Tuesday, June 5, 2018

उपन्यास :डेबिट क्रेडिट: ब्रजेश कानूनगो : दो


उपन्यास :डेबिट क्रेडिट: ब्रजेश कानूनगो

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पहली किताब का जश्न

‘मालवा बैंक’ के प्रधान कार्यालय में हिन्दी पखवाड़ा जोर शोर से मनाया जाता था. ‘हिन्दी दिवस’ याने 14 सितम्बर को मुख्य समारोह होता था जिसमें नगर में कार्यरत सभी शाखाओं,उप कार्यालयों के प्रधान और विभाग प्रमुख शामिल होते थे. जिसमें मुख्य रूप से हिन्दी में कार्य करने के संकल्प का वार्षिक नवीनीकरण किया जाता था. गृह मंत्रालय और वित्त मंत्रालयों से आये केन्द्रीय मंत्रियों के संदेशों को सबके समक्ष पढ़ा जाना अनिवार्य प्रक्रिया थी. पूरे पंद्रह दिनों तक हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्टाफ सदस्यों के बीच प्रतियोगिताएँ, गोष्ठियां आदि होती थीं. हिन्दी प्रभाग हिन्दी के प्रयोग की प्रगति के लिए काम कितना करता था यह तो नहीं कह सकते लेकिन हिन्दी पखवाड़े का उत्सव अतिरिक्त उत्साह से मनाकर यह प्रमाणित करने का भ्रम अवश्य पैदा हो जाता था कि बैंक में अन्य कार्यों की तुलना में राजभाषा को सबसे आगे रखा जाता है. सरकारी निर्देशों, नियमों अधिनियमों के अनुपालन में कोई कोताही नहीं बरती जाती है. 

इस पारंपरिक और वैधानिक उत्सव की शुरआत होने के दो दिन पहले ही बकुलेश का पहला संग्रह छपकर आया था. कुछ माह पूर्व वरिष्ठ कथाकार नागरजी की अनुशंसा सहित बकुलेश ने अखबारों में प्रकाशित अपनी रम्य रचनाओं की, जिन्हें साहित्य में व्यंग्य कहे जाने की मान्यता अभी ठीक से स्वीकृत हुई नहीं थी फिर भी नए लेखक उन्हें व्यंग्य लेख ही कहा करते थे, एक पांडुलिपि बनाकर दिल्ली के एक प्रकाशक को भेज दी थी. अनुशंसा नागरजी ने की थी तो प्रकाशक को स्वीकृति देना जरूरी हो गया. कोई छः सात माह बाद संग्रह की कुछ प्रतियाँ डाक से प्राप्त हो गईं थी.

किसी भी लेखक के जीवन में पहली किताब के आने का अपना सुख होता है. बकुलेश भी उसी  गौरव भाव से लबालब हो रहा था. लिखना छपना तो पंद्रह सोलह की कमसिन उम्र में ही हो गया था लेकिन ये पहली किताब बत्तीस बरस की उम्र में आ जाने से कई वरिष्ठ साहित्यकारों को अचरज भी हो रहा था. ‘ये भी कोई उम्र है किताब लाने की..इस उम्र में तो लेखक बच्चा ही होता है साहित्य संसार में..’

पता नहीं यह बकुलेश की भूल थी या ठीक हुआ कि हिन्दी दिवस के एक दिन पहले जब वह अपने विभाग के जीएम माथुर साहब से शुभारम्भ समारोह की रूपरेखा अनुमोदित कराने गया तो साथ में नए संग्रह की एक प्रति उन्हें भी सादर भेंट कर दी.

हिन्दी दिवस समारोह में इस बार भी वही हुआ जो हमेशा होता रहा था. अलग हुआ तो केवल यह कि मंत्रियों के संदेशों के वाचन और हिन्दी में कामकाज करने की शपथ विधि के बाद  माथुर साहब यकायक संचालन करते बकुलेश की ओर देखकर बोले –‘तुम्हारी किताब भी ले आओ बकुलेश, हिन्दी दिवस के अवसर पर एमडी से उसका विमोचन करवा लेते हैं.’

स्केल सेवन अधिकारी के बोल किसी निर्देश से कम नहीं होते.. क्या करता एक स्केल वन कारिन्दा बेचारा..दौड़ता हुआ गया और एक गुलाबी कागज़ में सद्य प्रकाशित संग्रह की कुछ प्रतियाँ लपेट लाया.. एमडी का स्केल कुछ होता नहीं, उसे सरकार नियुक्त करती है.. बकुलेश की पुस्तक का सरकारी विमोचन प्रबंध निदेशक के करकमलों से ‘ऑन द स्पॉट’ हो गया था...

उन दिनों बैंक में भी ‘ऑन द स्पॉट’ पर बड़ा जोर दिया जा रहा था. जिन नौकरी पेशा लोगों की ओर बैंके देखती भी नहीं थी, अब सीधे वेतन से रिपेमेंट की गारंटी होने के कारण स्कूटर से लेकर कार और मकानों तक के लिए ‘ऑन द स्पॉट’ उन्हें ऋण स्वीकृत किये जा रहे थे.

एमडी के हाथों किताब का विमोचन अन्य सहकर्मियों के लिए बहुत बड़ी बात थी. कार्यक्रम समाप्त होते ही कुछ साथी मन से तो कुछ जबरन बकुलेश को बधाई देने लगे.

पुस्तक के आकस्मिक विमोचन से जो व्यक्ति सबसे अधिक व्यथित हुआ वह और कोई नहीं हिन्दी साहित्य में प्रतिष्ठा अर्जित करता हुआ बकुलेश का मित्र युवा कवि कुमार था. पहले तो कुमार ने बधाई दी फिर बोला-
‘यह ठीक नहीं हुआ बकुलेश, किताब का विमोचन इस तरह थोडे किया जाना चाहिए. माना कि माथुरजी तुम्हारे बॉस के बॉस हैं लेकिन किताब तो तुम्हारी निजी रचना है. इतनी विनम्रता भी ठीक नहीं. तुम मना कर सकते थे.’
कुमार को पलट कर जवाब तो नहीं दिया बकुलेश ने लेकिन मन ही मन सोचने लगा..  
मना कैसे कर सकता था... दिन भर उनके नीचे काम करना होता था..विभाग प्रमुख से भी ज्यादा माथुर साहब उसको तवज्जो देते थे.. निर्देश का अनुपालन उसकी ड्यूटी थी.. न भी हो तो..अब तो यह आदत सी हो गयी थी..
लेकिन कुमार एतराज में बहुत दम था. हर लेखक का आत्म सम्मान होता है..बकुलेश केवल बैंक का मुलाजिम ही तो नहीं था..लेखक था और इसके साथ धीरे-धीरे एक्टिविस्ट की प्रतिबद्ध विचारधारा भी उसमें विकसित होती जा रही थी.

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जीवन में कई मित्र आए और गए लेकिन कुमार की दोस्ती ने बकुलेश की सोच समझ और लेखन की दिशा ही बदल दी थी। सबके जीवन में बचपन के कुछ प्यारे लंगोटिया यार होते हैं लेकिन कुमार की दोस्ती इससे भी थोड़ी ज्यादा आत्मीय थी। 
कुमार से बकुलेश की  मित्रता थोड़ी देर से ही हुई थी। पत्र-मित्रता के कुमार बड़े शौकीन थे। उस जमाने में खतों किताबत का बड़ा महत्व हुआ करता था। बकुलेश के लेखक मित्र ओम वर्मा और कुमार पत्र-मित्र थे। ओम कभी-कभी उनके वैचारिक और रचनात्मक पत्र अक्सर बकुलेश को दिखाया करते थे। पत्रों में प्रायः विचारधारा और कविताओं को लेकर दोनों के बीच छोटी-मोटी प्रबोधन कार्यशाला सी चला करती थी। 

यों उन दिनों अखबारों के लोकप्रिय व्यंग्य कॉलमों में कुमार के लेख यदा-कदा दिखाई दे जाते थे। पर वे इस तरह की छपास के मोह में ज्यादा न पड़े। उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़कर वैचारिक परिपक्वता ग्रहण करने का बेहतर रास्ता चुना। और लगातार समृद्ध होते चले गए।

कुमार और बकुलेश रचनात्मक रूप से एक ही समय में सक्रिय थे। लेकिन बकुलेश जहां उस दौर की लोकप्रिय पत्र-पत्रिकाओं में बालगीत, बालकथाएं, व्यंग्य, कहानियां, पत्र आदि निरंतर लिखकर अपनी जगह और पहचान बना रहे थे , वहीं कुमार महत्वपूर्ण साहित्यिक लघुपत्रिकाओं में प्रतिष्ठित हो रहे थे। साहित्य में नवोदितों को दिए जाने वाले  भारतभूषण पुरस्कार जैसे महत्वपूर्ण सम्मानों से उन्हें सम्मानित भी किया जाने लगा था। प्रगतिशील हिंदी साहिय जगत की समकालीन परंपराएं और वामपंथी चेतना उनकी रचनाओं और आचरण में शुरू से ही परिलक्षित होने लगी थीं।

आनन्द बाबू ने जब यूनियन के साहित्यिक प्रकोष्ठ के गठन की बात सोची तो सबसे पहले उन्हें कुमार और बकुलेश के नाम ही ध्यान में आए। बैंककर्मी रचनाकारों की एक संस्था बनाई गयी, जिसका उद्देश्य ही लेखन में रुचि रखने वाले बैंककर्मी साथियों को प्रोत्साहन देना था। साथ ही संस्था की गतिविधियों के जरिये बैंककर्मी रचनाकारों की वैचारिक और रचनात्मक दृष्टि को चेतना सम्पन्न बनाने का भी एक प्रयोजन इसमें निहित था। इस पहल से बैंक की ट्रेड यूनियन के कार्यों में भी वैचारिक गुणवत्ता को बल मिलने लगा.
उधर बैंक ने प्रधान कार्यालय से आर्थिक और बैंकिंग विषयों पर हिंदी में एक पत्रिका निकालने की योजना बनाई थी। वहां किसी ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो बैंकिंग के साथ हिंदी लेखन में भी दक्षता रखता हो। बकुलेश का चयन इस कार्य के लिए बिल्कुल उचित था। गृह पत्रिका भी यहीं से निकलती थी। आनन्द बाबू के प्रयासों से बैंक के प्रधान कार्यालय और क्षेत्रीय कार्यालयों में दोनों की पोस्टिंग में कोई ख़ास दिक्कतें भी नहीं आईं।

एक ही नगर में होने से बकुलेश और कुमार का मिलना जुलना अब रोज होने लगा. साहित्यिक प्रकोष्ठ की गतिविधियां शुरू हुई तो कुमार और बकुलेश कि मित्रता भी गहराती गई।
साहित्यिक प्रकोष्ठ के माध्यम से कई बुलेटिनों का प्रकाशन हुआ. साहित्य गोष्ठियों और सम्मेलनों में देश के लब्ध-प्रतिष्ठ साहित्यकारों के व्याख्यानों का सिलसिला चलता रहा. संस्था की कई इकाइयां भी बनी अलग अलग स्थानों पर. कविता कार्यशालाएं भी आयोजित हुईं जिनमें महत्वपूर्ण और वरिष्ठ चिन्तक, कवि, साहित्यकार बैंककर्मी लेखकों का मार्गदर्शन करने लगे.

संस्थाओं को गति देने और नेतृत्व की कुशलता के कई सूत्र कुमार में देखे जा सकते थे। आनन्द बाबू की तरह ही सांगठनिक नेतृत्व की कला उनके पास भरपूर थी, लेकिन इस क्षमता का उपयोग वे केवल साहित्य संगठनों के लिए ही सीमित करे हुए थे। ठीक भी था, कुमार को अभी कई कृतियों की रचना करनी थी।

‘चलो यार जो हुआ सो हुआ..किताब पर चर्चा हम अपनी गोष्ठी में कर लेंगे. कार्यक्रम भी व्यवस्थित करेंगे. तुम कहोगे तो ज्ञान जी को या प्रेमजी को मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित कर लेंगें.’ कुमार ने कहा तो बकुलेश की विचार तंद्रा टूटी.’

उसी शाम  इंदौर की प्रसिद्ध घमंडी मधुशाला में लस्सी पीकर बकुलेश की पहली किताब का जश्न मनाया गया. हिन्दी दिवस समारोह की तरह सभागृह खचाखच भरा हुआ तो नहीं था लेकिन कुमार और बकुलेश के अलावा तीन चार व्यक्ति फालूदा कुल्फी अवश्य खा रहे थे..
बिल का भुगतान कुमार ने बकुलेश को करने नहीं दिया.... आखिर आज बकुलेश का दिन था..पहली किताब की खुशी का दिन..



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भूत लेखक

बकुलेश आज फिर परेशान हो गया है. जब तब उसे अक्सर ऐसी कष्टदायक स्थितियों से गुजरते रहना पड़ता है. वैसे इन सब से कोई ख़ास दिक्कत भी नहीं है लेकिन एक सामान्य कर्मचारी की भी अपनी खुशियाँ और काम करने की कुछ सीमाएं होती हैं. लिखना, अनुवाद करना आदि जैसे काम उसकी नौकरी का हिस्सा हो सकते हैं. यह सब तो करना ही करना है. गैर हिन्दी भाषी एमडी को हिन्दी में भाषण अनुवाद करके देना भी जरूर उसकी ड्यूटी में आता है, चेयरमेन के आगमन पर भाषण तैयार करना भी सामान्य काम काज है लेकिन यह तो उसका शोषण ही कहा जाएगा कि जीएम को किसी चौराहे की रोटरी का उदघाटन करना हो तो वहां स्थापित होने वाली प्रतिमा के जीवन चरित्र और उसके व्यक्तित्व और कृतित्व के बारे में आलेख तैयार करके समय पर हस्तगत किया जाए. तैयारी के लिए इतना अध्ययन तो उसने कभी अपनी पढाई के दौरान भी नहीं किया था. लेकिन आज तो हद ही हो गयी थी.

संस्थान की गृहपत्रिका के सम्पादन की जवाबदारी बकुलेश के पास थी. ये अलग बात है कि सम्पादक की जगह नाम उसके बॉस का ही जाता था. सम्पादकीय और वरिष्ठ अधिकारियों के प्रेरक संदेशों के लेखन के साथ-साथ प्रूफ रीडिंग तक का काम बकुलेश को ही करना पड़ता था. अभी थोड़े दिन पहले ही सीजीएम का सन्देश आया था कि पत्रिका में ‘मॉर्निग वाक’ के महत्त्व पर एक लेख आना चाहिए. पत्रिका के मुख्य संरक्षक का सन्देश बकुलेश के इमिजिएट बॉस ही नहीं बल्कि पूरे संस्थान के लिए किसी प्रशासनिक निर्देश से कम नहीं होता. इस बात को कोई भी नौकरीपेशा जीव भली भांति समझ सकता है. यह बकुलेश की अपने काम के प्रति निष्ठा और समर्पण ही था कि उसने रात भर जाग कर ‘सुबह की सैर’ निबंध लिखा, जो सीजीएम के रंगीन चित्र के साथ पत्रिका के ठीक मध्य के चिकने पन्नों में प्रकाशित हुआ.

ये तो फिर भी मामूली बात थी. इससे भी बड़कर तो तब हुआ था जब वरिष्ठ महाप्रबंधक अंडमान-निकोबार द्वीप समूह से सरकारी खर्च पर पारिवारिक छुटियाँ मनाकर लौटे थे और उन्होंने कुछ तस्वीरें भेज कर पत्रिका के सम्पादक जी को निर्देश दिया कि इन्हें भी लगाइए गृहपत्रिका में.
सम्पादक वरिष्ठता में मुख्य प्रबंधक थे, उनके पदोन्नति साक्षात्कार अगले माह ही होने वाले थे. पत्रिका और हिन्दी-विंदी के जबरन माथे पड़े औपचारिक किन्तु वैधानिक काम से मुक्ति भी चाहते थे. एक रास्ता यह भी था कि यातो प्रतिष्ठित और टैक्स फ्री आय वाले ऑडिट विभाग में चले जाएँ, लेकिन इसमें हर पंद्रह दिन महीने में घर से दूर रहना जरूरी हो जाता. पदोन्नति हो जाती है तो सहायक महाप्रबंधक बनते ही किसी क्षेत्रीय कार्यालय में नियंत्रक बन कर सम्मानजनक स्थिति पाने के पूरे चांस थे. इसलिए ‘अंडमान निकोबार यात्रा-वृत्तांत’ उनकी खुशियों का खाता खोलने में सक्षम हो सकता था. यह बकुलेश का दुर्भाग्य ही कहिये कि न तो आजादी के पहले ‘काला पानी’ जेल यात्रा का गौरव उसके पुरखों को मिला था और न ही आजादी के बाद ‘अंडमान की मदमस्त समुद्री हवाओं’, का हनीमूनीय सुख भोगने का अवसर अब तक ले पाया था.
बॉस तो फिर बॉस होता है. बॉस का बॉस ईश्वर होता है. बकुलेश के बॉस ने विभाग में पदभार ग्रहण करते ही धमका दिया था- ‘भले ही तुम एमडी के मेसेज लिखते होंगे, लेकिन तुम्हारी सीआर याने गोपनीय चरित्रावली मुझे ही लिखना है’. बकुलेश समझदार था और बॉस की समझाइश को उसने तावीज बनाकर अपनी दाहिनी भुजा में बाँध लिया था. इसी हाथ में कलम पकड़कर बकुलेश कागज़ पर सृजन की गंगा बहा देता था. इसबार उसने गृहपत्रिका के पन्नों पर अंडमान के समुद्र के साथ साथ सेलुलर जेल के ऐतिहासिक गौरव और समुद्र के भीतर के कोरल्स के सौन्दर्य की अद्भुत छटा बिखेर देने में कोई कसर नहीं छोडी थी. यात्रा-वृत्तांत लेख के हर पेरा के बाद महाप्रबंधक और उनके परिवार का प्रकृति के बीच प्रफुल्लित चित्र चमक बिखेर रहा था. सम्पादक बॉस की आँखों में भी एक ख़ास तरह की चमक उत्त्पन्न हो रही थी..  आमतौर पर ऐसी चमक किसी पदोन्नति परीक्षा में सफल हुए अधिकारी की आँखों में अक्सर दिखाई देती है. लेख ने चमत्कार किया और एक माह बाद पत्रिका के सम्पादक सचमुच पदोन्नत हो गए. जैसी करनी वैसी भरनी तर्ज पर उन्हें अंडमान क्षेत्रीय कार्यालय के प्रमुख के रूप में नियुक्त कर दिया गया.

विज्ञान में स्नातक बकुलेश को अभी और हिन्दी सेवा करनी थी, इसलिए न तो प्रमोशन हुआ और नहीं मुक्ति मिली. उसने यथास्थिति में सुख के रास्ते तलाश लिए और हिन्दी में एमए करने के लिए विश्वविद्यालय में प्रायवेट छात्र के रूप में दाखिला ले लिया. इधर विभागीय हिन्दी पत्रिका के सम्पादन के लिए एक दक्षिण भारतीय पदोन्नति आकांक्षी प्रबंधक की नियुक्ति हो गयी. इस बीच बकुलेश की पूछपरख अब विभाग और उच्च प्रबंधन में काफी बड गयी थी. लेकिन परेशानियों का क्या कभी अंत हुआ है...
आज महाप्रबंधक बरदोलाईजी का सन्देश आया है. बकुलेश परेशान है... बरदोलाईजी पर्वातारोहण करके हाल ही में लौटे हैं. बकुलेश को आज रात घर पर हिमालय चढ़ना होगा. पत्रिका का नया अंक कल प्रेस में जाना है. 

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तैयारी बैठक 

गृहपत्रिका के नए अंक के लिए पर्वतारोही जीएम के जांबाजी अनुभवों को अभिव्यक्त करता एक साहसी लेख लिखने के बाद रात कोई दो बजे आंख लगी थी बकुलेश की।  जीएम बरदलोईजी की आत्मा को अपनी देह में प्रवेश कराके कलम की नोक की सहायता से  कागज की बर्फीली चट्टानों में पैर जमाते हुए कोई तीन हजार शब्दों का पहाड़ चढने के बाद उसने आखिर झंडा गाड़ दिया था। 
झंडा गाड़ने और उठाने में बड़ा फर्क होता है। आमतौर पर झंडा उठाना कार्य के शुभारंभ का द्योतक होता है जबकि झंडा गाड़ देना कार्य की पूर्णता और समापन की घोषणा करता है। बकुलेश की व्यथा यह थी कि झंडा गाड़ देने के बावजूद उसके कार्य का समापन कभी होता नहीं था।
सुबह के दस बजे होंगे फोन की घंटी बजी। हड़बड़ाकर बिस्तर छोड़ा और फोन उठाया। बॉस कृष्णनजी थे दूसरी ओर.                                         
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बकुल, आज थोड़ा जल्दी पहुंच जाओ दफ्तर। जीएम का मैसेज आया है, संसदीय समिति का निरीक्षण दौरा होना है। मैं भी पहुंच रहा हूँ। अर्जेंट मीटिंग बुलाई है सीजीएम साहब ने बोर्ड रूम में ठीक ग्यारह बजे।'  कृष्णनजी की आवाज में घबड़ाहट बहुत साफ सुनाई दे रही थी। 
संसदीय समिति के निरीक्षण दौरे के समाचार से ही उच्च प्रबंधन की देह में रक्तचाप के दौरे पड़ने लगते हैं।

‘सुनो, वसुधा आज अंकिता को स्कूल बस तक तुम छोड़ आना स्कूटर से, मैं जल्दी निकल रहा हूँ, और हाँ लंच बॉक्स मत रखना, मीटिंग में लंच पैकेट आ जायेगे आज. बकुलेश ने पत्नी को सूचना दी और बाथरूम में घुस गया.

प्रधान कार्यालय की नियुक्ति में एक बड़ा फ़ायदा यह रहता है कि महीने में कोई दस बारह शानदार लंच तो कार्यालय के खर्च पर ही हो जाते हैं. बकुलेश के लिए यह संख्या कभी कम नहीं होती. उसका विभाग ही ऐसा है कि मीटिंग भले ही किसी भी विभाग की क्यों न हो, राजभाषा ‘हिन्दी’ का प्रतिनिधित्व होना तो अनिवार्य होता है. राजभाषा विभाग का प्रमुख कोई भी रहे लेकिन उच्च प्रबंधन की ओर से सन्देश आता था कि बकुलेश मीटिंग में अवश्य उपस्थित रहे. केंद्र सरकार के निर्देश भी हैं और वैधानिक आवश्यकता भी है कि बैठक का कार्यवृत्त हिन्दी में तैयार किया जाए. अंगरेजी में चलने वाली बैठकों को हिन्दी में सुनने की कला बकुलेश ने बड़ी मेहनत से अर्जित कर ली थी. बैठक की कार्यवाई गौर से सुनने, नोट्स लेने और राजभाषा अधिनियम की आवश्यकताओं के अनुसार रिपोर्ट तैयार करने में एक विशेषज्ञ के तौर पर वह अपनी पहचान बनाने में सफल हो गया था.

घर से बैंक के प्रधान कार्यालय का भवन लगभग चार किलोमीटर के फासले पर ही था. पौने ग्यारह बजे बकुलेश बोर्ड रूम में उपस्थित हो गया था. दामोदरजी राउंड टेबल को कपडे से साफ़ करके कुर्सियों के आगे टेबल पर पदनामों की द्विभाषी पट्टियां व्यवस्थित कर रहे थे. बोर्ड रूम की देख भाल इन्ही के जिम्मे थी. बैठक शुरू हो जाने के बाद रूम से लगे हुए चायघर में वे  फिर सदस्यों के लिए चाय-बिस्कुट,पानी आदि के इंतजाम में व्यस्त हो जाते थे. बकुलेश की सीट बैठक की अध्यक्षता करने वाले अधिकारी के ठीक पीछे नियत थी. उसके बगल में अध्यक्ष अधिकारी के निजी सचिव को बैठना होता था. एक तरह से ये दोनों व्यक्ति बैठक के आँख कान होते. बैठक के दौरान समूची गतिविधि को अपने भीतर खींचते और बाद इन्हें पूरी बैठक की कार्यवाई को बाहर परोसना होता था. बुकुलेश अंगरेजी में ग्रहण करता था और हिन्दी में समूची कार्यवाही को कागज़ पर उगल देता था. एक तरह से वह मानवीय भाषा कन्वर्टर था.

ग्यारह बजते ही बोर्ड रूम की सारी कुर्सियां विभाग प्रमुखों से भर गईं थीं. सीजीएम के आने के पहले ही महाप्रबंधकों ने अपना स्थान ग्रहण कर लिया. बैठक का संयोजन योजना विभाग के महाप्रबंधक ने किया था इसलिए मुख्य महाप्रबंधक याने सीजीएम की अगवानी भी उन्हें करनी थी. वे स्वयं उनके महाकक्ष तक लिवाने गए. बैठक की अध्यक्षता सीजीएम साहब को ही करनी थी.
सीजीएम रामदयालजी ने जैसे ही बोर्ड रूम में प्रवेश किया सभी ने खड़े होकर उनका अभिवादन किया. निजी सचिव ने कुर्सी पीछे खींच कर सुविधाजनक रूप से आसंदी ग्रहण करने में उनकी मदद कर अपना पेशेवर कर्तव्य निभाया.
सीजीएम साहब के चेहरे पर कभी-कभार ही प्रफुल्लता देखने को मिलती थी. बहुत स्नेही और प्यारा स्वभाव होने के बावजूद न जाने ऐसी क्या बात थी कि उनके चेहरे पर हमेशा एक प्रकार की उदासी छाई रहती थी. पता नहीं क्या बात थी. हाँ यह अवश्य था सीबीआई जांच के दौरान उनसे थोड़ी बहुत पूछताछ एक बार जरूर हुई थी. उनके बैठक में आते ही बकुलेश ने भी  नमस्कार किया तो उन्होंने मुस्कुराते हुए स्नेह से अपना हाथ दाहिने कंधे पर रख दिया. बकुलेश अपने इसी हाथ से ही साहबों के लिए बहुत मेहनत से लेख आदि तैयार किया करता था. कंधे पर धरे सीजीएम के हाथ से प्रेरणा और प्रोत्साहन की ऐसी  अदृश्य ऊर्जा का संचार हुआ कि बकुलेश का चेहरा भी किसी महाप्रबंधक की तरह दमक उठा.
‘आई वेलकम...’ महाप्रबंधक ने बैठक की कार्यवाई शुरू की. बकुलेश ने हिन्दी में सुनना शुरू किया. थोड़ी देर में ही महाप्रबंधक हिन्दी में बोलने लगे.  ‘राजभाषा कार्यान्वयन समिति की बैठक में आप सबका स्वागत करता हूँ... गृह मंत्रालय से सूचना आई है कि अगले माह की दस तारीख को  नगर में स्थित बैंक शाखाओं में हिन्दी में होने वाले कामकाज और नियम, अधिनियमों के अनुपालन कार्य के निरीक्षण हेतु एक उच्च संसदीय दल आ रहा है. हमारे बैंक के प्रधान कार्यालय को इसके संयोंजन और व्यवस्थाओं का दायित्व सौंपा गया है. इसी की तैयारी हेतु आज यह महत्वपूर्ण बैठक आयोजित की गयी है....’  बकुलेश को कोई ख़ास दिक्कत नहीं हो रही थी क्योंकि जो कुछ महाप्रबंधक महोदय द्वारा कहा जा रहा था वह विषयवस्तु उसी ने कई बार तैयार करके बैठकों हेतु उपलब्ध कराई थी. और आज चूंकि बैठक ही हिन्दी के कार्यान्वयन के सन्दर्भ में हो रही थी तो हिन्दी तो प्रयोग में लानी ही थी.
‘माथुरजी  पॉइंट पर आओ!’ सीजीएम ने भूमिका लम्बी होते देख संयोजक जीएम को टोंका.
‘जी,सर!’ जीएम थोड़े खिसिया गए. 

पॉइंट याने मुद्दे की बात ये थी कि संसदीय समिति नगर के कार्यालयों में हिंदी में होने वाले कामकाज से संतुष्ट होकर श्रेष्ठ रिपोर्ट बनाए। चिंता इस बात की भी थी कि इतने सारे प्रयासों के बावजूद कार्यालयीन  कामकाज में हिंदी का प्रयोग लक्ष्य के अनुसार हो नहीं पा रहा था। जबकि हिंदी भाषी क्षेत्रों में सौ प्रतिशत कामकाज राजभाषा में ही किया जाना अपेक्षित है।
वैसे त्रैमासिक प्रगति रिपोर्ट में सारे कार्यालय लक्ष्य प्राप्त कर लेने की सूचना देते है किंतु वस्तुस्थिति इससे बिल्कुल भिन्न होती है। संसदीय समिति से ये सब छुपाना बहुत कठिन होता है। किसी भी हालत में गलत बयानी से संकट की स्थिति बन जाने की पूरी आशंका रहती है। कार्यवाही होने पर कार्यालय प्रधान की नौकरी तक खतरे में  पड़ सकती है। 
'भाई, जैसे भी हो आप लोग समिति को पूरी तरह संतुष्ट करके विदा करें। सरकार को श्रेष्ठ रिपोर्ट ही जाना चाहिए।' सीजीएम ने लगभग अंतिम आदेश सुनाते हुए कहा।

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सर, समिति के सदस्यों को यदि हम अच्छे से इन्टरटेंन करें तो वे अच्छी रिपोर्ट दे देते हैं।' मार्केटिंग विभाग के प्रमुख मल्होत्राजी ने थोड़ा संकोच के साथ अपनी बात आगे बढ़ाई 'सर मैं जब पंजाब के एक बैंक में प्रतिनियुक्ति पर था तो संसदीय समिति को निरीक्षण कराने का मौका मुझे मिला था। निरीक्षण बैठक तो अपनी जगह अच्छी ही होती है फिर भी समिति के सदस्यों को हमने अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के दर्शन कराए थे। उसके बड़े अच्छे परिणाम आए सर। निरीक्षण रिपोर्ट भी बढ़िया प्रस्तुत की गई।
'तो देखिए माथुरजी, कुछ इस एंगल से भी सोंचकर देखें आप।'  सीजीएम बोले।

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सर, लेकिन नियमानुसार यह सब नहीं किया जा सकता। होटल में भी उन्हें नही ठहरा सकते,सरकारी गेस्ट हाउस बुक करना पड़ता है। हाँ यदि किसी कारण से वह उपलब्ध न हो तो ही फाइव स्टार होटल में व्यवस्था की जा सकती है।' माथुर साहब ने स्पष्ट किया।
'सर, अगले माह नगर के सारे सरकारी गेस्ट हाउस बुक हैं। उन्हीं दिनों प्रदेश सरकार 'इन्वेस्टर मीट' आयोजित कर रही है, इसलिए मंत्री गण और सरकारी अधिकारियों के लिए पहले से ही सारे बुक हो चुके हैं।' प्रधान कार्यालय के जनसंपर्क अधिकारी ने नई और हितकारी जानकारी दी।
'तो फिर माथुरजी, सरकारी अतिथि गृहों की अनुपलब्धता का एक लेटर सक्षम अधिकारी से प्राप्त कर लो। इसके साथ सबसे बढ़िया होटल के कमरे बुक कर लीजिए। बैठक भी वहीं के हॉल में हो जाएगी। सब तरह से यह ठीक होगा।सीजीएम ने समर्थन का ठप्पा लगा दिया। 

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सर, बैठक के अगले दिन शनिवार है, समिति के माननीय सदस्यों को हम उज्जैन ले जाकर महांकाल बाबा के दर्शन करा सकते हैं। मल्होत्राजी ने फिर उत्साहित होते हुए सुझाव दिया।
'सर जो वहां न जाना चाहें उन्हें माँ अहिल्या के किले और पावन नर्मदा घाट दर्शन के लिए महेश्वर भी ले जा सकते हैं। समिति के सदस्य वहां माहेश्वरी साड़ियों के निर्माण का भी जायजा ले सकेंगे।' पीआरओ बोले।
'हाँ, सर ये बढ़िया रहेगा।' स्टाफ प्रशिक्षण केंद्र की प्रमुख सुश्री कमला जरीवाला बेहद खुश होकर बोल पड़ी।
बैठक में हंसी की एक लहर सी दौड़ गई। लेकिन हमेशा की तरह सीजीएम साहब के चेहरे पर मुरदनगी बनी रही।
आखिर में सबको काम बांट दिए गए। मानव संसाधन प्रभारी के जिम्मे एस्कॉर्ट अधिकारियों की व्यवस्था,  मल्होत्राजी के जिम्मे ज्योतिर्लिंग दर्शन और सुश्री जरीवाला को महेश्वर के साड़ी बुनकरों से समिति के सदस्यों की मुलाकात करवाने के आदेश हो गए। जनसंपर्क विभाग को अच्छी वातानुकूलित गाड़ियों की व्यवस्था देखनी थी। निरीक्षण के लिए हिंदी और अंग्रेजी में द्विभाषिक रूप से  प्रस्तुत किये जाने वाले  प्रपत्रों, रिपोर्टों और बैठक आयोजन और समन्वय का भार ग़ैरहिंदी भाषी राजभाषा प्रभारी श्री कृष्णनजी के कंधों पर था, वे भाग्यशाली रहे उनके पास बकुलेश जैसा कर्मठ जिन्न उपलब्ध था । किसी को कोई दिक्कत नहीं थी।  पदोन्नति सूची पर आखिरी हस्ताक्षर सीजीएम साहब के जो होते थे। कैरियर की सबको चिंता रहती है.
आभार प्रदर्शन के साथ बैठक खत्म हुई। दो बज चुके थे। लंच हमेशा की तरह बहुत स्वादिष्ट था।

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12
महाकाल की जैसी इच्छा

संसदीय समिति के दौरे की खबर तुरंत ही यूनियन कार्यालय भी पहुंच गई थी।  आम कर्मचारी यूनियनों की अपेक्षा इस छोटे से बैंक में अधिकारी, कर्मचारी संगठनों की भूमिका बहुत बड़ी और व्यापक  थी। प्रबंधन और नेताओं का आपसी सौहार्द एक मिसाल तो था ही बल्कि कई मामलों में नेताओं की सूझबूझ और विधिक एवं औद्योगिक संबंधों के   परिप्रेक्ष्य में उनकी  दूरदृष्टि और पूर्व तैयारी का केंद्रीय कार्यालय के अधिकारी और चैयरमेन तक लोहा मानते थे।
छोटा सा सहयोगी बैंक था बड़े समूह का। चार सौ कार्यालयों में से अधिकांश देश के मध्य क्षेत्र में व्यवसाय कर रहे थे। प्रधान कार्यालय भी मध्यप्रदेश के  मझले कद के लेकिन तेजी से महानगर में बदलते शहर इंदौर में था. इसी वजह से क्षेत्र के ग्राहकों और लोगों से बहुत निकटता से जुड़ा हुआ था। समाज के हरेक वर्ग की तमाम गतिविधियों, सुख-दुःख में बैंक की हिस्सेदारी प्रत्यक्ष अनुभव की जा सकती थी. ग्राहक भी बैंक के स्टाफ को परिवार के सदस्यों की तरह मानते थे। कर्मचारी भी बहुत व्यक्तिनिष्ठ और मन से ग्राहकों के काम करने की कोशिश में लगे रहते थे। प्यार से  ‘मालवा बैंक’  पुकारते तो ग्राहक संबंधों में आत्मीयता का भाव सहज पैदा होने  लगता था।

यूनियन के नेताओं की भी ग्राहकों और क्षेत्र के नागरिकों में इतनी साख थी कि वक्त पड़ने पर कई बार अपनी दिक्कतें मैनेजमेंट को बताने से पहले आनंद बाबू या जिंदल जी के पास लेकर सीधे यूनियन ऑफिस चले आते थे। 
आनन्द बाबू और जिंदल जी की जोड़ी कर्मचारी हित की कहानी लिखने के संदर्भ मे  ख्यात स्क्रिप्ट राइटर जोड़ी 'सलीम जावेदकी तरह ही बैंककर्मियों में लोकप्रिय और प्रतिष्ठित हो गयी थी । इस जोड़ी का साथ सफलता की गारंटी मानी जा सकती थी। एक ओर जहां बैंक और बैंकिंग उद्योग में कर्मचारी हितों को लेकर आनन्द बाबू की बहुत दूरदृष्टि थी। वहीं जिंदलजी का नियमअधिनियम और प्रक्रियागत कार्यवाइयों के बारे में बहुत गहरा अध्ययन और मजबूत पकड़ थी। बड़े बड़े कर्मचारी-प्रबंधन मामलों के निपटान में उनके लिखे जवाबी पत्रों का कोई तोड़ ही नही होता था।

आनन्द बाबू राष्ट्रीय स्तर के नेता थे। या यों कहें कि बैंकिंग उद्योग में वे ऐसे विचारक नेता के रूप में जाने जाते थे जो सदैव बैंकिंग क्षेत्र के गुणवत्तापूर्ण और सार्थक विकास के बारे में ही  सोचते रहते थे। उनके काम करने का तरीका बहु आयामी था। कलासंस्कृतिसमाज सेवा और साहित्य के जरिये भी वे बैंककर्मियों में वैचारिक चेतना जगाने के लिए सदैव प्रयासरत  रहते थे। बैंक और बैंककर्मी संघर्षों के लिए उन्होंने कभी पदोन्नति स्वीकार नहीं की. जबकि बैंक में उनकी भर्ती एक प्रोबेशनरी अधिकारी के रूप में हुई थी.
उच्चस्तरीय संसदीय समिति के अध्यक्ष को वे बैंकिंग उद्योग के सन्दर्भ में कुछ नवोन्मेषी सुझावों और कर्मचारी हितों को लेकर यूनियन की ओर से ज्ञापन देना चाहते थे। प्रधान कार्यालय के राजभाषा विभाग में आनन्द बाबू और जिंदलजी जब खुद चलकर आये तो कृष्णनजी महाप्रबंधकजी के पास संसदीय समिति के दौरे की व्यवस्थाओं के बारे में चर्चा करने ही गए हुए थे। 
बकुलेश ने उन्हें बैठने का आग्रह किया। बहुत सहज थे दोनों नेता। संसदीय समिति के आगमन का समय और सदस्यों के नामों की जानकारी लेकर वे लौट गए। जाते जाते आनन्द बाबू ने बकुलेश से कहा कि वह कृष्णनजी को बता दे कि समिति के अध्यक्ष से यूनियन के नेतागण मिलना चाहते है अतः अनुमति लेकर उन्हें सूचित कर दें।
बकुलेश ने जब बॉस को बताया तो कृष्णन जी चिंतित हो उठे। कहीं कोई हंगामा न जो जाए। जीएम माथुर साहब का न जाने क्या रुख होगा इस भेंट के सम्बंध में। वे उल्टे पांव आनंद बाबू के आने और प्रयोजन को बताने जीएम माथुर साहब के कक्ष की और दौड़ पड़े।
कृष्णनजी ने महाप्रबंधक जी के कक्ष में जैसे ही प्रवेश किया और जो दृश्य वहाँ देखा तो अचरज में पड़ जाना स्वाभाविक था. आनन्द बाबू और जिंदलजी माथुर साहब के साथ बैठे चाय की चुस्कियां ले रहे थे। महाप्रबंधक ने कृष्णनजी को यूनियन नेताओं से समिति अध्यक्ष से भेंट के लिए कार्यक्रम में समय सुनिश्चित करने के निर्देश तत्काल वहीं दे दिए।

इधर बकुलेश निरीक्षण प्रारूप में जानकारियों और आंकड़ों को सजाने के काम में व्यस्त हो गया. सारी जानकारी हिन्दी और अंगरेजी दोनों भाषाओं में प्रस्तुत करना जरूरी था. सारे विभागों द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों को पहले युक्ति-युक्त बनाना फिर सबका समेकन करना, तर्कसंगत दिखाना, लक्ष्य को साधना. सब कुछ नए सिरे से करना पड़ रहा था. पत्रिका सम्पादन का काम भी पीछे रखना पडा. यह काम अचानक ही निकल आया था. प्राथमिकता में जो था. घंटे-घंटे में प्रगति की सूचना सीजीएम के पास पहुंचानी पड़ रही थी.
लगभग एक सप्ताह की कड़ी मेहनत के बाद निर्धारित प्रारूप में रिपोर्ट तैयार हो गयी थी. आकर्षक स्पाइरल बाइंडिंग करवाया गया. माथुर साहब का मानना था कि अच्छे प्रेजेंटेशन से आधी सफलता मिल जाती है. बाकी सफलता के लिए तैयारी बैठक में काफी डिस्कस हो चुका था. आगे वही होना था जो महाकाल की इच्छा रहेगी...महेश्वर में भी तो वहीं बसते हैं...!  

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पेंशन योजना की मांग

‘मालवा बैंक’ में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने में सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि वहां सेवानिवृत्ति  होने पर पेंशन की सुविधा नहीं थी. हालांकि भविष्य निधि की राशि नियमानुसार कर्मचारी के वेतन से कटकर उसके फंड में जमा होती रहती थी, इतनी ही राशि नियोक्ता भी जमा कर देता था. नौकरी से मुक्ति के समय यह संयुक्त राशि कर्मचारी को मिल जाती थी. जो कि बहुत कम भी नहीं होती थी. उस वक्त बैंक ब्याज दरें भी काफी अच्छी थीं , पांच वर्षों में एफडी की राशि लगभग दुगनी हो जाया करती थी. सामान्यतः जिन लोगों के बच्चे रोजगार आदि में लगकर सक्षम हो जाते थे. वे पीएफ के पैसे को बैंक में लम्बी अवधि के लिए मियादी जमा खाते  में रखकर चिंता मुक्त हो जाते थे. कुछ लोग एफडी पर मिलने वाले ब्याज को प्रतिमाह प्राप्त करके घर चलाते थे. याने जीवन का सारा सुख सेवानिवृत्त बैंककर्मी की जमा राशि और उस पर मिलने वाले ब्याज पर निर्भर करता था. अधिकतर बैंककर्मी पेंशन सुविधा न होने पर भी संतुष्ट थे. हर व्यक्ति तो आनंद बाबू की तरह चिन्तक और दूरदृष्टा नहीं होता.

केन्द्रीय कर्मचारियों के जब चौथे वेतन आयोग की सिफारिशें आईं तो आनंद बाबू ने देखा कि तुलनात्मक रूप से बैंककर्मियों का तो बड़ा घाटा हो रहा है. मंहगाई दरों में बढ़ोत्तरी के साथ पीएफ राशि में जमा होने वाली राशि का मंहगाई भत्ते से तालमेल ही नहीं बैठता है. ऊपर से सेवानिवृत्ति के बाद अपनी बचत पर मिलने वाले ब्याज की राशि भी ब्याज दरों के उतार-चढ़ाव पर निर्भर रहती है. कब ब्याज दरों में कमी आ जाए कुछ कहा नहीं जा सकता. भविष्य अनिश्चित होता है. जबकि पेंशन की सुविधा प्रतिमाह नियमित आय की गारंटी होती है. एक तरह से पेंशनर व्यक्ति अपने को आर्थिक और सामाजिक रूप से सुरक्षित पाता है.

आनन्द बाबू का मानना था कि बैंक कर्मचारी का सेवानिवृत्त जीवन तभी सामाजिक रूप से सुरक्षित रह सकता है जब पेंशन के रूप में उम्र भर कर्मचारी को निश्चित राशि मिलती रहे. जिस पर महंगाई के साथ महंगाई भत्ते में भी अनुपातिक रूप से वृद्धि होती रहे.

आनंद बाबू, जिंदलजी और उनके कर्मठ साथी इस मांग को लेकर बहुत गंभीर थे. जब भी अवसर मिलता हर फोरम पर इस बात के लिए आवाज उठाते थे. कई मांग पत्र इस सन्दर्भ में भारतीय बैंक संघ, रिजर्व बैंक, वित्त मंत्रालय सहित अपने बैंक के प्रबंधन तक को तथ्यों सहित दे चुके थे.

सांसदों और लोक सभा अध्यक्ष को भी इस विषय में उनके द्वारा ज्ञापन भेजा जा चुका था. वे तो पूरे बैंकिंग उद्योग में पेंशन योजना को लागू करवाना चाहते थे. लेकिन किसी भी नई योजना को लागू करने में कुछ सीमाएं और व्यावहारिक दिक्कतें भी होती हैं. और सभी बैंकों के कर्मचारियों को इस पर राजी करना भी बहुत कठिन था. ‘मालवा बैंक’ बहुत छोटा था कर्मचारियों की संख्या भी पांच छह हजार के करीब थी. छोटे बैंक में इसके लिए संघर्ष की शुरुआत थोड़ी आसान भी थी. इसलिए तय किया गया कि किसी तरह ‘मालवा बैंक’ के प्रबंधन को राजी किया जाए कि कम से कम अपनी बैंक के कर्मचारियों के लिए तो प्रस्ताव बनाकर वे आगे भेजें.

किन्तु  बैंक के अपने साथियों को सहमत करने में भी बहुत जद्दोजहद करना पडी, एक मुश्त मिलने वाली राशि और पेंशन से मिलने वाली नियमित आय के दूरगामी लाभ सबको अलग अलग जाकर समझाए गए. धीरे धीरे आम सहमति बनती गयी, फिर भी अपवाद स्वरूप कुछ असंतुष्ट बने रहे. कुछ अल्पमत यूनियन भी इस पहल के पक्ष में नहीं थीं.

काफी मेहनत और अध्ययन के बाद ‘मालवा बैंक’ में पेंशन योजना का प्रारूप बनवाया गया. कुछ बाहरी विशेषज्ञों की सलाह भी ली गयी. बैंक के प्रबंधन को भी अब तक समझ में आ गया था कि यह एक बहुत जरूरी और बैंकिंग उद्योग में बहुत महत्वपूर्ण शुरुआत है. उच्च प्रबंधन के कई बड़े अधिकारी अन्य बैंकों से भी मालवा बैंक में प्रतिनियुक्ति पर पदस्थ थे. अन्हे भी इसमें  अपना भविष्य सुरक्षित दिखने लगा था. आखिर योजना के प्रारूप को प्रबंधन ने अपनी सकारात्मक टिप्पणी और सहमति के साथ भारतीय बैंक संघ आदि सहित सक्षम फोरम की ओर अग्रेषित कर दिया.

इस बात को सात आठ साल गुजर गए थे.. पेंशन की मांग की लड़ाई लगातार अब भी जारी थी.. संसदीय समिति के चेयरमेन को आज आनन्द बाबू ने फिर ज्ञापन सौंपा था..


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भीम के बीम

प्रकृति की अद्भुत छटा निहारते हुए सबकी थकान जैसे गायब हो गयी थी. सागौन के घने जंगल को चीरती हुई कमांडर जीप अब घुमावदार पहाडी रास्ते पर चढ़ाई कर रही थी. लगभग पांच किलोमीटर लंबा छोटा-सा घाट था यह. पहाड़ियों के ऊपर से पानी के गिरने से  बीच का कुछ रास्ता टूट भी गया था. हालांकि डामरीकरण किया हुआ था पर पहाडी रास्तों पर गढ्ढे हो जाना आम बात होती है.
 
बागली में ग्रामीण बच्चों के तीन दिवसीय व्यक्तित्व विकास शिविर का आज ही समापन हुआ था. बैंक की बागली शाखा के साथी युगल जोशी का बहुत आग्रह था कि शहर में तो तंग बस्ती के बच्चों के लिए काम करते ही हैं लेकिन यदि आदिवासी क्षेत्र के बच्चों के लिए भी कुछ शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए काम हो तो वे शिविर स्थल आदि सहित बच्चो को लाने-लेजाने  की व्यवस्थाएं करवा देंगे. आनंद बाबू ने भी सहमति दे दी थी और इंदौर से कोई 80 किलोमीटर दूर ग्रामीण और आदिवासी अंचल के कस्बे में शिविर संपन्न हुआ था. शनिवार रविवार के साथ सोमवार को स्थानीय अवकाश होने से बच्चों की भी बड़ी संख्या में सहभागिता हुई. पालकों और स्थानीय प्रबुद्ध जनों ने भी पहली बार ऐसे शिविर को देखा समझा और खुशी जाहिर की थी.

बैंक के क्षेत्रीय प्रबंधक श्री साबू भी अपनी रूचि से सम्मिलित हुए. तीन दिनों के लिए उन्होंने अपना मोबाइल फोन भी बंद कर दिया, वैसे भी पहाड़ियों से घिरे इस क्षेत्र में सिग्नल बड़ी मुश्किल से ही मिल पाते थे. सारे प्रशासनिक तनावों से तीन दिनी मुक्ति का यह रचनात्मक रास्ता उनके पास सहज उपलब्ध था. हालांकि धाराजी यात्रा में वे शामिल नहीं हुए. शिविर समाप्त हो गया था इसलिए उनका समय पर मुख्यालय पहुँचना जरूरी था.
 
शिविर के बाद युगल जोशी ने जब आनंद बाबू और उनकी टीम के साथियों को बागली के आसपास के प्राकृतिक सौन्दर्य का आनंद लेने के लिए अनुरोध किया तो पहले तो ज्यादातर सदस्यों ने ना-नकुर की. सबकी इच्छा तीन दिन बाद वापिस घर लौटने की थी. लेकिन नर्मदा में नौकायन करके धाराजी पहुँचने के रोमांच ने जब थोड़ा सा आकर्षण पैदा किया तो आखिर में सब तैयार हो गए.

जीप अब घाट के सर्वोच्च पर थी. जैसी की आमतौर पर परम्परा होती है इस स्थान पर एक  बड़े शिलाखंड पर सिन्दूर चढ़ाया हुआ था. यह ‘भेरू महाराज’ का मंदिर था. मंदिर क्या था खजूर के पत्तों की एक छत बना दी गयी थी. शीतल जल से भरे कुछ मटके लाल कपड़ों से ढके वहां रखे हुए थे. दाढी बढाए एक बाबाजी जो शायद पुजारी रहे हों या चौकीदार हों या गुप्तचर, कुछ कहा नहीं जा सकता, जीप के धीमा होते ही बोले- ‘जल पी लीजिये भाई साहब!’
सब ने ठंडा जल ग्रहण किया. भेरू महाराज के ओटले पर दुबेजी ने पचास रुपयों का नोट चढ़ाया तो सभी लोगों ने कुछ न कुछ वहां भेंट चढ़ाई . खतरनाक घाट और दुर्गम रास्तों पर सुरक्षित यात्रा संपन्न होने पर यह एक तरह से ईश्वर के प्रति आभार प्रदर्शन ही समझा जा सकता था. 

अब जीप घाट से नीचे उतर रही थी.

‘सर, घाट उतरते ही हम पूंजापुरा पहुँच जायेंगे.’ आगे की सीट पर बन्दूक धारण किये सेठ छगन ने आनंद बाबू को जानकारी दी. वैसे यह सूचना जीप पर सवार सभी के लिए थी. जिनमें बकुलेश, युगल जोशी, पंडितजी, टोकरिया जी और युगल जोशी के कुछ स्थानीय मित्र शामिल थे.

पूंजापुरा में छगन सेठ के यहाँ स्वल्पाहार लेना था. फिर वहां से रामपुरा गाँव के नर्मदा तट से बोट में सवार होकर नर्मदा प्रवाह की विपरीत धारा में यात्रा करते हुए धाराजी पहुँचने की योजना थी.
थोड़ी ही देर में पूंजापुरा में सेठ छगन जी के ओसारे में दही की लस्सी और मूंग की दाल के पकौड़ों की प्लेट सबके हाथ में थी. इस वक्त शाम के सवा चार बज रहे थे.

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रामपुरा पहुँचने में अभी लगभग बीस-पच्चीस मिनट और लगने थे.  जीप मैदानी जंगल के  कच्चे रास्ते से गुजर रही थी. छगन सेठ का बन्दूक लेकर चलना अब तक स्पष्ट हो चुका था. अकेले-दुकेले लोगों को लूटने की घटनाएँ इस निर्जन इलाके में घटती रहती थीं, दूसरे जंगली जानवरों का ख़तरा भी बना रहता था. सेठजी ने बताया था कुछ हफ्ते पहले ही एक बाघ नें पास की बस्ती के पशुओं पर हमला कर दिया था. एक नवजात शिशु को भी कोई जानवर उठा ले गया था. सुरक्षा के लिए सावधानी रखना ही ठीक होता है. और फिर आज तो समाज की नामी-गिरामी हस्तियाँ भी साथ में थीं.

एकाएक जीप के रुकते ही सागवान के सूखे पत्तों के दबने से टायरों से कुछ भिन्न आवाज आई.
‘क्या हुआ?’ टोकरिया जी ने घबराकर पूछा.
‘सर, ज़रा रुककर देखिये..ये भीम पहाड़ियाँ हैं.’ छगन सेठ ने इशारे से बताया.
‘ये उन महलों के स्तम्भ हैं सर जिनसे भीमसेनजी सात महल बनाने वाले थे.’ अबकी बार युगल जोशी ने बताया.
युगल पिछले तीन साल से इसी क्षेत्र में शाखा प्रबंधक थे तो अनेक कहानियां उन्होंने सुन रखी थीं. उन्होंने आगे बताया-‘सर, पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान इस क्षेत्र का भ्रमण किया था. तब भीम ने तीन फुट व्यास के दस से तीस फुट लम्बी कॉलम बीम आकार में लोह मिश्रित विशेष पत्थरों को इकट्ठा किया था. जो सात स्थानों पर सात पहाड़ियों की तरह दिखाई देतीं हैं.’

‘हाँ, आप कुछ हद तक ठीक कह रहे हैं युगल भाई, प्रसिद्द पुरातत्वविद प्रो. वाकणकर जी ने भी इन पत्थरों पर अनुसंधान किया था, वास्तव में इन पहाड़ियों की ऊंचाई 40 से 45 फुट तक है.’ बकुलेश ने पत्रिका के लिए एक लेख संपादित करते हुए पढी हुई जानकारी के आधार पर बात को पूर्णता दी.

लगभग दसेक मिनट के सफर के बाद रामपुरा गाँव में नदी के किनारे खड़े बोट के नजदीक सब लोग पहुँच गए थे. नदी पर कोई पक्का घाट नहीं था बल्कि पीली मिट्टी के कारण फिसलन भी हो रही थी. छगन सेठ ने जीप में से डीजल से भरा का एक केन निकालकर बोट चालक को दिया. बोट की हालत कोई ख़ास ठीक नहीं थी. युगल जोशी के अनुरोध पर सेठजी ने जुगाड़ बैठाया था.  सेठजी ने बहुत शानदार मेजमानी की थी, उनके कुछ लोग यहाँ मोटर सायकलों से पहले ही पहुँच गए थे. उन्होंने सबको हाथ पकड़कर बोट में ठीक से सवार किया. इसके बाद उन्हें मोटर सायकलों से धाराजी पहुंचकर नौका यात्रा करते हुए वहां पहुँचने वाले अतिथियों का स्वागत भी करना था.

बोट चालक ने एक-दो बार डीजल इंजिन की रस्सी खेंची तो फट फट की आवाज करता स्टार्ट हो गया. बोट भी धीरे-धीरे नर्मदा में आगे बढ़ने लगा...
‘सर, जिस दिशा में हमलोग जा रहे हैं उसके ठीक विपरीत ज्योतिर्लिंग ओम्कारेश्वर स्थित है. जोखिम लेने वाले कई जांबाज तीर्थ यात्री ओम्कारेश्वर से धाराजी नाव से यात्रा करके आते हैं’ युगल जोशी ने बातचीत शुरू की.

नदी के बीच बोट के यात्री आसपास की ऊंची खडी पहाड़ियों को देखते हुए रोमांचित हो रहे थे.. लेकिन असुरक्षा का कोई भाव भी उनके चेहरों पर स्पष्ट दिखाई दे रहा था... यह पसीना था या नदी की आद्रता या उमस...कुछ न कुछ तो जरूर था उस वक्त वहां की हवा में.
  
नर्मदा का जल इतना साफ़ था कि नीचे नजदीक की काली काली चट्टाने साफ़ दिखाई दे रहीं थी.. देखकर थोड़ा डर भी लगने लगता था. बकुलेश ने अपना हाथ नदी के जल में डाला तो एक मछली के स्पर्श की अनुभूति से तुरंत हाथ बाहर खींच लिया. दरअसल उसने पानी में पड़े खजूर के किसी पत्ते को स्पर्श कर लिया था... पता नहीं किस आशंका में सब खामोश हो गए थे...

बोट बहुत धीमी गति से आगे बढ़ पा रही थी.. अब सिवाय चालक के उसमें कोई स्थानीय व्यक्ति सवार नहीं था. सेठजी वापिस पूंजापुरा लौट गए थे और बाकी लोग धाराजी की ओर मोटर सायकलों से प्रस्थान कर चुके थे. युगल जोशी ही एक मात्र ऐसा व्यक्ति था जिसकी तीन साली स्थानीयता के भरोसे सब अतिथि अपना हौसला बनाये रखने के प्रयास में जुटे हुए थे.
‘यार जोशी जी, यह धाराजी में आखिर है क्या वहां ? जो तुम हमें ले जाकर दिखाना चाहते हो?’ टोकरिया जी ने यात्रा की घबराहट से थोड़ी राहत पाने के उद्देश्य से चुप्पी भंग की.
‘टोकरिया जी, धाराजी में नर्मदा एक जलप्रपात के रूप में कोई 50 फुट नीचे गिरती है’
‘अरे तो क्या हमें भी गिराओगे वहां ?.
डर के बावजूद बोट में जोरदार ठहाके लग उठे. बोट भी बढ़ रहा था आगे. युगल ने भी बात आगे बधाई.
‘नर्मदा की धारा के यहाँ गिरने से पत्थरों की शिला पर 10 -15 फुट व्यास के कई गड्ढे हो गए हैं जैसे ओखलियाँ हों. इन्ही ओंखलियों में बहकर आये पत्थर घूम घूम कर घिसते जाते हैं और शिवलिंग का आकार ले लेते हैं. यहीं से थोड़ा आगे सीता वाटिका है जहां सीता मंदिर भी स्थित है. सीताकुंड, रामकुंड और लक्षमण कुंड हैं. चैत्र मॉस की अमावस को मालवा और निमाड़ वासियों का एक मेला भी यहाँ लगता है. कुछ यात्री राजस्थान से भी एकत्र होते हैं. स्थानीय स्तर पर इसे ‘भूतड़ी अमावस’ कहा जाता है. मानसिक रोगियों के कष्ट निवारण की भी यहाँ स्नान करने की मान्यता है.’ युगल के प्रवचन को पंडितजी बड़े ध्यान से सुन रहे थे.

अन्धेरा अब घिरने लगा था.. धाराजी कब पहुंचेंगे किसी को कोई जानकारी नहीं थी.
‘भैया, कितना और चलना है?’ आनन्द बाबू ने चालक से पूछा.
‘सर बोट में थोड़ा दिक्कत है, रफ़्तार ही नहीं पकड़ रही..देर तो लगेगी..डबल समय लग जाएगा.’ चालक ने इत्मीनान से कहा.
‘जब रात ही हो जायेगी तो वहां क्या दिखाई देगा.. प्रपात और ओखलियाँ कुछ भी तो नहीं..’ बकुलेश ने कहा.
‘जोशीजी अभी थोड़े दिन पहले इसी धाराजी में हुए हादसे की खबर आई थी ना?’ दुबेजी ने जिज्ञासा जताई.
‘हाँ, इसी धाराजी की घटना है वह, कई तीर्थ यात्री प्रवाह में बहकर मर गए थे.’ इस बार आनंद बाबू ने बताया. ‘ भूतड़ी अमावस्या के दिन जब मेला लगा हुआ था, ओंकारेश्वर परियोजना      में बाँध का पानी अचानक छोड़ देने से लाखों श्रद्धालुओं में से अनेकों को अचानक आई बाढ़ अपने साथ बहा ले गयी थी. 70 लोगों की जान चली गयी थी ,कई अब तक लापता हैं. कुछ का  तो बाद में वहीं अंतिम संस्कार करना पडा था.’
अचानक फट फट की आवाज सुनाई देना बंद हो गयी. बोट रुक गयी थी. चालक ने कई बार कोशिश की लेकिन पुनः स्टार्ट करने में सफल नहीं हो पाया.
‘अब क्या होगा?’ बकुलेश ने चालक से पूछा.
‘पैदल जाना पडेगा.. मैं बोट को किनारे लगाता हूँ..’ उसने चप्पू की मदद से धीरे-धीरे किनारे पर ला कर एक चट्टान से टिका दिया, बोट की रस्सी को पेड़ के तने से बाँध दिया. सात बजे होंगे अन्धेरा गहराता जा रहा था.      

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बोट खराब होने के बाद जिस किनारे पर चालक ने उसे टिकाया था वहां सिवाय एक पेड़ के कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. जिसके सहारे चढ़कर ऊपर समतल मैदान में जाया जा सकता हो. पेड़ जहां ख़त्म हो जाता था, उसके ऊपर भी खडी चट्टाने थीं जो अब अंधरे में ठीक से दिखाई भी नहीं दे रहीं थी. अधिकाँश लोग उम्र के लिहाज से भी पचास से ऊपर के ही थे. शुगर और बीपी की समस्याओं से भी जूझ रहे थे..लेकिन जज्बा जरूर था सबमें कि पहाड़ चढ़कर मैदान में पहुँच ही जायेंगे.

किसी तरह मोबाइल की रोशनी से चट्टानों के बीच बकरियों वाला रास्ता दिखाई दिया. गिरते पड़ते आखिर समतल सतह पर पहुँच ही गए सब.. पंडितजी ने खुशी में उत्साहित होते हुए  उद्घोष किया -‘नर्मदा मैय्या की जय !’ बाद में सभी ने इसे दोहराया. कुछ ने जोर से उच्चारा और कुछ ने मात्र अपने होठ हिलाकर बुदबुदा दिया...’जय’.

रात के आठ बज चुके थे. उधर धाराजी में भी स्वागातुर मेजमान आधे घंटे में पहुँच जाने वाले अतिथियों के तीन घंटों से अधिक समय तक नहीं पहुँचने से चिंतित हो उठे थे. किसी अनहोनी कि आशंका में उन्होंने तीन चार तैराकों को भी नाव लेकर विपरीत दिशा में भेज दिया. कुछ लोग मैदानी रास्ते से किनारे किनारे पैदल रवाना हुए...

मोबाइल तो काम ही नहीं करते थे यहाँ. चिंताएं दोनों तरफ थीं. धाराजी पहुँचने के लिए अभी लगभग पांच-सात किलोमीटर अभी पैदल चलना बाकी था. सब आगे बढ़ रहे थे...उधर से भी, इधर से भी..

इधर बोट चालक हांक लगा रहा था.. कोई  है? कोई  है? कोई होता तो सुनता. टोकरिया जी मन ही मन शायद युगल जोशी को कोस रहे होंगे..उन्हें इस यात्रा में आने की कतई दिलचस्पी नहीं थी.. बकुलेश को भी वसुधा कि चिंता सता रही थी..उसे बीमार छोड़कर शिविर में आ गया था..

अचानक सामने से टॉर्च की रोशनी के साथ आवाजें आने लगीं... ‘हम आ रहे हैं जोशी जी ..घबराइयेगा नहीं...’ और सचमुच पल भर में मोटर साइकिल वाले छगन सेठ के वे सहयोगी सबके सामने आ खड़े हुए जिन्होंने सबको बोट में चढ़ाया था...कोई  एक फर्लांग पैदल चलने के बाद जीप से सब लोग धाराजी पहुँच गए. गहरे अँधेरे में केवल पानी के गिरने की आवाज आ रही थी. कुछ जांबाज लोग समीप भी गए धारा के. लेकिन बकुलेश और आनन्द बाबू वहीँ एक टीले पर पैर फैलाकर निढाल हो गए.

दाल, बाफले , देसी घी के लड्डू के शानदार मालवी भोजन के बाद खुली हवा में आधी रात को छगन सेठ के घर की छत पर बिस्तर लगे तो गपशप में सारी थकान मिट गयी.
बातों बातों में युगल ने बताया अँधेरे में जिन टीलों पर लेटकर आनंद बाबू और बकुलेश ने अपनी थकान मिटाई थी असल में वे हादसे में मृत श्रद्धालुओं की कच्ची समाधियाँ थीं.


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