मैं
!
दुनियादारी के
खाता-बही में
आधी सदी तक
प्रविष्टियों के उपरांत
कभी प्यार का कोई
रिकार्ड नहीं संजोया बेशक
मगर जो मन की एक
किताब है उसमें
हर पन्ने पर सबसे
पहले
स्वतः दर्ज हो जाता
है तुम्हारा प्रेम
इतनी बड़ी हो गयी है
पूंजी
कि बही-खाते की
रेखाओं से बाहर निकल रहे हैं आंकड़े
समुद्र के आयतन से
कुछ अधिक हो गया है उसका मान
धरती के घनत्व से
ज्यादा सघन है यह अर्जित प्रेम
संभव ही नहीं शायद
तुम्हारे प्रेम का
हिसाब रखना
आकाश जितने अगले
पन्ने पर
दर्ज नहीं हो पा रहा
मुझसे पिछला बाकी.
बाहर बारिश तेज हो गयी थी....तन को भीगने से
बचाने में तो सफलता मिल गयी थी.. पर भीतर जो
बरस रहा था उसका क्या?.....वसुधा ने अपनी भीगी आँखें पौंछते हुए ट्रांजिस्टर
की आवाज थोड़ी तेज कर दी.
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