उपन्यास
डेबिट क्रेडिट
ब्रजेश कानूनगो
समर्पण
तंगबस्ती के संघर्षशील बच्चों
और
‘इंदौर बैंक’ के अपने पुराने साथियों सहित
अनुज गिरीश कानूनगो (गणू) और बेटे जैसे दामाद संकल्प बक्षी
के लिए
परिचय
ब्रजेश कानूनगो
जन्म - 25 सितम्बर 1957 देवास, मध्य प्रदेश में।
शिक्षा - रसायन विज्ञान तथा हिन्दी साहित्य मे स्नातकोत्तर।
प्रकाशन –
व्यंग्यसंग्रह : ‘पुन: पधारें’ (1995),
‘सूत्रों के हवाले से’ (2014), ‘मेथी की भाजी और लोकतंत्र’ (2017).
कविता संग्रह : ‘इस गणराज्य में’ (2014),
‘कोहरे में सुबह’ (2017) वसुधा की अनुषंगी कविता पुस्तिका ‘धूल और धुएँ के परदे
में’ (1999), कविता पुस्तिका ‘चिड़िया का सितार’ (2017),
छोटी-बड़ी कहानियों का संग्रह : ’रिंगटोन’ (2016)
बाल साहित्य : बाल कथाओं की पुस्तक ‘फूल शुभकामनाओं के’ (2003) , बाल गीतों की
पुस्तिका ‘चाँद की सेहत’ (2007) प्रकाशित।
सम्प्रति – सेवानिवृत्त बैंककर्मी, रचनात्मक लेखन, सामाजिक एवं सांस्कृतिक
गतिविधियों में संलग्न, तंगबस्तियों के गरीब बच्चों के लिए चलाए जाने वाले
व्यक्तित्व विकास शिविरों मे सक्रिय सहयोग।
सम्पर्क - मनोरम, 503 ए,गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क,कनाडिया रोड, इन्दौर-452018
फोन -0731 2590469 मो.न. 09893944294 ई-मेल- bskanungo@gmail.com
अपनी बात
'डेबिट क्रेडिट' मेरा पहला उपन्यास है। इससे पहले गद्य में बाल कथाओं के अलावा व्यंग्य के तीन संग्रह और छोटी बड़ी कहानियों का एक संग्रह प्रकाशित हुआ है।
विधा विशेष की अपेक्षा कथ्य और विचारों को अभिव्यक्त करना मेरी प्राथमिकता में रहता आया है अतः अन्य विधाओं में आवागमन से कभी कोई परहेज रहा नहीं। कविता के दो संग्रहों के अलावा बालगीतों सहित कुछ पुस्तिकाएं भी प्रकाशित हुईं हैं।
रचना संसार के मित्रों और बैंक सेवा के अपने पुराने साथियों के आग्रह और प्रोत्साहन के फलस्वरूप मैंने इस उपन्यास को कागज़ पर उतारने की कोशिश की है।
दरअसल, बीते समय की कुछ ख़ास स्मृतियों और विभिन्न प्रसंगों, घटनाओं,संस्मरणों के कहानीकरण के प्रयास में यह उपन्यास निकलकर आया है। निसंदेह ऐसा करते हुए स्वयं के जीवन और कार्यों को समाज और समकालीन परिदृश्य से अलग करके नहीं देखा जा सकता। इसी कारण बैंकिग उद्योग की हलचलों एवं नई तकनीक और नीतियों की वजह से आ रहे सामाजिक,आर्थिक बदलाव और नई चुनौतियों के कुछ संदर्भ भी पाठकों को इस उपन्यास में दिखाई देंगे।
उपन्यास का नायक एक संवेदनशील युवक है। जो एक कवि ,सामाजिक कार्यकर्ता और बैंककर्मी के रूप में चालीस पचास वर्षों के अंतराल में उम्र की वरिष्ठता तक ईमानदारी और कर्मठता से अपना काम जारी रखता है।
नायक के बहाने जीवन के उतार, चढ़ाव, सुख, दुख और खट्टे मीठे आस्वाद को अभिव्यक्त करने की कोशिश भी है यह उपन्यास।
इसके कुछ हिस्सों को वर्तमान दौर में हमारी आत्मकेंद्रित मनः स्थितियों, जीवन शैली में आये अकेलेपन और निराशा के बीच आनन्द की कुछ अनुभूतियों को सहेजने के विनम्र प्रयास के रूप में भी देखा जा सकता है। अब यह तो पाठक ही बता पायेंगे कि लेखक अपने उद्देश्य में कहाँ तक सफल हो पाया है।
लिखने के दौरान 'इंदौर बैंक' के पुराने साथियों सहित वरिष्ठ सामाजिक और ट्रेडयूनियन कार्यकर्ता श्री आलोक खरे ने बहुत प्रोत्साहन दिया है। बल्कि यह कहूँ कि उनके द्वारा तंगबस्ती के बच्चों के लिए लगाए जाने वाले व्यक्तित्व विकास शिविरों में शिविरार्थियों के हौसलों और प्रतिभा को देखकर ही इस कृति को लिखने का मन बना। इन सबका हृदय से आभारी हूँ।
उपन्यास के रूप में मैंने अपने संस्मरणों और जीवन की कुछ घटनाओं का मात्र कथान्तरण किया है। किसी भी व्यक्ति विशेष और संस्था से इसका कोई प्रामाणिक संबंध नहीं है। उम्मीद है पाठकों का स्नेह और समर्थन इस कृति को भी अवश्य मिलेगा। प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।
ब्रजेश कानूनगो
'डेबिट क्रेडिट' मेरा पहला उपन्यास है। इससे पहले गद्य में बाल कथाओं के अलावा व्यंग्य के तीन संग्रह और छोटी बड़ी कहानियों का एक संग्रह प्रकाशित हुआ है।
विधा विशेष की अपेक्षा कथ्य और विचारों को अभिव्यक्त करना मेरी प्राथमिकता में रहता आया है अतः अन्य विधाओं में आवागमन से कभी कोई परहेज रहा नहीं। कविता के दो संग्रहों के अलावा बालगीतों सहित कुछ पुस्तिकाएं भी प्रकाशित हुईं हैं।
रचना संसार के मित्रों और बैंक सेवा के अपने पुराने साथियों के आग्रह और प्रोत्साहन के फलस्वरूप मैंने इस उपन्यास को कागज़ पर उतारने की कोशिश की है।
दरअसल, बीते समय की कुछ ख़ास स्मृतियों और विभिन्न प्रसंगों, घटनाओं,संस्मरणों के कहानीकरण के प्रयास में यह उपन्यास निकलकर आया है। निसंदेह ऐसा करते हुए स्वयं के जीवन और कार्यों को समाज और समकालीन परिदृश्य से अलग करके नहीं देखा जा सकता। इसी कारण बैंकिग उद्योग की हलचलों एवं नई तकनीक और नीतियों की वजह से आ रहे सामाजिक,आर्थिक बदलाव और नई चुनौतियों के कुछ संदर्भ भी पाठकों को इस उपन्यास में दिखाई देंगे।
उपन्यास का नायक एक संवेदनशील युवक है। जो एक कवि ,सामाजिक कार्यकर्ता और बैंककर्मी के रूप में चालीस पचास वर्षों के अंतराल में उम्र की वरिष्ठता तक ईमानदारी और कर्मठता से अपना काम जारी रखता है।
नायक के बहाने जीवन के उतार, चढ़ाव, सुख, दुख और खट्टे मीठे आस्वाद को अभिव्यक्त करने की कोशिश भी है यह उपन्यास।
इसके कुछ हिस्सों को वर्तमान दौर में हमारी आत्मकेंद्रित मनः स्थितियों, जीवन शैली में आये अकेलेपन और निराशा के बीच आनन्द की कुछ अनुभूतियों को सहेजने के विनम्र प्रयास के रूप में भी देखा जा सकता है। अब यह तो पाठक ही बता पायेंगे कि लेखक अपने उद्देश्य में कहाँ तक सफल हो पाया है।
लिखने के दौरान 'इंदौर बैंक' के पुराने साथियों सहित वरिष्ठ सामाजिक और ट्रेडयूनियन कार्यकर्ता श्री आलोक खरे ने बहुत प्रोत्साहन दिया है। बल्कि यह कहूँ कि उनके द्वारा तंगबस्ती के बच्चों के लिए लगाए जाने वाले व्यक्तित्व विकास शिविरों में शिविरार्थियों के हौसलों और प्रतिभा को देखकर ही इस कृति को लिखने का मन बना। इन सबका हृदय से आभारी हूँ।
उपन्यास के रूप में मैंने अपने संस्मरणों और जीवन की कुछ घटनाओं का मात्र कथान्तरण किया है। किसी भी व्यक्ति विशेष और संस्था से इसका कोई प्रामाणिक संबंध नहीं है। उम्मीद है पाठकों का स्नेह और समर्थन इस कृति को भी अवश्य मिलेगा। प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी।
ब्रजेश कानूनगो
अनुक्रम
1 भीतर खुलती खिड़की से
2 स्मृति के फूल
3 हेमा माझी की उड़ान
4 सत्यम् शिवम् सुन्दरम्
5 बाल
सभा
6 बचपन की बरसात
7 टेबल टेनिस का बैट
8 चेन्नई टू हाँकाँग
8 चेन्नई टू हाँकाँग
9 पहली किताब का जश्न
10 भूत लेखक
11 तैयारी बैठक
12 महाकाल की जैसी इच्छा
13 पेंशन योजना की मांग
14 भीम के बीम
15 सूखा बरगद
16 भाटियाजी का दिन
17 उदयपुर की हवा
18 मुआवजा
19
दर्द का
दरिया
20 तीसरा विकल्प
21 जामुन की मिठास
22 लाल सलाम
22 लाल सलाम
23 विश्वास का नाता
24 मजदूर एकता जिंदाबाद
25 दंश
26 क्रेडिट डेबिट
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