Tuesday, June 5, 2018

उपन्यास :डेबिट क्रेडिट: ब्रजेश कानूनगो : तीन


उपन्यास :डेबिट क्रेडिट: ब्रजेश कानूनगो

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सूखा बरगद

बहुत बुरे समय से गुजर रहा था उन दिनों बकुलेश का परिवार. बैंक तहसील मुख्यालय की एक अर्ध शहरी शाखा में कुछ दिनों पूर्व ही वह स्थान्तरित होकर आया था. कबीर मोहल्ले में शाखा के हेड केशियर रहते थे जो यहीं के मूल निवासी थे. उन्होंने ही दो कमरों का एक मकान बकुलेश को किराए पर दिलवा दिया था. बकुलेश का अपना गृहनगर इस कस्बे से केवल तीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित था. शाखा के ज्यादातर स्टाफ सदस्य प्रतिदिन शहर से ही आना–जाना किया करते थे.
चूंकि बकुलेश सहायक प्रबंधक पद पर था जिसे पोस्टिंग वाले स्थान पर नियमानुसार रहना  जरूरी होता था. किन्तु यहाँ निवास के प्रशासनिक कायदों के अलावा भी गृहनगर से आना-जाना नहीं करने के उसके अलग कारण भी थे. बकुलेश की मानसिक दशा इन दिनों कुछ ठीक नहीं थी. एक अनजाना भय उसके भीतर बना रहता था.
पांच वर्षीय बेटी अंकिता को भी साथ में लाकर कस्बे के स्कूल में दाखिल कराया लेकिन स्कूल और वहां के ग्रामीण परिवेश से वह इतना घबरा गयी कि दो दिन बाद ही उसे अपने पुराने शहरी स्कूल में वापिस दादा-दादी के पास भेजना पडा. 

इधर  कबीर मोहल्ले के मकान में दोनों पति पत्नी ही रह गए थे. बेटा अश्विनी पूना में अपनी पढाई कर रहा था. उसने भी अपनी सारी स्कूली पढाई दादा दादी के पास रहकर ही पूरी की थी. पदोन्नति के बाद बकुलेश का तो हर तीसरे वर्ष ट्रांसफर हो जाता था. एक तरह से अश्विनी के भविष्य के लिए यह ठीक ही हुआ. वह अच्छे अंकों से परीक्षाएं उत्तीर्ण करता रहा और अब इंजीनियरिंग की पढाई करने पूना गया था. हाँ, यह जरूर एक गहरी वेदना थी कि जब-तब अश्विनी की याद में वसुधा का पल्लू आंसुओं से भीग जाता था. दस वर्ष की छोटी उम्र से ही अश्विनी माता-पिता से ज्यादातर दूर ही रहा. इसके पीछे बकुलेश के अवसादग्रस्त उस बुरे दौर की भूमिका भी रही.  

अवसाद की शायद यह प्रारम्भिक अवस्था रही होगी अन्यथा वह अपने रूचि के काम तो बहुत अच्छे से और बौद्धिक विवेक से कर रहा था. पत्र-पत्रिकाओं में उसकी रचनाएं लगातार छप रहीं थीं. संगठन के साहित्यिक प्रकोष्ठ की गतिविधियों में भी उसका सक्रीय सहयोग बना हुआ था. किन्तु जैसे ही बैंक जाने और वहां काम करने की बात आती बकुलेश का मन डूबने लगता. निराशा में उसका शरीर निढाल हो जाता. बैंक में बीमार होने की सूचना देकर अपने आपको घर में कैद कर लेता. मन की बीमारी तन को भी बीमार बना देती है.
डॉ मोघे ने जरूर बकुलेश की बीमारी को पकड़ लिया था. वरना डॉ चतुर्वेदी ने तो रक्तचाप की दवाइयां चालू कर ही दी थीं. डॉ मोघे दवाई कम देते थे, बीमारी के बारे में कागज़ पर डायग्राम बनाकर समझाते बहुत अधिक थे. ब्लड प्रेशर की दवाई उन्होंने बदली तो नहीं लेकिन एक चौथाई जरूर कर दी. परामर्श पर्ची पर सबसे ऊपर उन्होंने हिन्दी में प्रिस्क्रिप्शन लिखा- ‘डेल कार्नेगी की पुस्तक -‘चिंता छोडो,सुख से जिओ’ को रोज नियमित पढों. नवगीतकार प्रो करीम साहब ने वसुधा को समझाते हुए कहा था - ये कवि ह्रदय व्यक्ति है..इसका ख़याल रखना..  निराश व्यक्ति अपने भले-बुरे का नहीं सोच पाता.. ऐसे वक्त हमारी जिम्मेदारी बढ़ जाती है जो इनके आसपास होते हैं. इन्हें घर में मत रहने दो..वही करो जो इनको पसंद हो..इनकी खुशी ही इन्हें निराशा से उबार सकती है...’ 

बकुलेश की निराशा का कारण बहुत सामान्य था. उसे यह बहुत बाद में समझ में आया. किसी भी सरल-सहज और संवेदनशील व्यक्ति को अपने अवसाद का कारण देर से ही पता चलता है. फिर बकुलेश तो एक लेखक और रचनात्मक प्रवत्ति का व्यक्ति था सो उसके साथ तो यह सब होना ही था.
दूरस्थ शाखा में अपनी पिछली पोस्टिंग के बाद जिले की मुख्य शाखा में बड़ी मुश्किल से चार साल बाद बकुलेश को मनचाहा ट्रांसफर मिला था. लेकिन इसके लिए बैंकिंग की एक विशेष परीक्षा पास करके प्रमाण-पत्र लेना पड़ता था. इससे एक फ़ायदा यह भी होता था कि लिपिक वर्ग के कर्मचारी को अधिकारी वर्ग में प्रमोशन के लिए चार वर्षों की नौकरी के बाद ही अवसर मिल जाता था. बकुलेश ने यह अहर्तता आसानी से हासिल कर ली थी. विज्ञान का छात्र होने के बावजूद वाणिज्य, अंगरेजी भाषा, भूगोल और आर्थिक समस्याओं आदि जैसे विषयों वाली प्रमाणपत्र परीक्षा में सफल होने के लिए कोई दिक्कत भी नहीं आई. स्कूली और महाविद्यालयीन शिक्षा के दौरान बकुलेश एक प्रखर, मेहनती और खूब अध्ययन करने वाला छात्र रहा था. अपनी संस्था की प्रावीण्य सूची में हमेशा पहले तीन छात्रों में उसका नाम रहता था.

बैंक में भी बकुलेश के काम काज में गुणवत्ता और तत्परता के सभी कायल थे. शाखा प्रबंधक बदल भी जाते तब भी वह उनके सबसे निकट होता था. कुछ अधिकारी तो जैसे उसी पर निर्भर हो जाते थे. नियंत्रक कार्यालय से भी सूचनाओं के लिए अक्सर सीधे उसी से संपर्क किया जाता. बकुलेश की कर्मठता और उसकी योग्यता अतुलनीय थी. यह गुण उसके स्वभाव में थे. उसकी माँ अक्सर एक मालवी कहावत सुनाया करती थी -‘बेटा, मनख को चाम नहीं काम प्यारो होवे’. रूप तो माँ ने सुन्दर दिया ही था, काम को बेहतर बनाने की कोशिश करने में उसने कभी कोताही नहीं बरती. 
बकुलेश का व्यक्तित्व आकर्षक था, स्मार्टनेस शरीर में ही नहीं, उसके काम में भी नजर आती थी. शाखा के ख़ास कामों से उसे लम्बे समय तक हटाया नहीं जा सका. वह चाहे मासिक निष्पादन रिपोर्ट बनाना हो, बजट बनाना हो, ऑडिट करवाना हो. हिन्दी दिवस या कोई भी सांस्कृतिक समारोह का आयोजन करना हो या फिर  नियंत्रक अधिकारी को संतोषजनक विवरणी प्रस्तुत करना हो, उसके काम का कोई मुकाबला नहीं था.

ऐसे कर्मठ कर्मचारी के साथ अन्याय हो जाये तो निराशा आना स्वाभाविक है. बकुलेश को  प्रमाणपत्र परीक्षा उत्तीर्ण कर लेने से नियुक्ति के चार वर्षों में ही प्रमोशन परीक्षा में शामिल होने का अवसर मिल गया था. पूरे बैंक से एक सौ तीस कर्मचारी इस समूह में परीक्षा देने के योग्य थे. लेकिन भरे जाने वाले पदों की संख्या केवल पांच थी. फिर भी बकुलेश के आत्मविश्वास और उसके कामकाज के आधार पर सभी को विश्वास था कि पदों की संख्या भले ही पांच की बजाय एक हो, बकुलेश का प्रमोशन होना तय है. लिखित परीक्षा के परीणाम ने इस विश्वास को और बढ़ा दिया. पच्चीस सफल व्यक्तियों में बकुलेश भटनागर का भी नाम शामिल था. लेकिन यह सफलता का पहला चरण था.

एक सप्ताह के भीतर साक्षात्कार भी संपन्न हो गए. बकुलेश ने पूरी तैयारी की थी. साक्षात्कार बोर्ड के सदस्यों ने जो सवाल पूछे थे, सभी का संतोषजनक उत्तर उसने दिया था. कुछ सदस्यों ने ‘गुड’ कहकर उसे प्रोत्साहित भी किया था. बाद में शाखा प्रबंधक ने खुश होकर बताया कि इंटरव्यू बोर्ड के एक सदस्य अधिकारी से पता चला है कि बकुलेश का इंटरव्यू बहुत शानदार रहा है. इस शुभ सूचना से शाखा के सभी स्टाफ सदस्यों में हर्ष व्याप्त हो गया.

जिस दिन प्रमोशन का रिजल्ट आने वाला था शाखा प्रतिनिधि अमित श्रीवास्तव जो बकुलेश का ख़ास मित्र भी था, ऑफिस आते वक्त फूलों का एक गुलदस्ता भी साथ लेता आया. कमलेश जैन ने तो भेरुलाल हलवाई की प्रसिद्द मिठाई की दूकान पर तीन किलो रसभरी का ऑर्डर ही फोन पर दे डाला था. दोस्तों के ऐसे स्नेहहिल सेलिब्रेशन की योजना से बकुलेश की धड़कने बढ़ती जा रहीं थीं. अपेक्षाओं के दबाव से कभी-कभी दिल-ओ-दिमाग पर उल्टा असर भी पड़ जाता है. बकुलेश के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ.  

रोजमर्रा की ग्राहक सेवा का समय समाप्त हो गया था. शाखा का कामकाज समेटा जाने लगा था. स्टाफ के ज्यादातर सदस्य प्रमोशन लिस्ट के इंतज़ार में शाखा प्रबंधक के केबिन में जमा हो गए थे. फेक्स मशीन वहीं लगी थी. सात बजे के आसपास मशीन से एक कागज़ निकलने लगा. पांच लोगों के नाम उसमें स्पष्ट पढ़े जा सकते थे. बकुलेश भटनागर का नाम उसमें नीचे तक कहीं नहीं था. हमेशा प्रावीण्यता सूची में पहले तीन में रहने वाले संवेदनशील बकुलेश के लिए यह पहला बहुत बड़ा झटका था. दोस्तों की उम्मीदों पर उसने जैसे स्वयं पानी फेर दिया हो.. अपने आप से उसका विश्वास उठता गया.. कुछ ही दिनों में अवसाद ने उसके मन पर कब्जा जमा लिया..
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बैंक नहीं जाते हुए बकुलेश को आज पूरे आठ दिन हो गए थे. मेडिकल लीव समाप्ति की ओर थी. पूरा साल अभी सामने था.
वसुधा ने निराशा में डूबे बकुलेश से कहा -‘आज ज्वाइन कर लीजिये..कुछ नहीं होगा आपको..किस चिंता में पड़े हैं आप?’
‘मन नहीं करता वसुधा.. इच्छा होती है नौकरी ही छोड़ दूं.. पर वह भी तुम लोगों की चिंता की वजह से छोड़ नहीं सकता..’ बकुलेश का चेहरा उतरा हुआ था. शरीर भी पीला पड़ गया था.
‘एक तो हमारी बैंक में पेंशन की व्यवस्था नहीं है.. कल से मुझे कुछ हो गया तो..!’
’नहीं नहीं ऐसा कुछ मत सोचिये ..कुछ नहीं होगा आपको.. मैं चलती हूँ आज आपके साथ..बैंक बंद होने तक वहीं बैठी रहूँगी.. थोड़ी हिम्मत कीजिये...” वसुधा ने किसी बच्चे को समझाने वाली मुस्कराहट के साथ थोड़ी कठोरता से कहा. सबसे आगे रहकर काम करने वाले बकुलेश की यह दशा अब वसुधा से देखी नहीं जा रही थी.

किसी तरह बकुलेश को मनाकर जबरन उस दिन वसुधा उसे बैंक ले गयी थी. शाखा प्रबंधक और सभी कर्मचारी स्थितियों को समझने लगे थे और सबकी सहानुभूति भी बकुलेश के परिवार के साथ थी लेकिन नौकरी के कायदों का तो पालन करना ही होता है.

डाक डिस्पेच चेक करने के हलके काम से बकुलेश ने फिर शुरुआत की. वसुधा सात बजे तक शाखा में बैठकर मंजूर एहतशाम का उपन्यास ‘सूखा बरगद’ पढ़ती रही.




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भाटियाजी का दिन

बैंकिंग उद्योग में आज का दिन बहुत ऐतिहासिक था. ‘मालवा बैंक’ के कर्मचारियों से शुरू हुई  पेंशन योजना की पुराणी मांग सरकार द्वारा सभी राष्ट्रीयकृत बैंकों के लिए मान ली थी. यह भी बड़ी बात थी कि इसे पिछले आठ साल पीछे की तारीख से लागू किया गया था. इस दौरान सेवानिवृत्त हो चुके कर्मचारियों में से जिन्हें योजना में शामिल होना था, उन्हें पीएफ की नियोक्ता घटक राशि को वापिस लौटाना था. जो नौकरी में अभी थे उन्हें दोनों विकल्प मौजूद थे. पेंशन योजना में शामिल होने वालों की घटक राशि पेंशन फण्ड में ट्रांसफर कर दी गयी. जिन्होंने एक मुश्त धनराशि का मोह बनाए रखा था, उन्हें आखिर तक समझाया नहीं जा सका.

‘मालवा बैंक’ में ही कई ऐसे उदाहरण थे जब कर्मचारी ने पीएफ से मिलने वाले पैसों को बच्चों के बिजनेस में लगा दिया. कामकाज चला नहीं तो सारा पैसा डूब गया. परिवार को खाने-पीने के लाले पड़ गए.
भाटियाजी के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. हालात यह हो गए कि उन्हें अपने जीवन के शेष दिनों के लिए वृद्धाश्रम में शरण लेनी पडी. बच्चों की भी अपनी विवशताएँ रहीं होंगी. कोई वक्त पर काम नहीं आया.

घर-घर जाकर आनंद बाबू के सहयोगियों ने सेवानिवृत्त साथियों के पेंशन विकल्प में सहमति के लिए काफी मेहनत की. भाटियाजी को सेवानिवृत्त हुए अभी तीन साल ही हुए थे. जिंदलजी वृद्धाश्रम जाकर स्वयं उनसे पेंशन विकल्प का आवेदन भरवा लाये.

सब खुश थे. भाटियाजी की खुशी थोड़ी ज्यादा थी..पेंशन के कम्युटेशन से बहुत बड़ी राशि भाटिया जी के खाते में आ गयी थी. प्रतिमाह पेंशन मिलने लगी तो बच्चे उन्हें वृद्धाश्रम से घर ले आये... घर तो फिर घर ही होता है...



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जिन्होंने ना समझी में पेंशन योजना में सहमति का विकल्प नहीं दिया था. उनके हितों के लिए अभी और लड़ाई जारी रखी जानी थी. बहुत से बैंककर्मी चाहते थे कि उन्हें एक बार और पेंशन विकल्प चुनने का मौक़ा दिया जाए. मौक़ा मिला भी लेकिन लगभग पंद्रह वर्षों के लम्बे संघर्ष के बाद. लेकिन इसके लिए भारी कीमत चुकानी पडी थी. सरकार ने इस फंड में निवेश की भारी राशि को देखते हुए भविष्य में नए भर्ती होने वाले बैंककर्मियों के लिए यह पेंशन योजना हमेशा के लिए समाप्त कर दी.
कई बार एक पीढी की गलतियों की सजा आने वाली पीढी को भुगतनी पड़ती है. जो नई योजना लाई गई उसमें कई विसंगतियां और बहस के मुद्दे उभर आये थे..पेंशन फंड को अन्यत्र निवेश करने की व्यवस्था दी गयी थी. जिसकी संभावित वृद्धि में अन्य प्रायवेट खिलाड़ियों की भूमिका भी निहित थी. यह एक बेहद जटिल मामला था जिस पर कभी विवाद समाप्त नहीं हुए.






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उदयपुर की हवा

एक पुराने मित्र आज बकुलेशजी को बेटे के विवाह का निमंत्रण पत्र दे गए थे . उनके लडके की शादी थी. मित्र ने अनुरोध भी किया था कि वे भी उनके साथ बारात में चलें. बारात उदयपुर राजस्थान जाने वाली थी. बकुलेशजी के चेहरे पर अनायास मुस्कराहट फ़ैल गई.  अश्विनी और अंकिता को पापा को चिढ़ाने का जब भी मन करता तो मजे लेने के लिए इतना कहना भर काफी होता था कि 'पापा इस बार हम उदयपुर नहीं जा रहे।'

पहले तो बच्चों के मजाक पर वे उन्हें डपट देते थे, और पर्यटन के नाम पर केवल उदयपुर जाने के पक्ष में बड़ी बड़ी दलीलें भी दिया करते थे,  लेकिन अब बच्चों की मजाक पर केवल मुस्कुराकर भर देते थे। 

इस बात का बहुत पछतावा भी रहा उनको की बच्चों को ज्यादा घुमा फिरा नहीं सके। कुछ परिस्थितियाँ ऐसी रहीं कि अक्सर बच्चों को लेकर उदयपुर जैसे सुविधाजनक स्थल की सैर को ही चले जाया करते थे। जबकि बैंक द्वारा दी हुई  यात्रा अवकाश सुविधा के तहत  हर दो-चार साल में उसका लाभ लेकर उनके अधिकाँश साथी न सिर्फ देश बल्कि बैंकॉक,पटाया, सिंगापुर आदि देशों तक की यात्राएं कर आये थे. वे क्यों नहीं कर पाए ? इसका कोई संतोषजनक जवाब बकुलेशजी से कभी दिया न जा सका.

उदयपुर के प्रति विशेष आकर्षण बकुलेश को हमेशा से रहा था । कई रिश्तेदारियां भी वहीं थी। जाना आना भी लगा रहता था। खासकर शादी के बाद। वसुधा की दो बड़ी बहनें उदयपुर ही ब्याहीं गईं थीं। वसुधा सबसे छोटी थीं तो जीजाजी के यहां स्नेह मिलना स्वाभाविक था। बकुलेश को जंवाई राजा जैसा मान सम्मान और खातिरदारी का सुख तो खूब मिलता था। उदयपुर जाने के नाम से ही भीतर एक अलग तरह की खुशी महसूस होती थी बकुलेश को। 

कुटुंब में शादी-ब्याह और रिश्तेदारी के सामाजिक ढांचे में मालवा के बारह खास कस्बों-शहरों का बड़ा महत्व था। इन ठिकानों को जाति विशेष की 'कोठरियां'  कहा गया था। आमतौर पर रिश्ते जाति बिरादरी में ही प्रायः होते थे। नए सगाई संबंधों में योग्य वर वधू की तलाश के लिए इन्हीं कोठरियों का रुख किया जाता था। 

मालवा की इन खास कोठरियों में रिश्तेदारी की बात नही जमती तो राजस्थान का रुख किया जाता था। राजस्थान में भी ऐसी ही कुछ खास बस्तियां थीं। उदयपुर इस मामले में सबसे बड़ा खजाना सिद्ध हुआ था. विशेषतः मालवा के लोग शादी योग्य कुआरों की तलाश में उदयपुर का रुख करना ज्यादा पसंद करते थे। इसका एक कारण यह भी था कि उदयपुर अपेक्षाकृत मालवा की कोठरियों की तुलना में ज्यादा आधुनिक था, वहां के बच्चे भी थोड़े प्रोग्रेसिव दिखाई देते थे. , स्वजातीय परिवारों की वहां बहुलता भी थी । मेवाड़ के प्राकृतिक सौदर्य और गौरवशाली इतिहास का अपना अलग आकर्षण था. लड़कों में शूरवीरों का खून दौड़ता था और कन्याओं में अपूर्व सौन्दर्य छलक-छलक जाता था. विवाह आकांक्षी किशोरों और युवाओं के धड़कते दिलों में तो कम से कम यही विश्वास बना रहता था.   देश का एक ख़ूबसूरत पर्यटन स्थल होने के कारण भी उदयपुर जाने को मालवी आदमी मन ललचा ही जाता था. मनुष्य के जीवन में उम्र का वह ख़ूबसूरत दौर एक बार जरूर आता है जब उसका मन दिन एक उजाले में भी सपने संजोने लगता है.. ख़यालों के स्क्रीन पर किसी रोमेंटिक सिनेमा के दृश्य चमक पैदा करने लगते हैं.   बकुलेश भी कभी इस दौर से गुजरा था. जाति बिरादरी में किसी दूर के रिश्तेदार के यहाँ की बारात उदयपुर जाने वाली होती तो बारात में जाने का हमेशा उसका मन रहता था। किसी तरह यह मामला वह फिट कर ही लेता था. उसकी तो बड़ी तमन्ना थी कि अपनी बारात भी झीलों की नगरी में ही कभी निकले किंतु ऐसा हो न सका।

उदयपुर में ब्याहने की इच्छा तो मन में रह गई, लेकिन राजस्थान के ही एक कस्बे की सौम्य कन्या वसुधा ने उसकी संगिनी बनकर जीवन में इंद्रधनुष बिखेर दिया था।
और विवाह के बाद ‘हनीमून’ के लिए पहले प्रवास का वक्त आया तो वह उदयपुर के अलावा और क्या हो सकता था।



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आज फिर वर्षों बाद वसुधा और बकुलेश उदयपुर की यात्रा को निकले थे. वसुधा के एक जीजाजी अस्वस्थ थे.. मिलने जाना जरूरी हो गया था.
इन्दौर से उदयपुर के लिए रेल से यात्रा कर रहे थे। दिन का सफर था। सुबह आठ बजे से रात आठ बजे तक के सफर को चाहें तो बोरियत मानें या फिर रोमांच। प्राकृतिक वातावरण बकुलेश को हमेशा लुभाता रहा है। यात्राओं के दौरान शायद ही उन्होंने कभी कोई पुस्तक या अखबार समय काटने के लिए खोला होगा। कम्पार्टमेंट के भीतर और खिडकी के बाहर की हलचल और वातावरण से जुडे रहना सदैव अच्छा लगता था।

एक युवा दम्पत्ति भी उनके साथ यात्रा कर रहा था. साथ में तीन,चार वर्ष की उनकी बिटिया भी थी। जैसे ही गाडी ने इन्दौर शहर पार किया, बच्ची की माँ ने अपने बैग से चार लाइनों वाली कॉपी, पेंसिल और एक रबर(इरेजर)  निकालकर बच्ची को थमा दिया। संयोग से उस कम्पार्टमेंट में सीटों के बीच खुलनेवाली छोटी सी टेबल भी थी। बच्ची ने बिना किसी ना-नकुर के अभ्यास प्रारम्भ कर दिया। न सिर्फ उसने अंग्रेजी की छपाई वाले अल्फाबेट सुन्दर अक्षरों में लिखे बल्कि लिखाई वाली लिपि (रनिंग अल्फाबेट) भी कॉपी पर सुन्दरता से लिख डाली। माता-पिता, दो-तीन  घंटों तक लगातार उसे अंग्रेजी और गणित का अभ्यास कराते रहे। आश्चर्य की बात यह थी कि वह भी यह सब अभ्यास पूरी रुचि और गुणवत्तापूर्ण ढंग से करती रही लेकिन आसपास की हलचल और खिडकी के बाहर के वातावरण से पूरी तरह बेखबर बनी रही।  जब वह थक गई तो ऊपर की बर्थ पर उसे लिटाकर युवा पति-पत्नी निश्चिंत होकर ताश खेलने लग गए।

पता नही क्यों बकुलेश को यह सब अच्छा नही लग रहा था। उन्होंने युवा दम्पत्ति से कुछ कहना भी चाहा तो वसुधा ने रोक दिया, क्योंकि इस बीच वे अपनी प्रतिभाशाली बेटी के बारे में वसुधा को बहुत कुछ बता चुके थे। वसुधा भी उन लोगों में इतनी घुल मिल गईं थीं कि यात्रा के दौरान अपरिचितों का उत्साह कम करके उन्हे दु:ख नही पहुँचाना चाहती थीं।  


बकुलेश मन ही मन सोचते रहे कि युवा दम्पत्ति ने यात्रा के दौरान कॉपी,किताब,पेंसिल थमाकर छोटी सी बच्ची को प्रकृति और जनजीवन से सीखने की प्रक्रिया से दूर रखकर अपनी बिटिया के हित में कहीं कोई गलती तो नहीं कर रहे. पढाई लिखाई और अभ्यास के तो और भी बहुत अवसर होते हैं, लेकिन प्रकृति और जीवन की हलचल से सीखने, समझने के लिए ऐसी यात्राएँ बाल मन पर गहरे से अंकित होती हैं।


डिब्बे में बैठे भिन्न संस्कारों वाले लोगों की बातचीत, गोबर की गन्ध से सना  खेत से सीधे गाडी में चढा किसान, हरे पत्तों के दोनों में जामुन-बेर बेचती आदिवासी बालिका, चना,चाय बेचते व्यक्ति, बाँसुरी बजाता नेत्रहीन बालक , डिब्बे की सफाई करता विकलांग बच्चा, क्या कुछ नही सिखाते हमारे बच्चों को। इन्हे और इन हलचलों को महसूस कर उनके अन्दर संवेदंशीलता का अंकुरण सम्भव होता है  माता पिता चाहें तो खेत, खलिहान,पशु पक्षी,नदी, तालाब,   नहरें, पहाड,मजदूर,किसान,सूर्यास्त, गोधुली,वर्षा,इन्द्रधनुष,गाँव,ट्रेक्टर बैलगाडी, विद्युत प्रवाह,कारखाने बहुत कुछ रेलगाडी की खिडकी के बाहर का नजारा दिखा कर बच्चों के मन पर ज्ञान-विज्ञान, लोगों के रहन सहन और समाज को समझने के अमिट अक्षर अंकित कर सकते हैं।

बकुलेश सोच रहे थे क्या यह सब नही कर पाने  के लिए सहयात्री युवा दम्पत्ति पूरी तरह दोषी हैं?  बहुत से आग्रह और आकांक्षाएँ हैं जिनके कारण युवा पालकों की प्राथमिकताएँ बदली हैं। अभी भी बटर फ्लाय को तितली, रेनबो को इन्द्रधनुष ,फ्लावर को फूल और स्मेल को गन्ध कहने वाले बकुलेश जैसे लोग  समझ नही पा रहे हैं कि आखिर गलती कहाँ हो रही है, कहीं वे ही तो भ्रमित नही हैं।


चितौड़ का किला नजर आने लगा था....दो ढाई घंटों का सफर और अभी और बाकी था...
उदयपुर स्टेशन आते ही रेलगाडी विराम लेगी... बकुलेश जानते थे भीतर जो उदयपुरी हवाएं चल पडीं हैं उनका रुक पाना तो वापिस घर लौटने पर ही संभव होगा.... मन में पुरानी स्मृतियाँ जैसे घूमर करने लगीं थीं.
चाय की चाह में वसुधा ने खिड़की का कांच ऊपर कर दिया.. स्टाल पर रखे खुले ब्रेड पकौड़ों पर मक्खियाँ भिन भिना रहीं थी...यह तब की बात है जब स्वच्छता अभियान शुरू नहीं हुआ था..



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मुआवजा

तहसील कार्यालय जाते हुए गिरधारी की निगाह अचानक किशनलाल के झोपड़े पर पड़ी। कितनी बड़ी गलती की थी किशनलाल ने। बड़े दफ्तर से आए बैंकवाले साहब ने बहुत समझाया था कि इस बार वह चूके नहीं और वर्षों पुराने अपने कर्ज से छुटकारा पा ले,  ईमानदारी पर लगे धब्बे को ढ़ोते रहने में कोई समझदारी नही है। वैसे भी सरकार कर्ज का अधिकाँश हिस्सा माफ कर रही थी, कुछ राशि बैंकवाले समझौता योजना में छोड़ रहे थे, ले देकर चौथाई भाग की व्यवस्था अपने पास से करनी थी लेकिन किशनलाल वह भी नहीं कर पाया।

भले आदमी थे जिले से आये  बडे अफसर बकुलेश सर । धौंस धपट की बजाए दुनियादारी की बाते कीं, कर्ज नहीं चुकाने का ऊँचनीच समझाया लेकिन उनकी बातों का किशनलाल पर उल्टे घड़े पर पानी जैसा असर हुआ। किशनलाल को तो हर बार जैसे सख्त वसूली अधिकारियों तथा बदजुबान एजेंटों की फटकार सुनने की   आदत सी हो गई थी। धीरेधीरे कर्ज की राशि ब़ड़ती गई और चुकाने की क्षमता से बाहर हो गई। अन्ततः वही हुआ जो गए साल मुरारी के साथ हुआ था।
कीड़े मारने वाली दवाई पीकर किशनलाल ऐसा बेहोश हुआ कि बड़े अस्पताल के बड़े डॉक्टर साहब भी उसे होश में नहीं ला सके

किशनलाल का किस्सा गिरधारी के मन से हटता ही नहीं था । वह सोंचे जा रहा था। एक बेटा है किशनलाल का, न जाने कौनसा दंड मिला है उसे, दिन भर घानी के बैल की तरह चबूतरे पर चक्कर काटता रहता है। एक बेटी है जो सयानी हो गई है लेकिन दिनभर पार्वती काकी के साथ घर और खेत पर काम में जुटी रहती है। किशन के जाने के बाद कैसे हो पाएगा उसका ब्याह। चबूतरे पर चक्कर काटते डूंडे बैल को कब तक खिला सकेगी बूढी काकी।
गिरधारी खुद अपने कर्ज को लेकर परेशान रहता है। हर फसल पर किश्त जमा करवाता है लेकिन बात बनती नहीं। मूलधन ज्यों का त्यों मुँह चिढ़ाता रहता है। ऊपर से इस बार फिर पाला पड़ गया है। बरबाद हो गई है फसल। कहीं ऐसा न हो कि मुरारी के बाद किशनलाल और उसके बाद वह़ । ऩ  , ऐसा नहीं सोंचना चाहिए। आत्महत्या करना तो सबसे बड़ा पाप है. 
विचारों मे डूबे गिरधारी को पता ही नहीं चला कि कब तहसील कार्यालय में पहुँच कर वह शुक्ला बाबू के सामने लगी फसल नुकसान पर मिल रहे मुआवजा प्राप्त करने वाले किसानों की लंबी लाइन में खड़ा हो गया था। अपनी बारी आने पर उसने रजिस्टर में दस्तखत किए और चेक लेकर बैंक की ओर चल दिया।

नौ हजार सात सौ रुपयों का चेक मिला था। चलो इतनी मदद तो मिली। वरना बहुत से किसानों  को तो मुआवजे के दो रुएए दस पैसे तक का चेक मिला है. इस बार किश्त भी जमा नहीं करनी है। पाला पड़ने के कारण बैंक ने थो़ड़ी राहत देकर किश्त की तारीख आगे बढ़ा दी है। हाल फिलहाल तो ऐसी नौबत नही आई है कि रेल पटरियों पर लेटना पड़े। पर किशनलाल के परिवार का क्या होगा़ ? उनका तो मुआवजा भी खटाई में पड़ा हुआ है और होगा भी कितना़? यही हजार बारह सौ़ , पार्वती काकी क्या करेंगीं ? गिरधारी के अंदर उमड़ते विचार सागर में ज्वार सा आया. मन ही मन उसने एक फैसला ले लिया. मुआवजे का अपना चेक वह पार्वती काकी को दे देगा। अब मन के सागर में भाटे की स्थति थी।
‘सर, मुझे अपने चेक का नगद भुगतान चाहिए.’ गिरधारी ने काउंटर बैठे व्यक्ति से कहा. बैंक अधिकारी ने चेक देखे बिना कम्प्यूटर से नजरें उठाये बिना कहा-‘क्या मुआवजे का चेक है?  खाते में जमा करवा दो, फिर निकाल लेना आराम से.’
गिरधारी के पीछे ग्राहकों की कतार इस बीच काफी लम्बी हो चुकी थी. पर्ची भरकर चेक के साथ देने के लिए वह कतार से बाहर निकल आया.
बैंक के गार्ड से उसने पर्ची ली और भरकर फिर कतार में सबसे पीछे जाकर खडा हो गया. आधे घंटे बाद जब उसका नंबर आया तब तक लंच टाइम हो चुका था.
उस दिन गिरधारी बैंक में बस अपना चेक ही जमा करवा पाया.
अगले दिन बैंक शुरू होते ही कतार में सबसे आगे लगकर दस हजार रुपये निकाल लिए.
रुपये लेकर पार्वती काकी के घर की ओर रवाना हो गया। वहां का दृश्य देखकर उसकी आँखें फटी रह गईं. कुएं की जगत पर पार्वती काकी की निर्जीव देह पडी थी. थोड़ी देर पहले ही गाँव के लोगों ने कुएं में तैरती लाश को बाहर निकाला था.
लोग बातें कर रहे थे- ‘बेचारी पार्वती.. बहुत दुःख देखे अभागन ने..पिछले साल पति ने जहर खा लिया..बढ़ते कर्ज के कारण और आज ये डूब मरी..’
गिरधारी भारी मन से लौट आया. किसी के सोचने और करने से ही सब कुछ अच्छा नहीं हो जाता. लेकिन उसने अच्छा सोचा यही क्या कम था.
जल्दबाजी  में अपनी पासबुक में एंट्री नहीं करवा पाया था गिरधारी’ इसलिए बैंक की तरफ ही होकर निकला. बैंक बाबू से एंट्रियाँ कराईं. पासबुक खोलकर तो उसमें बैंक ने न्यूनतम बेलेंस नहीं बनाए रखने के दो तीन बार रुपये काट लिए थे. खाते में अब मात्र पंद्रह रूपये शेष बचे थे.
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जिले की अन्य बैंक शाखाओं से सरकारी योजनाओं में खोले गए इस सप्ताह के शून्य बेलेंस खातों की संख्या की जानकारी एकत्र करने के लिए बकुलेश फोन कर रहा था. जिला समन्वयक होने के कारण प्रति सप्ताह इस कार्य में हुई प्रगति की जानकारी उसे अपने नियंत्रक अधिकारी और कलेक्टर कार्यालय को भेजनी होती थी. सरकारी योजनाओं में उपलब्ध फंड भी उसकी बैंक के पास रखा गया था तो जाहिर है इस कार्य का समन्वय भी ‘मालवा बैंक’ को करना था.
तभी उसके मोबाइल की घंटी बज उठी. उधर से कुमार की आवाज आई- ‘बकुलेश अब बहुत मुश्किल है यहाँ काम करना.’
‘क्यों, क्या कठिनाई आ गयी भाई!’
बकुलेश जानता था कि कुमार ने पिछले कई वर्षों से शाखा में सामान्य बैंकिंग का कार्य नहीं किया था. अधिकतर वह प्रशासनिक कार्यालयों में काम करता रहा था. इस बीच बैंक में कम्प्यूटरीकरण भी हो गया था. बकुलेश की खुद की व्यथा इससे कुछ अलग नहीं थी. ग्रामीण शाखा की अनिवार्य पदस्थी के अलावा अधिकारी बनने के बाद उसने भी कभी सामान्य बैंकिंग काम नहीं किया था. जनसंपर्क, मार्केटिंग, राजभाषा, सामाजिक बैंकिंग या फिर नियंत्रक अधिकारी के सचिवालय में ही नियुक्तियां होती रहीं थीं. छोटी बैंक में उच्च प्रबंधन हरेक कर्मचारी की क्षमता और सामर्थ्य और प्रतिभा को जानता है, इस लिए उसी तरह के काम मिलते रहे. और अब यहाँ जिला समन्वयक के रूप में भी जनसंपर्क, आंकड़ों का एकत्रीकरण और नियंत्रक अधिकारी के प्रतिनिधि की तरह का कामकाज था.
‘तुम आनंद बाबू से बात करो बकुलेश , मैं स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेना चाहता हूँ.’ उधर कुमार की परेशान आवाज आई.
‘हाँ. हाँ आज ही करता हूँ.’ बकुलेश ने आश्वस्त किया और अन्य शाखाओं में फोन लगाने में व्यस्त हो गया.


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19
दर्द का दरिया

बहुत दिनों से वसुधा कह रही थी कि एक बार डॉक्टर को दिखा देते हैं. स्तन में कुछ चुभन सी अनुभव होती है. कभी खिचाव भी महसूस होता है. लेकिन व्यस्तताएं इतनी बढ गईं थी कि समय ही नहीं निकाल पा रहा था बकुलेश.
नब्बे वर्ष पुराने बैंक का अस्तित्व ही संकट में था. संघर्ष भी था और काम का बोझ भी बढ़ता जा रहा था. यूनियनों के विरोध ,हड़तालों, आन्दोलनों और संसद में प्रश्न तक उठवाये जाने के बावजूद विलय को टालना अब मुश्किल  था.

‘मालवा बैंक’ का  ‘भारतीय बैंक’ में विलय निर्णय लिया जा चुका था. सरकार, रिजर्व बैंक से हरी झंडी भी हो गयी थी. दोनों बैंकों के प्रबंधनों ने विलय प्रक्रिया पूर्ण करने के लिए अधिकारी नियुक्त कर दिए थे. बस तारीख की घोषणा होनी थी कि कब ‘मालवा बैंक’ इतिहास बनकर रह जाने वाला था.

‘मालवा बैंक’ के कर्मचारियों के बीच भी मतभेद उभर आये थे. बड़ी संख्या में अधिकारी, कर्मचारी भारतीय बैंक में जाने पर मिलने वाले लाभों की ओर आकृष्ट होने लगे. विलय के विरोध में जो सक्रिय थे थोड़ा कमजोर भी पड़ते गए. जब सरकार की नीतियों में ही बड़े बैंकों के बनाने पर जोर दिया जा रहा हो तो कोई क्या कर सकता था. सरकार भी चाहे किसी भी राजनीतिक दल या गठबंधन  की बने , आर्थिक नीतियों में तो कभी कोई ख़ास बदलाव नहीं आता देखा गया है.
विलय के प्रति विरोध को समाप्त करने के लिए प्रबंधन ने भी कुछ ऐसे हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए थे जिससे वैचारिक और सांगठनिक रूप से दृढ लोगों को मानसिक रूप से तोड़ा जा सके. सबसे पहला हथियार तो वैसे ही ट्रांसफर को माना गया है. इसके प्रयोग से जो एकजुटता आन्दोलनकारियों में बनती है उसे आसानी से छिन्न-भिन्न किया जा सकता है. मालवा बैंक में भी यही होने लगा. कई बड़े नेताओं समेत सक्रिय और विलय विरोधी साथियों के ट्रांसफर दूरस्थ कार्यालयों में किये जाने लगे.. कई पीड़ित कर्मचारियों ने अपने बचे हुए अवकाश का उपयोग करना शुरू कर दिया.

यह भी संयोग ही था कि इस कठिन समय के दौरान बकुलेश ने जिला समन्वयक के पद पर निर्धारित पांच वर्ष पूरे कर लिए. स्थांतरण होना तय था. और एक दिन आदेश आ ही गए. यहाँ से कोई तीन सौ किलोमीटर के फासले की ग्रामीण शाखा में शाखा प्रबंधक के रूप में नियुक्ति कर दी गयी थी.

क्षेत्रीय कार्यालय से आये एक फोन के बाद तत्काल बकुलेश को नई शाखा के लिए रिलीव कर दिया गया. हरेक कर्मचारी के आने-जाने पर स्वागत बधाई का कार्यक्रम आयोजित  करने में कोई  कमी नहीं रखने वाले बकुलेश की बिदाई नितांत औपचारिक चाय के साथ संपन्न हो गयी.
कार्यमुक्ति और नई शाखा में कार्यभार ग्रहण करने के बीच सात दिनों का समय मिलता है. बकुलेश ने सोचा वसुधा को अब डॉक्टर को दिखा ही देना चाहिए.

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वसुधा की शंका सच ही थी. दाहिने स्तन में धीरे-धीरे कुछ गांठें बढ़ती जा रही थी. मेमोग्राफी में सब कुछ साफ़ आया था. डॉक्टर जोसेफ प्रसिद्द एन्कोलोजिस्ट और सर्जन थे. उन्होंने कहा-‘गांठें कैसी भी हों निकालना तो जरूरी है ही, फिर प्रतीक्षा क्यों की जाए. आप लोग समय पर इलाज शुरू कर दें.’ अब यह ला-इलाज भी नहीं है. ब्रेस्ट कैंसर से मुक्ति पाई जा सकती है.’

बकुलेश को तो यह सुनकर जैसे चक्कर ही आ गए.. इस मामले में वसुधा बहुत हिम्मत वाली रही है. उसने ठीक से सब बातें समझी और अपने तुरंत इलाज के लिए तैयार हो गयी.

इलाज क्या होना था. शरीर से प्रभावित हिस्सा पूरा ही अलग कर देना पडा. किसी स्त्री के इस अनायास आये अधूरेपन के दुःख को समझना सबके बस की बात नहीं. काश आइना झूठ दिखा पाता.. वसुधा की छाती भर जाती..आँखों से नदियाँ बहती हुईं सारे घर को भिगो देती...

सात दिन के भीतर सब कुछ हो गया. नहीं हुआ तो वह यह कि बकुलेश नई शाखा में ज्वाइन नहीं कर सका. पत्नी की बीमारी के प्रमाणपत्रों के साथ अवकाश की सूचना नियंत्रक आधिकारी के कार्यालय को पंजीकृत डाक से रवाना कर दी.




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तीसरा विकल्प 

और आखिर वह तारीख भी तय हो गई जिस दिन से 'मालवा बैंक' का विलय 'भारतीय बैंक' में हो जाना था। इसके बाद एक छोटे और लगातार लाभ कमाने वाले नब्बे  वर्षीय बैंक का नाम इतिहास और स्मृतियों में दर्ज हो जाने वाला था। 

घोषणा के पूर्व ही बैंक में विलय विरोधियों के प्रति  जो दुर्भावना और प्रताड़ना का वातावरण बनने लगा था, उसके परिणाम स्वरूप कई कर्मठ कार्यकर्ताओं ने समय पूर्व सेवानिवृत्ति लेना शुरू कर दिया । सुरेश भाई, पांडेजी और कुमार भी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले चुके थे। यह भी अच्छा हुआ कि  मालवा बैंक के प्रबंधन के रहते ही उन्होंने आवेदन कर दिया था और मुक्त हो गए, अन्यथा मर्जर के बाद तो हालात और भी विकट होते चले गए थे।

दूसरी एक अच्छी बात यह हुई थी कि बैंक यूनियन के लंबे संघर्ष के बाद न सिर्फ  'मालवा बैंक' में बल्कि अन्य बैंकों में भी पेंशन योजना लागू हो चुकी थी। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ती के बाद भी आय का  नियमित स्रोत उपलब्ध था। कर्मचारियों में बैंक छोड़ने की हिम्मत भी  इस तरह थोड़ी बहुत आ गई थी। बकुलेश का अवसाद भी पेंशन योजना के लागू होने के बाद धीरे धीरे समाप्त होता गया था। बल्कि अवसाद से उबर कर वह अधिक सक्रिय और वैचारिक रूप से सशक्त हुआ था. इस बीच उसके चार नए संग्रह प्रकाशित हो चुके थे. 

विलय की तारीख तय होते ही मैनेजमेंट ने मालवा बैंक के सभी अधिकारियों, कर्मचारियों से विकल्प चाहे। उनके सामने तीन विकल्प थे। पहला यह कि बैंक में बने रहकर भारतीय बैंक में लागू वेतन, पेंशन और अन्य सुविधाएं लेते रहना। दूसरा यह कि मालवा बैंक की पेंशन और भारतीय बैंक की सुविधाओं के साथ बैंक में बने रहना। तीसरा बड़ा स्पष्ट विकल्प था, जिसमें 'मालवा बैंक' की पेंशन योजना एवं अन्य लाभ लेकर तुरंत सेवानिवृत्ति ले लेना। समूचे बैंक में बकुलेश ही एक मात्र ऐसा अधिकारी था जिसने तीसरे विकल्प में अपनी सहमति तत्काल दे दी।

वैसे भी वसुधा की देखभाल के लिए यही सबसे अनुकूल निर्णय था। दोनों बैंकों के प्रबंधन ने किसी प्रकार की सहानुभूति उसके अटेचमेंट आवेदन पर दिखाई भी नहीं थी, उल्टे घर से तीन सौ  किलोमीटर दूर ग्रामीण शाखा में शाखा प्रबंधक के रूप में लगभग दंडात्मक  नियुक्ति कर दी गई थी। परिवार को छोटे से गांव में ले जाना कतई संभव नहीं था। वसुधा का इलाज अभी  इधर लंबा चलना था। ऑपरेशन के बाद कीमो थेरेपी और रेडिएशन भी होना थे। 
बकुलेश ने लगभग तैतीस वर्षों की बैंक सेवा के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन कर दिया। हालांकि इसकी स्वीकृति में ही छह माह गुजर गए थे। इसके बाद तो अन्य  स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति प्रकरणों में मैनेजमेंट ने कई अड़ंगे डालना शुरू कर दिए थे। पुरानी फाइलें खोली जाने लगीं थी। जरा सी भी  नकारात्मक बात पाए जाने पर, गहन छानबीन और सवाल जवाब का सामना करना पड़ा था साथियों को।
जो नौकरी में थे  एक ही बात कहते थे 'बकुलेश तुमने बहुत अच्छा किया जो नौकरी छोड़ दी, अब बैंक की नौकरी हमारे जैसे लोगों के लिए नहीं रह गई है।
पता नहीं उनकी बातों में कितनी सच्चाई होती थी या यों ही बकुलेश का दिल रखने को ऐसा कह देते थे वे ही जानते होंगे।



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