ब्रजेश कानूनगो के बालगीत
चांद की सेहत
आसमान में रोज रात को
चंदू देखता गोल चांद को
तारे ज्यों के त्यों रहते हैं
बादल में छुपते रहते हैं
लेकिन चंदा हरदम
नहीं एक सा रहता
पहले दिखता पूरा
फिर धीरे-धीरे घटता
चंदा की गिरती सेहत से
चिंतित चंदू मां से बोला
राज जरा बतलाओ इसका
मैं हूं मम्मी बिल्कुल भोला
बात जरा गहरी है बेटा
अक्ल तेरी है थोड़ी मोटी
आसमान की थाली में
चांद एक मीठी रोटी
अंश अंश मीठी रोटी का
आसमान खा जाता है
इसीलिए आकार चांद का
रोज रोज घट जाता है
लेकिन मम्मी फिर एकम को
नया चांद क्यों दिखता हमको?
कठिन सवाल चंदू का सुनकर
सोचा मम्मी ने रुककर
गप्प यहां अब नहीं चलेगी
सही बात ही काम करेगी
सूरज के प्रकाश से
रोशन जितना हो पाता है
उतना ही हिस्सा पृथ्वी पर
चांद का हमको दिख पाता है
पृथ्वी और चंदा दोनों ही
सूरज के चक्कर खाते हैं
तीनों की स्थितियों से चांद के
रूप अनेक नजर आते हैं.
०००००
बच्चों की सरकार
पप्पू चुन्नू पिंकी ने
किया एक विचार
छोटे-छोटे बच्चों की
बने एक सरकार
भाँति-भाँति की राय
केवल एक बचाव
बच्चों की सरकार बनेगी
करवा कर एक चुनाव
गुड्डू जी की बुद्धिमता से
हुआ जल्द समाधान
मोहल्ले भर के सारे बच्चे
करें गुप्त मतदान
दल दो थे बच्चों के
पहचान बनाई भिन्न
भिन्नता के इसी प्रश्न पर
निश्चित हुए दो चिन्ह
टिंकी मुन्नी सलमा चुन्नी का
एक बना विपक्ष
गुड्डू पप्पू राजू का
बना दूसरा पक्ष
पापा-मम्मी की तानाशाही की
पिंकी बनी निवेदक
बच्चों ने जब किया समर्थन
बन गया एक विधेयक
प्यारी मम्मी के विरोध में
राजू जी को आ गया रोश
जल्दबाजी में कहीं विधेयक
ख़त्म न कर दे जोश
राजू के वक्तव्य से
पप्पू जी हो गए खफा
बाल सदन से बाहर हो गए
देकर अपना इस्तीफा
पप्पू जी के समर्थन में हुआ
तर्क वितर्क का जंग
अल्पमत में पक्ष रह गया
सरकार हो गई भंग.
०००००
एक मैच जंगल के अंदर
विश्वकप के मैच देखकर
बोला मित्रों से बंदर
एक मैच हम भी खेलेंगे
इस जंगल के अंदर
प्रमुख खिलाड़ी एक टीम के
गीदड़, बंदर, भालू
दूसरी के हीरो थे चीता
लोमड़ी और हाथी कालू
अमरूदों पर गोंद लगाकर
बहुत बनाई गेंदे
स्टम्पों के काम में आई
छोटी छोटी बेतें
सुनकर खबर किरकिट की
वन में दौड़ी भारी भीड़
पशुओं की तो बात निराली
पक्षियों ने भी छोड़ी अपनी नीड़
जंगल के सारे पशु-पक्षी
करने लगे जब हल्ला
हाथी जी ने थाम लिया तब
भारी-भरकम बल्ला
फुलटास पर हाथीजी ने
एक लगाया छक्का
बाउंड्री तक दौड़ा भालू
रह गया हक्का-बक्का
गीदड़जी की एक गेंद पर
चीतेजी का कैच हो गया
आसमान से बरसा पानी
खत्म वहीं पर मैच हो गया.
०००००
बरसाती नोक झोंक
अगड़म बगड़म
सालम-सू
मैं हूं सूरज
चंदा तू
मैं कड़कती
बिजली
काला काला
बादल तू
मैं बरसता
पानी
रात को
गुल
बिजली है तू
इधर भी कीचड़
उधर भी कीचड़
उसमें फसती
मोटर तू
मैं सुलगती
लकड़ी
घर की
सीलन तू
मैं हूँ मीठा
आम
खट्टा-खट्टा
जामुन तू.
०००००
मटकी ही मटकी
प्यास लगी तो मुन्ने जी की
नजर प्याऊ पर जा अटकी
नहीं फ्रिज का ठंडा पानी
रखी वहां मिटटी की मटकी
डिस्को करता बबलू भैया
साथ दे रही छूटकी बटकी
दूर कहीं कोई गीत गा रहा
खूब बज रही ढपली और मटकी
चाचा की बारात में जाकर
खूब मिठाई गटकी
दूल्हा दुल्हन फेरे फिरते
साक्ष्य बनी मटकी ही मटकी
नाच रही मेवाड़ी बाला
आंखें आसमान पर जा अटकी
पैरों के नीचे तीखी थाली है
सिर पर मटकी पर मटकी
राजा जी के मुकुट सुहाता
महलों पर गुंबज की पगड़ी
मंदिर पर सोने का लोटा
शिव पर झरती मटकी
मैं नहीं माखन खायो सुनकर
मैया ना पिघली ना भटकी
नटनागर की शैतानी पर
हंसती थी टूटी मटकी
गागर में सागर होता है
टीचर सब को कहती
सब कुछ अपना देकर भी
कुछ ना लेती मटकी.
०००००
मामा की मशीन
बंदर मामा की दुकान से
चोरों ने जब माल चुराया
वैज्ञानिक बनने का तब
शौक उन्हें चर्राया
सुबह शाम दिमाग लड़ाया
खाना पीना सब छोड़ा
तब कहीं जाकर मामा जी का
दौड़ा अकल का घोड़ा
चोरों के घुसते ही घर में
घंटी जोर से बजती
लीवर से संचालित लकड़ी
सिर पर उनके पड़ती
मशीन लगाकर मामा सोए
उठे हुई जब मोर
चोर पकड़ने की मशीन को ही
उठा ले गए चोर.
०००००
बरसात
बिजली कड़की है बरसात
बादल गरजा है बरसात
ककड़ी भुट्टा है बरसात
गिलकी भजिया है बरसात
मेंढक की टर-टर है बरसात
छतरी पर टप-टप है बरसात
कीचड़ पानी है बरसात
स्कूल की छुट्टी है बरसात
दादा की गोदी है बरसात
दादी की लोरी है बरसात
पापा की झिड़की है बरसात
मम्मी की चुम्मी है बरसात.
०००००
दादा जी का चश्मा
रोज सवेरे दादाजी
पढ़ते हैं अखबार
बिन चश्मे के लेकिन आंखें
होती नहीं तैयार
गम था चश्मा दादा जी का
बेहद थे परेशान
टीटू जी को दया आ गई
देख उन्हें हैरान
तुरंत दौड़कर पास में आए
लेकर अपना बस्ता
पुस्तक खोली पन्ना पलटा
खोज दिखाया चश्मा
ऐ-से ऐनक
चश्में की तस्वीर दिखाई
दादाजी का गुस्सा भागा
बहुत जोर की हंसी आई.
०००००
मामा की पाठशाला
बंदर मामा चले पढ़ाने
हिंदी पुस्तक बाँच
कक्षा में बैठे थे शेर
तीन और दो पांच
देखा जब उन पांचों को
सूंघा उनको सांप
उसी समय उनका तो
साथ गया था काँप
लिखा बोर्ड पर फिर भी उसने
सपेरे ने बजाई बीन
शेर दहाड़ा तो मामा जी
हुए एक-दो-तीन.
०००००
गुड़िया की चिट्ठी
रोज देखती गुड़िया
अपनी प्यारी चिड़िया
दिन चढते ही आती चिड़िया
कभी ट्यूब लाइट के ऊपर
छत पर लटके पंखे पर
घर अपना बनाती चिड़िया
कभी भैया के बस्ते में
खूंटी पर टंगे पापा के पेंट में
मम्मी की ड्रेसिंग टेबल पर
तिनके रोज जुटाती चिड़ियां
भैया के कंकर से कांपती
पापा के हाथों से डरती
मम्मी की झाड़ू से भागती
फुर्र फुर्र उड़ जाती चिड़िया
पत्र डालती मंत्री जी को
प्यारी चिड़िया की प्यारी गुड़िया
मिले हक चिड़िया को उसका
घर भी दिलवाओ उसको बढ़िया..
०००००
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