Tuesday, June 5, 2018

उपन्यास :डेबिट क्रेडिट: ब्रजेश कानूनगो : एक


उपन्यास :डेबिट क्रेडिट: ब्रजेश कानूनगो
1
भीतर खुलती खिड़की से

खिड़की से होकर सुबह का उजास धीरे धीरे अस्पताल के कमरे में प्रवेश करने लगा था. बकुलेशजी को रोशनी में नींद नहीं आ पाती थी सो वसुधा रात को सोने के पहले नाइट लेम्प बंद कर दिया करती थी. हलके आसमानी रंग के पर्दों से छनकर जब थोड़ी सी धूप, नीम की पत्तियों को सहलाती खिड़की से होकर दीवार पर गिरने लगती तो श्वेत-श्याम छाया-चित्र से बन जाते थे. इन्हें देखते ही बकुलेश बिस्तर छोड़ देते थे.
फ्रेश होकर अपनी चेयर खिड़की के पास ले जाते और परदे को थोड़ा साइड में खिसकाकर बाहर का नजारा देखने लगते. सुबह की चाय यहीं बैठकर पीते थे. पिछले पंद्रह दिनों से यह उनका नित्य का क्रम हो गया था.
ऑपरेशन के बाद अब उन्होंने थोड़ा बहुत चलना-फिरना भी शुरू कर दिया था. लेकिन अभी केवल रूम के बाहर कॉरिडोर में ही वे चहल कदमी कर पाते थे. आज खिड़की के पास बैठते ही   उन्हें कुछ लिखने की भी इच्छा होने लगी.
‘वसुधा मेरा पेन और कागज़ देना ज़रा..’ बकुलेशजी ने चाय ख़त्म कर कप स्टूल पर रखते हुए कहा.
बकुलेश कभी खिड़की के बाहर देखते, कभी आँखें मूँद कर कुछ सोंचने लगते फिर तख्ती पर कुछ पंक्तियाँ लिखते. इस बीच नर्स आकर उनका ब्लड प्रेशर चेक कर गयी, दवाई का नियमित डोज भी खिला गयी. बकुलेशजी का लिखना काफी देर तक जारी रहा.
उन्हें लिखते देखकर वसुधा को बहुत संतोष हो रहा था. वह जानती थी कि यदि उन्होंने लिखना पढ़ना फिर से शुरू कर दिया तो रिकवरी बहुत जल्दी हो जायेगी. बीमारी के दौरान आए इस अस्थायी अवसाद का यही तो एक हल होता है कि रोगी अपने रूचि के काम में व्यस्त हो जाए.

पहले जब भी बकुलेश कुछ लिख लेते थे, उनका आत्मविश्वास बढ़ जाता था, मन खिल उठता था. घर-भर में जैसे उत्सव का कोई अवसर आ गया हो.  सच भी था किसी भी रचनात्मक व्यक्ति के लिए इससे बड़ी खुशी और क्या हो सकती है. और प्रसन्नता तो संक्रामक होती ही है..एक से दूसरे तक फैलती जाती है.. यह बिलकुल सच बात है...
हादसे के बाद जैसे बकुलेश बुझ से ही गए थे. जीवन में कई उतार चढ़ाव आये थे मगर इस बार जैसे निराशा ने गहरे से उन्हें जकड लिया था. शायद अपने को इतना अकेला उन्होंने कभी महसूस नहीं किया. वसुधा की बीमारी के वक्त भी अपनी हिम्मत बनाए रखी थी.  
ऐसा था भी नहीं कि वे बिलकुल अकेले और असहाय थे. परन्तु उनके मन का क्या इलाज है.. वैसे ही कवि बड़ा संवेदनशील जीव होता है. बकुलेश के मन को डूबते जाने से रोक पाना भला किसी और के लिए कितना संभव हो सकता था...

ट्रेफिक जाम के दौरान बकुलेश को पड़े दिल के दौरे की घटना के बाद आनंद बाबू तो तुरंत ही खबर मिलते दौड़े चले आये थे. ओपरेशन थियेटर के बाहर भी दुबेजी, सुरेश भाई सभी बठे रहे थे. गाँव से आया छोटे भाई ज्ञानू का परिवार भी तीन दिन तक अस्पताल में ही रहा. वसुधा को काफी मदद और हिम्मत रही इससे.
पिछले हफ्ते बेटा अश्विनी , बहू और पोता अमोल भी कनाडा से, बेटी अंकिता और दामाद चेन्नई से आ गए थे. नैरोबी से सार्थक और नैन्सी ने भी स्काइप से बातचीत की थी. और ‘जामुन’ तो अब काफी बड़ा हो गया था. देखकर ही मन खुश हो गया था वसुधा का. लेकिन ये सब कब तक चल सकता था. सच तो यही था कि वसुधा और बकुलेश को ही एक दूसरे का भरोसा बनाए रखना था... या फिर कोई कविता या सृजन का सुख ही उनके जीवन में नया उत्साह भर सकता था.   
वसुधा खुश थी कि बड़े दिनों बाद बकुलेश ने कलम उठाई थी. उसे विश्वास था, अब जल्दी अस्पताल से मुक्ति मिल जायेगी और वे घर लौट सकेंगे.

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रात के भोजन में कैंटीन से वसुधा ने अपने लिए दाल-चांवल मंगा लिए थे. बकुलेश के लिए तो दलिया अस्पताल की ओर से ही आ गया था. खाना खाने के बाद थोड़ी चहल कदमी कोरिडोर में ही दोनों ने कर ली थी.
‘वसुधा ज़रा बैठो.. नई कविता सुनाता हूँ तुम्हे..’बकुलेशजी  ने वसुधा का कंधा पकड़ते हुए अपने पास बैठा लिया. ‘सुनो....’  

कैसा होगा वहाँ ?
दूर दिखाई देती पहाडी के पीछे
सूरज निकलता है रोज जहाँ से

एक नदी होगी शायद
झरना भी हो सकता है
जो गिरता होगा पहाडी के ऊपर से
धरती पर गहरा गड्ढा हो गया होगा
पिकनिक मनाने आए बच्चों को
उधर जाने से रोक रहे होंगे दादाजी हाँक लगाते हुए

धान का खेत होगा पहाडी के पीछे
सतरंगे वस्त्रों को कमर में खोंसकर औरतें
रोप रहीं होंगी हरे पत्तेदार पौधे
गुनगुनाते हुए
देवी का मन्दिर होगा पहाडी की चोटी पर
तलहटी से सैकडों सीढियाँ पहुंचती होंगी वहाँ
एक दीप स्तम्भ होगा
और रात को रोशनी बिखर जाती होगी चारों ओर
एक बडा घंटा कुछ नगाडे रखे होंगे
आरती के वक्त बजाया जाता होगा जिन्हे

सडक बन रही होगी
काली टंकियों में पिघल रहा होगा तारकोल
चक्के पर घूम रहे डमरू में खडखडा रही होगी गिट्टियाँ
रोड रोलर के इंजिन की आवाज बदल रही होगी लोरी में
बबूल की छाया में बंधी झोली में सो रहा होगा कोई बच्चा
शोरगुल के बीच 

तमाम जीवित ध्वनियाँ उपस्थित होंगी वहाँ
जो नहीं है अस्पताल में खिडकी के पास लगे पलंग के आस-पास ।
  
कविता सुनाकर बकुलेश खामोश हो गए. खुशी में वसुधा की आँखों से कुछ बूँदें छलक कर तख्ती पर लगे कागज़ को भिगो गईं. नई कविता का पन्ना दोनों की छातियों के बीच दिल की तरह धड़क रहा था.
अस्पताल की खिड़की के बाहर इधर आसमान में सितारे निकल आये थे... उधर बकुलेश के भीतर भी एक खिड़की खुल गयी थी....  मन के आकाश में स्मृतियों के सितारे रोशनी बिखेरने लगे थे...

०००००० 




2
स्मृति के फूल   

लिली में काफी फूल आ गए थे. पौधों में पानी डालते हुए बकुलेशजी  के सामने वही सूखा गमला आ गया. जिसमें केवल मिट्टी भरी थी. उसमें पानी नहीं डालते थे वे. सोचते रहते थे कि कभी अच्छे फूल का बीज या कलम लाकर रोप देंगें. यही सूखा गमला कभी उनके लिए ‘मस्ती-टाइम’ का कारण बन गया था.
अमोल साथ में छत पर आता तो उनके हाथ से बाल्टी झपट लेता. खुद ही नल के नीचे रखकर पानी भरता. यहीं से दादा-पोते के बीच थोड़ी झड़प शुरू हो जाती थी. अमोल बाल्टी को पानी से लबालब तब तक भरता रहता जब तक कि वह बाहर ढुलने नहीं लगे. बकुलेश उसे रोकते भी, टोटी बंद कर देते, लेकिन अमोल खिलखिलाता हुआ फिर से नल चालू कर देता.

अमोल को पानी से खेलने में बहुत मजा आता था. गमलों में पानी डालता, पौधों को इतना सींचता कि गमले ओवर फ्लो करने लगते. बकुलेश उसे बार बार समझाते कि गमले में इतना पानी मत डालो, मगर वह नहीं रुकता. यहाँ तक कि जो गमले खाली पड़े थे उन्हें भी पानी से लबालब कर देता. बकुलेशजी को चिढ भी होती और उस पर प्यार भी उमड़ आता.

रोज यही होता. खाली गमलों को वह पूरा पानी से भर देता और फिर शरारत से दादा की ओर देखता, हंसता..खिलखिलाता. सारे गमलों में पानी डालने के बाद थोड़ा सा पानी बाल्टी में बचा लेता और दादा की ओर उछालते हुए कहता- ‘दादा! मस्ती-टाइम’..!! बकुलेश उसे डपटते तो और नजदीक आकर पानी उडाता..’ पूरी छत और दोनों के भीग जाने के बाद ही उनका ये मस्ती टाइम ख़त्म हो पाता.

जब तक अमोल रहा, घर में टीवी नहीं देखा गया था और अखबार भी बिना तह खुले रैक पर जमा होते गए थे. सुबह-सुबह अमोल बहुत उत्साह से दादा के हाथ से चाबी छीनकर गेट का ताला खोल देता और चेन घुमाते हुए सीधे बाहर सड़क पर दौड़ पड़ता था..वह आगे-आगे बकुलेशजी उसके पीछे-पीछे. सुबह की सैर को निकले कॉलोनीवासी उनकी इस भाग-दौड़ को बहुत कुतूहल से देखने लगते थे.
‘पोता आया है शायद बकुलेशजी का..’ जैसे शब्द सुनकर उनके भीतर आत्मीय अनुभूतियों और रिश्तों की मिठास घुलने लगती थी.   

कनाडा जाने के बाद बेटे अश्विनी का परिवार लगभग तीन साल बाद ही घर आ पाया था. इसके लिए किसी को दोष नहीं दिया जा सकता. परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी बनती चली गई कि वे लोग चाहकर भी न आ पाए. नौकरी की भी अपनी मजबूरियां होती हैं. इस बीच इन लोगों का भी वहां जाना संभव नहीं हो सका. हालाँकि ‘स्काइप’ या ‘जी-टॉक’ के जरिये रोज ही लेपटॉप पर आमने- सामने बातचीत हो जाती थी. लेकिन अमोल स्क्रीन पर बहुत कम आता.. कुछ झिझक सी रहती थी .. बहुत कहने पर एक आध बार ‘हाय-बाय’ करके अदृश्य हो जाता था.

यह तो उसके यहाँ इंदौर आने पर ही स्पष्ट हुआ कि हिन्दी बोलने में होने वाली दिक्कत के कारण वह सामने नहीं आता था. हिन्दी आसानी से समझ लेता था लेकिन टोरंटो के स्कूल में अपने दोस्तों के साथ अंगरेजी में दिन भर बातचीत की आदत के कारण हिन्दी में बोलना उसके लिए कठिन हो गया था. यह दिक्कत शायद वैसी ही रही होगी जैसे अंगरेजी में सारी पढाई करने के बावजूद गैर हिन्दी भाषी व्यक्ति से सामना होने पर बकुलेशजी को होती थी.  कनाडा जाने से पहले जब वह यहाँ था तब उसकी भाषा सुनकर सबको सुखद आश्चर्य होता था. ‘डोरेमान’ और अन्य कार्टून चरित्रों के हिन्दी में डब संवादों की वजह से हिन्दुस्तानी के इतने बढ़िया शब्द बोलता था कि सब हत-प्रभ रह जाते थे.

इन दस दिनों में उसने यहाँ सबसे हिन्दी में बात करने के लिए खूब मेहनत की थी. उसकी कोशिश साफ़ दिखाई देती थी. उसके आने पर अलमारी में रखी धूल खा रही शतरंज और कैरम के दिन फिर गए थे. वजीर, राजा, हाथी, घोड़ा, ऊँट, प्यादे अब विलायती भाषा और भूषा में पूरे घर में दौड़ लगा रहे थे.

कॉलोनी के हमउम्र बच्चों के बीच भी अमोल बहुत पसंद किया जाने लगा. आमतौर पर हिन्दी में बात करते कॉलोनी के बच्चों को भी स्कूल के अलावा अमोल के साथ अंगरेजी में बतियाने में खूब मजा आ रहा था. शुरू शुरू में जब वह कुछ बोल नहीं पा रहा था तो अटपटा भी लगा लेकिन जब पता चला कि वह कनाडा से आया है तो बच्चे खुलकर अंगरेजी में बातचीत करने लगे. इधर अमोल की झिझक भी टूटने लगी, वह भी हिन्दी में ही बोलने की कोशिश करने लगा. हिन्दी दिवस के दिन जब बकुलेशजी एक कार्यक्रम के मुख्य आतिथ्य के बाद घर लौटे तो गेंदे की अपनी माला सहज अमोल के गले में डाल दी.

दस दिनों के बाद ‘मस्ती-टाइम’ ख़त्म हो गया था. बकुलेशजी  रोज की तरह छत पर गमलों में लगे पौधों में पानी दे रहे थे. फिर से अब उनकी वही पहले वाली  नियमित दिनचर्या हो गयी थी. सुबह उठते ही मेन गेट पर लगी चेन और ताला खोलना, दूध के पैकेटों की थैली और अखबारों को भीतर लाकर मॉर्निंग वाक के लिए निकल जाना. लौटकर वसुधा और खुद के लिए चाय बनाकर रात को टीवी पर देखे बासी समाचारों को अखबारों में पुनः पढ़ना. थोड़ा सा योग करके छत पर रखे गमलों में पानी डालना, पौधों की देखभाल करना. संभव हुआ तो शाम को किसी साहित्यिक-सामाजिक कार्यक्रम में चले जाना और देर रात तक टीवी पर समाचार-बहसें आदि देखते हुए सो जाना.

न जाने क्या सोंचकर बकुलेशजी ने भी अमोल की ही तरह मिट्टी भरे सूखे गमले में पानी डालने को सहज ही मग आगे बढ़ा दिया. देखकर अचरज से भर गए कि गमले में गेंदे के कुछ पौधों का अंकुरण हो आया था.
मस्ती टाइम में अमोल के सींचे पौधों में खिले फूल धीरे धीरे वसुधा और बकुलेशजी के अकेलेपन को थोड़ा बहुत खुशबू से भर देने की कोशिश करने लगे थे.

वैसे तंग बस्ती के बच्चों के लिए काम करते हुए बकुलेश का अकेलापन काफी हद तक दूर हो जाता था. निर्धन बच्चों के लिए आयोजित होने वाले व्यक्तित्व विकास शिविरों के चलते बच्चों के बीच पता ही नहीं चलता था समय कब और कैसे गुजर गया. वसुधा भी बकुलेशजी की खुशी में अपनी खुशी तलाश लेती.

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3
हेमा माझी की उड़ान

शिविर में आज बच्चों का उत्साह देखते ही बनता था। व्यक्तित्व विकास शिविर का  आखिरी दिन जो था। आनन्द बाबू शिविर की रूपरेखा ऐसी बनाते थे कि शुभारंभ और समापन के दिन रविवार पड़े, ताकि रुचि रखने वाले बैंककर्मी साथी और बच्चों के पालक भी वहां आकर बच्चों का हौसला बढ़ा सकें। होता भी यही था शिविरार्थियों के अलावा बड़ी संख्या में लोग उस दिन आ जुटते थे।

देखते ही देखते पच्चीस बरस बीत गए थे. कैमरों का स्थान मोबाइल फोन ने ले लिया था. तस्वीरें श्वेत श्याम से इन्द्रधनुषी ली जाने लगीं थीं. तंगबस्ती के बच्चों के लिए भी अब यह अस्सीवाँ शिविर संपन्न हो रहा था. लगातार इन शिविरों का निर्बाध आयोजन संस्था के लिए बहुत गौरव की बात थी ही, सामाजिक क्षेत्रों में भी इसकी खूब प्रशंसा और चर्चा होने लगी थी. अनेक सामाजिक कार्यकर्ता खुद आगे बढकर इससे जुड़कर कार्य करना चाहते थे. कुछ लोग तो यह कयास तक लगाने लगे थे कि हो न हो इस कार्य के लिए आनंद बाबू पद्मश्री जैसा राष्ट्रीय सम्मान जरूर मिलेगा. आनन्द बाबू का समर्पण और निष्ठा ही कुछ ऐसी होती थी गरीब बच्चों के लिए कार्य करते हुए.

तंगबस्ती के निर्धन परिवारों के बच्चों को प्रशिक्षित करके उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए यह कार्य शुरू तो तब ही हो गया था जब ‘मालवा बैंक’ का विलय ‘भारतीय बैंक’ में नहीं हुआ था. तब ‘मालवा बैंक’ के प्रबंधन के अलावा बैंककर्मियों की यूनियनें भी अपने साथियों को साथ लेकर जन कल्याण के कार्यों में लगी रहती थी. मात्र कर्मचारी हितों के लिए काम करना ही युनियन का उद्देश्य नहीं था. आनंद बाबू की सोच कुछ इससे आगे बढकर थी. साहित्य, संस्कृति, कला और जन आन्दोलनों को लेकर वे काफी दूरदृष्टि वाले विचारक नेता थे. आर्थिक उदारीकरण और वैश्वीकरण के बाद नई नीतियों के कारण देश में वातावरण बदला था. बैंकिंग उद्योग और समाज के प्रति नई चुनौतियों से निपटने में संघर्ष के नए तरीकों के प्रति उनकी प्रखर दृष्टि और चिंताएं गेट मीटिंगों के तेजस्वी भाषणों और विश्लेषणात्मक टिप्पणियों में झलकती थीं. राष्ट्रीयकृत बैंकों के निजीकरण और विलय के विरोध में उनकी स्पष्ट समाजवादी सोच थी. उनका मानना था कि इससे बड़े कारपोरेट और पूंजीपतियों की लूट का रास्ता आसान हो जाएगा.   

आनंद बाबू की सांगठनिक क्षमता अतुलनीय थी.  बैंककर्मियों को उनकी  रूचियों के अनुसार प्रोत्साहित कर वैचारिक रूप से संपन्न और समर्थ बनाने की कोशिश करते थे. आम लोगों तक में सार्थक और जनहितकारी दृष्टि विकसित करने के उद्देश्य से कई अपने साथियों के छोटे-छोटे समूह बनाकर ठोस और गुणवत्तापूर्ण कार्य करना आनंद बाबू की ख़ास नवोन्मेष कार्य शैली हुआ करती थी. साहित्य, ड्रामा, म्यूजिक के साथ साथ समाजसेवा के लिए भी उन्होंने विशिष्ठ प्रकोष्ठ बनाकर रुचिवान साथियों को जोड़ा हुआ था.

गरीब परिवारों के लगभग तीन सौ बच्चों के चेहरों पर उत्साह देखते ही बनता था. एक दिन पहले ही लोक गायक पद्मश्री प्रहलाद सिंह टिपानिया बच्चों के बीच आये थे. यह देखकर कि  महानगर की तंग और झुग्गी बस्तियों के बच्चे इतनी बड़ी संख्या में शिविर में हिस्सा ले रहे हैं, अचरज से भर गए थे. शिविर में उनके लिए एक घंटे का समय ही रखा गया था लेकिन टिपानिया जी का मन वहां ऐसा रमा कि अंत तक बच्चों के बीच बने रहे. कबीर की साखियाँ गाते हुए उनके अर्थ भी बच्चों को समझाए. बच्चे ही क्या शिविर में आये अन्य लोग भी भाव विभोर हो उठे जब उन्होंने अपना बेहद लोकप्रिय गीत सुनाना शुरू किया.. ‘गाडी ज़रा हलके-हलके हांकों मेरे राम गाडी वाले...’

शिविर की ख़ास बात यह थी कि प्रत्येक दिन के अंतिम सत्र में अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ और गुणीजन बच्चों से बातचीत करते थे. कला, साहित्य और अन्य क्षेत्रों की सफल प्रतिभाओं से भी इन बच्चों से साक्षात्कार करवाकर सम्बंधित विषय की जानकारी दी जाती थी. आज शिविर के अंतिम दिन वरिष्ठ शिक्षाविद माधव जी के हाथों बच्चों को प्रमाण-पत्रों और शिविर की  गतिविधियों में श्रेष्ठता के लिए पुरस्कार भी दिए जाने थे.

मंदबुद्धि बच्चों का संगीत से इलाज करने के लिए संकल्पित  संगीत और पर्यावरण प्रेमी विजय भाई सबसे पहले पर्यावरण गीत का अभ्यास कराते...फिर योगाचार्य चैतन्य जी एक घंटे के सत्र में योगासन, हास्यासन और ध्यान क्रियाएं कराते. यह भी बड़ा दिलचस्प होता था कि जब वे बच्चों को आँखें बंद करने के लिए कहते और यात्रा वृतांत सुनाते हुए ‘योग निद्रा’ में ले जाते तो कुछ की सचमुच आँख लग जाती..बच्चों में बड़ा कुतूहल रहता कि देखें आज कौन बच्चा सचमुच सो जाने वाला है.. 
उसके बाद भाषण कला, चित्रकला, क्राफ्ट, कम्प्युटर, अंगरेजी भाषा, पर्यावरण, विज्ञान के प्रयोग, अंधविश्वास निवारण, अभिनय कला आदि जैसे कई विषयों की जानकारी आमंत्रित विशेषज्ञ प्रदान करते. शिविर के पहले दिन बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण भी होता... आनंद बाबू, बकुलेशजी जैसे लोगों के लिए शिविर में शामिल बच्चे की ऊर्जा का नया स्रोत बन गए थे.
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संगीत और योग की कक्षा के बाद दस मिनट का ब्रेक समाप्त हुआ. बकुलेश ने बाल गोष्ठी की प्रारम्भ कर दी. हालांकि शिविर के प्रत्येक सत्र में सूत्रधार की भूमिका बकुलेश के जिम्मे रहती थी लेकिन बालगोष्ठी, रचनात्मक लेखन, हिंदी भाषा के प्रयोग, वर्तनी आदि की समस्याओं पर अलग से विशेष सत्र भी बकुलेश के लिए निर्धारित थे। समापन वाले दिन 'बाल गोष्ठी' का आयोजन होता जिसमें बच्चे विभिन्न कलाओं में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते।
आज भी यही हो रहा था. एक के बाद एक बालक या बालिका मंच पर आकर अपनी प्रस्तुति दे रहे थे.
‘मेरा नाम राजकुमार है.. मैं कक्षा पांचवीं में पढ़ता हूँ..मैं आपको पर्यावरण गीत सुनाना चाहता हूँ..’
राजकुमार के साथ उसकी छोटी बहन आरती भी रोज शिविर में आती है. पिताजी सुबह अपना ठेला लेकर हम्माली के लिए मंडी चले जाते हैं. माँ भी सभ्रांत घरों में घरेलू कामकाज के लिए निकल जाती है. अब तक बुआ घर पर होती थी. इस वर्ष वह भी ससुराल चली गई. दो वर्षीय आरती को घर छोड़ा नहीं जा सकता तो उसे भी यहाँ राजकुमार के साथ आना जरूरी हो जाता है.. आरती जैसे छोटे बच्चों के लिए एक छोटे कक्ष में अलग से शिविर चलता है जिसमें घोडपकर मेडम और पुष्पाजी कहानियां सुनाती हैं, चित्रकारी करवाती हैं ताकि बड़े बच्चों की कक्षा में कोई खलल न पड़े और अव्यवस्था न फ़ैल सके. यद्यपि समापन वाले दिन बालगोष्ठी में छोटे बड़े सब एक साथ बैठते थे. 
राजकुमार ने सुनाना प्रारम्भ किया-

‘मानव खुशहाली के गीत गाता गाता है
खुशहाली का हरियाली से नाता है
आओ साथी पेड़ लगाएं
धरती को सुन्दर बनाएं
आसमान का धरती माँ से नाता है..!’

जैसे ही गीत ख़त्म हुआ. बच्चों की तालियों से हाल गूँज उठा. अनेक बच्चे आए, किसी ने कविता सुनाई, किसी ने कहानी. किसी ने पहेलियाँ बुझाईं तो कोई फ़िल्मी गीत सुनाकर खुश हुआ.
बेहद दुबली पतली लड़की बहुत झिझकते हुए माइक तक आई... मेरा नाम मीनल है.. मैं सातवीं कक्षा में पढ़ती हूँ, मैं आपको एक गाना सुना रही हूँ..
‘माँ मुझे अपने आँचल में छुपा ले...सीने से लगाले...
मीनल की आवाज बहुत मीठी थी..सारे बच्चे मन्त्र मुग्ध उसका गाना सुन रहे थे.. वह सही सुर में गा रही थी.... ‘कि और मेरा कोई नहीं...!’ अचानक गाते गाते शीतल का कंठ भर आया..
आँखें सजल हो गईं.. उसने अपनी नजरें झुका लीं... अब आगे गाना उसके लिए असंभव हो रहा था...
बकुलेश ने उसके कंधे पर हाथ रख कर ढाढस बंधाया.. थोड़ा पानी पीकर उसने फिर से गाना शुरू किया..उसके शब्द टूट रहे थे..’छोटी सी भूल को भूल जाओ माता...अपनो से ऐसे कभी रूठा नहीं जाता...
जैसे तैसे उसने थोड़ा रुक कर गीत को समाप्त किया. भीगी आँखों के साथ करूण मुकुराहट लिए लौटकर जब तक वह अपने स्थान पर बैठ नहीं गयी तब तक तालियाँ बजती रहीं..सुबकती मीनल आँखें पोंछती हुई यकायक खिलखिला पडी... तालियाँ और तेज हो गईं.....
अफसाना ने बाद में बताया.. मीनल की माँ अब इस संसार में नहीं है..पिछले वर्ष एक निर्माणाधीन बिल्डिंग की छत गिरने से माँ और मौसी दोनों दब कर मर गईं थीं.  

बकुलेश को लगा मीनल शिविर से निकलने वाली एक और भविष्य की ‘हेमा माझी’ होगी. शिविरों की सार्थकता भी यही है कि कमजोर और वंचित परिवारों के बच्चे भी ऊंची उड़ान भर के  आसमान छू सकें..
पायलट पंकज चौरसिया की भी ऐसी ही कहानी है जिसने शिविर में दरी पर बैठकर भारती मेम से कागज़ का हवाई जहाज बनाना सीखा..अब उसका विमान चेन्नई से चायना तक की उड़ान भरता है. विजय सर की क्लास में सरगम के सात सुरों के पंख लगाकर ‘हेमा माझी’ संगीत व्योम में नई ऊंचाइयां छूती जा रही है..  संगीत प्रेमियों के दिल जीत लिए हैं हेमा ने... 
आज लोकप्रिय सिंगर हेमा माझी का शिविर में बेसब्री से इंतज़ार हो रहा है...



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4
सत्यम् शिवम् सुन्दरम्

मुख्य अतिथि माधव जी के आने में अभी थोड़ी देर थी. इस बीच बच्चे अपनी प्रस्तुतियां दे रहे थे. गीत, कविता, कहानियों के बाद अब योगाचार्य चैतन्य जी के निर्देशन में कुछ बच्चे योग मुद्राएं बना रहे थे.
प्रत्येक आसन के बारे में योगाचार्य उसके लाभ भी बता रहे थे. मंच के दूसरे किनारे पर माइक के सामने खडी एक बालिका प्रत्येक क्रिया के साथ-साथ संस्कृत में सम्बंधित क्रिया का बीज मन्त्र उच्चारित करती जा रही थी.
‘प्रणामासन’ योगाचार्यजी के कहते ही बच्चों ने नमस्कार की मुद्रा बनाई. ‘इस आसन से एकाग्रता, विचार शून्यता और मानसिक स्थिरता मिलती है.’ आचार्य ने समझाया. माइक पर बालिका ने उच्चारा-‘ॐ हां मित्राय नमः .’

इसके बाद क्रमशः हस्त उत्तासन, पाद हस्तासन,एक पाद प्रसासन, भुजन्गासन, पर्वतासन, आदि करवाते हुए आचार्य उनके लाभ बताते गए. बच्चों ने शिविर में पूरे सात दिनों तक अभ्यास किया था इसलिए वे कुशलता से प्रदर्शित कर रहे थे. अन्य बच्चे तालियाँ बजाकर उन्हें प्रोत्साहित करने में कोई कसर बाकी नहीं रख रहे थे.

बालिका भी बीज मन्त्रों का बहुत मीठे स्वर में उच्चारण करती जा रही थी- ॐ रवये नमः, ॐ हूं सूर्याय नमः,..भानवे नमः, खगाय नमः..पूष्णे नमः...हिरन्यगर्भाय नमः...भास्कराय नमः....!!’
अंत में योगाचार्यजी ने प्रदर्शन करने वाले सभी बच्चों का परिचय कराया. इन्ही सारे बच्चों को माधवजी के हाथों आज पुरस्कृत भी होना था. बीज मन्त्रों को कंठस्थ कर मंत्रोच्चारण करने वाली बालिका की ओर तर्जनी करते हुए योगाचार्य ने कहा- ये है ‘अफसाना शाकिर’..हमारी योग कक्षा की सबसे होनहार बालिका.
बच्चों ने तालियों की गडगड़ाहट और तेज कर दी...

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एकाएक बच्चों में हलचल तेज हो गयी. हेमा माझी के प्रवेश करते ही बच्चे जोश में हल्ला करने लगे..कुछ ने तो सीटियाँ तक बजा दीं..किसी तरह संचालन कर रहे बकुलेश ने उन्हें ऐसा करने से रोका. टीवी पर ऐसे लाइव कंसर्ट में होने वाले हो हल्ले को देखकर शायद वे इसे कार्यक्रम की आवश्यकता भी मानने लग गए थे..हेमा भी उस वक्त उनके लिए किसी स्टार से कम नहीं थी.. अपने जैसे बच्चों में से ही निकल कर उसने सफलता की उड़ान भरी थी... इसी बीच मुख्य अतिथि माधवजी को भी ससम्मान आनंद बाबू मंच पर अपने स्थान पर बैठा चुके थे..

योजनानुसार हेमा को कुछ गीत अतिथियों के समक्ष प्रस्तुत करना थे.. बच्चे हेमा का गाना  सुनने के लिए उतावले हो रहे थे. बकुलेश ने आनंद बाबू से माधव जी का पुष्पहार से स्वागत करवाया और घोषणा की- ‘अब हम सबकी प्रिय हेमा माझी अपनी प्रस्तुति देंगी.’
तालियों की गूँज थमने के बाद प्री रिकार्डेड करायको संगीत के साथ हेमा ने पहला गीत सुनाना शुरू किया..
‘सत्यम शिवम् सुन्दरम....’
बहुत मीठे स्वर में गा रही थी हेमा, जैसे स्वर कोकिला लताजी खुद आ गईं हों आज बच्चों के बीच में.. मन्त्र मुग्ध बच्चों के चेहरे खिलते गए..
अगला गीत ‘मुझसे नाराज है जिन्दगी..’ को सुनते हुए हेमा की कड़ी मेहनत को स्पष्ट महसूस कर रहे थे सब लोग.
‘वंस मोर..वंस मोर..’ के शोर के बीच एक दो गीत और सुनाने पड़े हेमा को. शोरगुल बढ़ता जा रहा था.. मुख्य अतिथि का उद्बोधन और पुरस्कार वितरण इस हालत में बिलकुल संभव नहीं था. बकुलेश ने शिविर में पांच मिनट का ब्रेक कर दिया.
ब्रेक में बच्चे बाहर जाने के बजाए अपनी नोट बुक में हेमा दीदी के ऑटो ग्राफ लेने के लिए एक दूसरों पर चढ़े जा रहे थे..


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5
बालसभा

बच्चों की प्रतिभा के प्रदर्शन और अभिव्यक्ति की झिझक मिटाने के लिए शिविर में बाल गोष्ठी  का आयोजन वस्तुतः बकुलेश के दिमाग की ही उपज थी. प्रत्येक शिविर के आख़िरी दिन इसका होना लगभग तय सा ही हो गया था. दरअसल स्कूलों में भी पहले ऐसी रचनात्मक गतिविधियों को खूब बढ़ावा दिया जाता था. बकुलेश जब प्राथमिक कक्षा का विद्यार्थी था तब तो इसका बड़ा महत्त्व हुआ करता था. 

बकुलेशजी को याद आ रहा था अपना पहला स्कूल ‘अत्रे भवन’ प्राथमिक पाठशाला . स्कूल का यह भवन अब चालीस-पचास बरस बाद किस हालत में होगा पता नहीं. भवन को अब गोबर और पीली मिट्टी से तो शायद नहीं लीपा जाता होगा.  तब तो टाटपट्टी बिछाने पर धूल उडती थी. ज्ञान गंगा में नहाने से पहले बच्चे धूल गंगा में स्नान कर लेते थे.

सरकारी स्कूलों में इस जमाने में कुछ गरीब बस्ती के बच्चों को ही जाते देखा जाता है ,जबकि उस समय शाला में हर वर्ग और हर स्तर के परिवार के बच्चे साथ-साथ बैठकर पढा करते थे. सेठ धर्मदास का सुपुत्र टाट पट्टी पर बैठकर पढ़ता था, तो ठेलागाड़ी चलानेवाले निसार का बेटा अब्दुल भी वहीं साथ में बैठता था. पुरोहित वृंदावनलाल का बेटा वंशी भी उसी स्कूल में पढ़ता था. बकुलेश भी भी नंगे पैर, कपडे का बना बस्ता लटकाए ,स्कूल की ओर दौड पडता था.

स्कूल प्रवेश के समय पिताजी के  जोरदार तमाचा खाने के बाद कभी स्कूल न जाने का विचार उसके मन में नहीं आया. बस्ते का बोझ स्कूल तक दौड़ जाने में कभी बाधक नहीं बना. उस समय बहुत सारी पुस्तकें कंधे पर लादकर भी नहीं ले जाना पडती थीं.  उसका बस्ता माँ द्वारा हर वर्ष नया सिल कर दिया जाता था. पिताजी का पुराना पैंट पूरी तरह घिसकर जब रिटायर्ड हो जाता तब उसकी तीन चीजें बनती थी. बाजार से सब्जियां, सामान वगैरह लाने के लिए एक थैला, दादी माँ के लिए ठण्ड में पहनने के लिए पूरी आस्तिनों वाला पोलका और बकुलेश के लिए एक बस्ता, जिसे पाकर वह बहुत खुश हो जाता था.

जीवन में वह बहुत सादगी का दौर था. हेडमास्टर रामदुलारे त्रिपाठी खादी धारण करते थे और अनुशासन के लिए एक ‘रूल’ डंडा हमेशा उनके हाथों में होता था. एंटीसेप्टिक जैविक द्रव से बकुलेश का पहला परिचय इन्ही गुरूजी ने करवाया था. स्कूल के छोटे से प्रांगण में नंगे पैर दौड़ते हुए तलुवे में जब काँच चुभ गया तो खून की तेज धारा बह निकली. रोने की आवाज सुनकर त्रिपाठीजी आये और कोने में ले गए, बोले- ‘निकर ऊंची करो और चोट पर पेशाब करो!..’ रूल भी सामने था..क्या करता वह..आदेश का पालन किया... बहता खून भी रुक गया...! शायद यहीं से बकुलेश में विज्ञान के प्रति किसी लगाव ने जन्म लिया और रसायन विज्ञान में मास्टर डिग्री लेने के बाद.. विडम्बना देखिये नियति ने बैंक में बाबू बनवा दिया.. एक संभावित वैज्ञानिक खाता-बही में आंकड़ों की डेबिट-क्रेडिट करने लगा. 

हर शनिवार को स्कूल में 'बालसभा' होती थी. बालसभा होने के पहले साप्ताहिक टेस्ट होता था. जो लडके फेल हो जाते थे, उन्हें उस दिन कक्षा की लिपाई करनी पड़ती थी और जो पास हो जाते थे वे 'बालसभा' में कवितायें, कहानियां  और चुटकुलों का आनंद उठाते थे. अब्दुल और वंशी को कभी बालसभा में रूचि नहीं रही, वे अक्सर कक्षा की लिपाई ही करते थे. 'बालसभा' समाप्त होती तो बच्चे रविवार की छुट्टी के आकर्षण में दौड़ते हुए स्कूल से बाहर निकलते. नीली आँखों वाला बद्रीप्रसाद पूछता-'कल क्या है ?' बकुलेश खुशी से चहकता 'कल छुट्टी है.' तब बद्रीप्रसाद तुक मिलाते हुए चिढाता-'तेरी दादी बुड्ढी है.' उसे बहुत दुःख होता. घर पहुंचकर रोता और दादी को यह बात बताता तो वे मुस्करा देतीं. उनके कुल तीन दाँत थे, वे भी अपनी पकड़ छोड़ बैठे थे. वे मुस्करातीं तो उनमे से एक दाँत लटककर और बाहर निकल आता. वे इस रूप में और भी ममतामयी लगतीं थीं. वे कहतीं-'बद्री ठीक ही तो कहता है, मैं बुढिया ही तो हूँ..' बकुलेश उनकी गोद में सर रखकर सब कुछ भूल जाता.

कक्षा में बद्रीप्रसाद और बकुलेश पास-पास ही बैठते थे. बद्री उससे ढाई गुना अधिक मोटा था. बद्री के पिताजी शहर के जाने-माने पहलवान थे. उनके साथ बद्री भी कसरत वगैरह किया करता था. बद्री की नीली आँखें उसके कसरती बदन में चार चाँद लगाती थीं. बद्री उसका बॉडी गार्ड जैसा मित्र था. हमेशा दूसरे सहपाठियों से उसकी रक्षा किया करता था. वह बकुलेश का सबसे अच्छा मित्र था. बोले तो ‘बेस्ट फ्रेंड!’  
एक छोटी सी घटना ने उनकी मित्रता पर पानी फेर दिया. मास्टरजी ने कुछ शब्दार्थ याद करके लाने को कहा था. हरेक बच्चे से वे क्रमवार अर्थ पूछते जा रहे थे. जो बच्चा गलत जवाब देता, उसे सजा मिलती. उसे पास बैठे सहपाठी का घूँसा खाना पडता था. हालांकि मास्टरजी इसे धौल ज़माना ही कहते थे लेकिन बच्चे पड़ोसी की पिटाई बड़े जोरदार ढंग से ही किया करते थे. बल्कि हरेक को इंतज़ार रहता था कि कब पड़ोसी गलती करे. बकुलेश की बारी आई तो मास्टर जी ने पूछा- 'बताओ बकुलेश 'शक्तिशाली' यानी क्या?' और वह बगलें झांकने लगा. पास में ही बद्री पहलवान बैठे थे. इशारा होते ही लगा कि बकुलेश की पीठ से कोई वजनदार चीज टकराई, और पेट में जैसे कोई गड्ढा सा गहराता गया.   आँखों के सामने सितारे उभर आए. वह गिर पढ़ा. गुरूजी स्वयं पास आए, बद्री खुद दौडकर पानी लाया और छींटे मारे, पानी पिलाया गया. बकुलेश थोड़ी देर में ठीक हो गया. इस घटना के बाद मास्टर जी की उस खौफनाक पिटाई परम्परा का भी अंत हो गया. बाद में बकुलेश ने बद्रीप्रसाद से सदा के लिए बोलचाल बंद कर दी. फिर कभी वे एक दूसरे से नहीं बोले. बकुलेश उससे दूर इस्माइल के पास बैठने लग गया.

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अभी कुछ दिनों पहले बकुलेशजी का  अपनी भतीजी की शादी के अवसर पर बचपन के अपने कस्बे में जाना हुआ. मेहमानों को बिदाई में उपहार स्वरूप स्टील की प्लेंटे देने की योजना थी. 'भैया ज़रा स्टील की प्लेंटे दिखाना.' उन्होंने दूकानदार से कहा. 'जरूर देखिए साहब.' दुकानदार ने पलटकर कहा.
दोनों की नजरें मिलीं. शक्लें थोड़ी जानी-पहचानी सी लग रही थीं. बरबस बकुलेशजी का हाथ पीठ की तरफ गया. दुकानदार ने पहचान लिया था.-'तुम बकुलेश ही हो ना.' वह काउंटर छोडकर बाहर आ गया.
बकुलेशजी के गले में बद्रीप्रसाद की बाहें हार बनकर पुराने मित्र का स्वागत कर रहीं थीं.  जुल्फहीन दुकानदार की नीली आँखों में एक वृद्ध मित्र को बचपन का प्यारा नन्हा दोस्त  बद्रीप्रसाद स्पष्ट दिखाई दे रहा था.

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6
बचपन की बरसात


मन का क्या है। पंख लगे होते हैं उसके। उड़ते उड़ते जा बैठा चालीस-पचास  बरस पहले के अपने घर की छत के कंगूरे पर। शिविर के बच्चों के प्रदर्शन और उनकी प्रतिभा  को याद करते हुए बकुलेशजी को अपना बचपन लगातार याद आ रहा था.

दो मंजिले मकान की छत पर लकड़ी की बल्लियां लगी थीं जिन्हें जुपीए कहते थे, जिसके ऊपर मिटटी की तह बिछाई गई थी। फिर थोडे ऊपर टीन की चद्दरें ठोंकी हुई थीं।
नीचे याने ग्राउंड फ्लोर पर अगला कमरा बैठक खाना और उसके बाद एक अँधेरा कोठार जिसमे केवल एक दरवाजा। कोई खिड़की नहीं। हवा का कोई आवागमन नहीं। इसमें गुड़ समेत खजाना सा भरा होता था। कुछ बोतलों में गार(ओले) का पानी ऐसे सहेजा हुआ था जैसे अमृत रखा हो। मुहल्ले में यदा कदा चम्मच भर कोई मांगने आ जाता था। बर्नियों में बहुत ख़ास अचार रखा, कोठार को महकाता रहता था।
गर्मियों में कोठार की ज़रा सी जगह में दादी बोरी बिछा कर दोपहर की नींद निकालती।  वहां उनके बगल में जैसे शिमला बसी थी।
और मई जून की दोपहर में बैठक खाने के दरवाजे की दरार से धधकती सड़क से कुल्फी के ठेले की चमक और परछाइयों का प्रवेश चलचित्र की रौशनी सा दीवारों पर गुजरता था। कोई कूलर या पंखा नहीं था।
आज कांक्रीट के स्वर्ग में बैठे बकुलेशजी के सामने अपना बचपन किसी पुराने चलचित्र की तरह दृश्य दर दृश्य गुजरता जा रहा है !! वह कुमार गन्धर्व की नगरी में संगीत सम्राट रज्जब अली खां मार्ग का एक मकान भर नहीं था। सभी दुखों का समाधान करता एक घर था उसका.

इसी घर में माँ रात को छत पर सितारों की छाँव में लेटे लेटे अपने युवाकाल का एक किस्सा सुनाया करती थी अक्सर.
‘नाटक ‘विक्रम का न्याय' का मंचन किया जा रहा था। दो स्त्रियों में विवाद था कि बच्चे की असली माँ कौन है और बच्चा किसे सौपा जाए। महान न्यायाधीश विक्रमादित्य ने अपने सिपाहियों को आदेश दिया कि बच्चे को दो टुकड़ों में बांटकर दोनो स्त्रियों को एक एक हिस्सा सौंप दिया जाए।

इसके पहले कि सिपाही आगे बढ़ते, दर्शकों मे से एक तीसरी स्त्री दौडती हुई मंच पर चढ गई और बच्चे को छीनकर नाट्‌यगृह से बाहर चली गई। नाटक मे भी अपने बच्चे का अहित न देख सकने वाली वह तीसरी स्त्री उस बच्चे की असली माँ थी।‘

लघुकथा की वह तीसरी स्त्री और कोई नहीं बकुलेश की असली माँ ही थी. जब वह छह सात माह का ही रहा होंगा, युवा पिता के मित्रों ने कस्बे में नाटक का आयोजन किया था. छोटे बच्चे की दरकार थी, कोई भी व्यक्ति अपना शिशु नाटक के लिए देने के लिए तैयार नहीं थी. माँ ने हिम्मत की थी. नन्हे बकुलेश को नाट्य मंडली को सौंप दिया गया. जो नाटक खेला गया उसमें असली माँ बच्चे को नाटक के बीच से छीनकर तो नहीं भागी थी..लेकिन बड़े होकर बेटे बकुलेश ने जब कहानी लिखी तो अपनी माँ की उस वक्त की मनोदशा का चित्रण करने का प्रयास जरूर किया था. बचपन की स्मृतियों पर बकुलेश की यह पहली सृजनात्मक पहल थी. जो बाद में हिन्दी दिवस पर बैंक द्वारा आयोजित प्रतियोगिता में पहले पुरस्कार हेतु चुनी गयी थी.                      


बचपन में वह बहुत डरपोक किस्म का प्राणी था. कोई  कहता कि  ‘देखो पुलिस आई!’ तो वह  घर में छुप जाया करता था. स्कूल में हैजे आदि के टीके लगाने के लिए स्वास्थ्यकर्मी आते तो स्कूल से भाग जाया करता. आसपास या घर में किसी की मौत हो जाती तो भी वह सामने नहीं आता था. या उसे पड़ोसी के यहाँ भेज दिया जाता था. सच तो यह है कि किसी की शव-यात्रा में जाने का अनुभव भी उसने संभवतः नौकरी करने के बाद ही लिया. वैसे नौकरी उसकी विज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएशन करने के बाद ‘मालवा बैंक’ में साढ़े बीस वर्ष की आयु में ही लग गयी थी. 

जो बोरन डूबन डरा रहा किनारे बैठ । यह उक्ति बहुत हद तक बकुलेश पर लागू होती थी. जब भी दूसरों को नदियों, तालाबों में नहाते तैरते देखता उसे मोदी जी की बावड़ी याद आने लगती थी।

अनुपम मिश्र की ख्यात पुस्तक 'आज भी खरे हैं तालाब' में चित्रकार दिलीप चिंचालकर के रेखांकनों में जिन बावड़ियों और चोपडों के चित्र हैं उसी खूबसूरती का नमूना थी मोदी जी की बावड़ी । थोड़ी ही दूर पर एक शानदार वास्तुशिल्प वाला चोपड़ा भी था उनका। पास ही खेत था और थोड़ा आगे नगर का श्मशान।
बकुलेश का डर दो तरह का था। एक तो बावड़ी और चोपड़ा श्मशान स्थल के बिलकुल निकट थे। दूसरे बड़े दादा जी परिवार के बच्चों को सुबह सुबह अपने मित्र मोदी जी की बावड़ी में तैरना सिखाने ले जाते थे।  गर्मियों की छुट्टियों में रिटायर्ड कलेक्टर साहब का अनुशासन परिवार के  बच्चों पर खूब चलता था। बकुलेश थोडा पढ़ाकू किस्म का बच्चा था और परियों से लेकर भूत प्रेत तक की सभी कहानियां पढ़ डालता था। वह नवाब बनना चाहता था ,परीक्षाओं में अव्वल आता था, इसलिए ज्यादा खेलकूद कर खराब नहीं बनना चाहता था। उन दिनों प्रचलित भी यही था कि 'पढोगे लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे कूदोगे बनोगे खराब'

 दादा जी बच्चों को घेर घारकर मोदी जी की बावड़ी पर ले जाते सुबह सुबह। पायजामों के सिरों को बाँध देते और हवा में फूले हुए इन सुरक्षा गुब्बारों सहित बावड़ी के पानी में हाथ-पैर मारने को फैंक देते।
हुआ यह कि राजा बाबू किस्म का लाडला बकुलेश ' जीजी जीजी'  कहकर घर भाग आता और माँ के आँचल और दुलार में गुम हो जाता. हुआ यह भी कि कलेक्टर साहब उसके अलावा सबको तैराकी सिखा गए।
जो उस वक्त तैरना सीख गए वे गोते लगा रहे हैं आज भी। बकुलेश ने तो नौकरी लगने के बाद  पर्यटन अवकाश सुविधा (एल एफ सी) के अंतर्गत हरिद्वार तक में गंगा का पानी लोटे में भरकर सिर पर उंढेल लिया था।  अब हाल यह है कि सिंहस्थ जैसे महा आयोजनों के वक्त दोस्तों की सेल्फियाँ और साधुओं के स्नान की तस्वीरें देखकर ही खुश होता रहता है। पानी में उतरने में अब भी उसे डर लगता है। किनारे पर बैठा रह गया है। कितना अच्छा होता उस वक्त डरता नहीं। तैर जाता ये भव सागर।  

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कोई सात-आठ साल का मासूम बालक ही था बकुलेश । दादाजी के निधन के कारण घर में शोक चल रहा था। उन दिनों रेडियो मनोरंजन के अलावा विश्वस्त समाचारों का बहुत सुलभ और लोकप्रिय माध्यम हुआ करता था। मगर वह घर में शोक के चलते खामोश था। लेकिन 27 मई को जैसे ही पंडित नेहरू के निधन का समाचार आया। पूरे देश में दुःख की लहर फ़ैल गई। राष्ट्रीय शोक की घोषणा हुई।
उसी दिन घर का खामोश रेडियो फिर रो पड़ा। बापू के प्रिय भजन गा रहीं थी मशहूर आवाजें और सारंगियां रो रहीं थीं। नेहरू हीरो थे सबके । बच्चे तक अपने प्रिय चाचा नेहरू के बारे में, उनकी अंतिम यात्रा और अंतिम संस्कार के सीधे प्रसारण को भरे हृदय से सुन रहे थे।

सच तो यह था की सात साल के बच्चे की नजर के सामने कोई राजनैतिक चकाचौध नहीं थी। प्रधानमंत्री याने देश का सच्चा हितैषी और लोक प्रधान के रूप में दिलों दिमाग में स्थापित एक पालक। परिवार में एक दादा का निधन हुआ था और देश ने बापू के बाद जैसे अपना बड़ा भाई खो दिया था।

कोरा कागज था बकुलेश का मन। उस दौर में बच्चों के अलावा भी ज्यादातर लोगों के मन साफ़ हुआ करते थे. बरसातें भी जोरदार होती थीं , कीचड़ भी होता था और दाग भी प्राकृतिक होते थे..प्रेम और सौहार्द से सने होते थे...जीवन और चरित्र पर कीचड उछालने की परम्पराएं तब आज की तरह आम नहीं थीं...

मौसम आने पर अक्सर बारिश लगातार सप्ताह-पखवाडे चलती रहती थी। कई-कई दिनों तक सूरज के दीदार नही हो पाते थे। लम्बे इंतजार के बाद धूप छिटकने के बाद क्षेत्र के अखबारों का पहले पृष्ठ पर ही शीर्षक बन जाता था कि एक पखवाडे बाद हुए सूर्य देवता के दर्शन!’  

पर्यावरण का संतुलन अब इस तरह गडबडा गया है कि नए बच्चों को तो शायद याद ही नही है कि कभी लम्बे समय तक बादल छाए भी रहे होंगे। उन्होने ज्यादातर खंड वर्षा को ही देखा है। अब तो एक साथ झमाझम बरसते हुए वर्षा औसत से अधिक का आंकडा पर कर लेती है। अब बादल फटते हैं..बारिश में संगीत कम और विस्फोट ज्यादा होता है..लगता है मौसमों ने भी समय से संगति करना सीख लिया है...

बिल्कुल अभी अभी की बात लगती है जब तेज बरसात के बाद  मुहल्ले की गली से पानी ऐसे बहता था जैसे कोई छोटी-मोटी नदी बह रही हो। उस नदी के बहने का मोहल्ले के बच्चे बहुत बेसब्री इंतजार किया करते थे। उसका बडा दिलचस्प कारण भी हुआ करता था। गली के ठीक आगे चौराहा था और उसके आगे पहाडी का ढलान। चौराहे पर अपनी बैलगाडिय़ों से गाँव से आकर किसान ककडियों और भुट्टों की दुकान लगाते थे। अचानक जब तेज बरसात होती और पहाडी का पानी बाजार में उतरताकिसानों के ककडी-भुट्टे गली में बहने लगते। कोशिश के बाद भी कई भुट्टों-ककडियों  को बचाने में वे नाकाम ही होते थे। मुहल्ले के बच्चों के लिए नदी बन गई गली जैसे भुट्टों और ककडियों की सौगात लेकर आती। सब अपने जोश और आनन्द की बंसी बजाते भुट्टों-ककडियों के शिकार में जुट जाते थे।

गली के एक ओर कायस्थों के घर थे और सामनेवाली पट्टी में ज्यादातर मुस्लिम परिवार रहते थे। दोनो पट्टियों के बच्चे बहती गली का भरपूर मजा लिया करते थे। बकुलेश के घर के सामनेवाले इस्माइल भाई की अम्मा जिन्हे सब आपा कहा करते थे ऐसी ही बहती नदी से गुजर कर पतंग बनाना छोडकर उस रात बकुलेश के घर आईं थीं। उसकी चाची को तेज दर्द हो रहा था, पूरे नौ माह चल रहे थे। जैसे तैसे बकुलेश की माँ और आपा उन्हे जच्चाखाने ले गए थे। जब तक चाची अस्पताल रहींआपा भरी बरसात में चाची और नवजात की खिदमत में जुटीं रहीं। घर के बच्चे उनकी बकरियों और पतंगों को बरसात की बौछारों से बचाते रहे। जब वे नन्हे चचेरे भाई को गोद में उठाए जाफर भाई के तांगे से घर लौटी तब बरसात तो उस वक्त थम चुकी थी लेकिन खुशी की कुछ नम बूँदों ने आपा सहित सब की आँखों में डेरा ही डाल लिया था।

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लम्बी लम्बी चलनेवाली बारिश की तरह लम्बी ही चलती थी कानडकर बुआ की कथा। दत्तमन्दिर में पूरे चौमासा में कुछ न कुछ चला ही करता था। पन्द्रह दिन तक कानडकर बुआ रोज सबेरे कथा सुनाते थे। संगीतमय कथा-कथन और प्रवचन के बाद अंत में देश प्रेम के गीत और कीर्तन का सामूहिक गान भी हुआ करता था। स्कूल की छुट्टी होते ही बारिश में भीगते-भागते बकुलेश और उसके दोस्त भी दत्त मन्दिर में पहुँच जाया करते थे। कीर्तन और देश-प्रेम गान में सबको बहुत मजा आता था। खासकर जब वे गाते- ‘दूर हटो ए चीनी दुश्मन, हिन्दुस्तान हमारा है..’  कभी-कभी जल्दी पहुँच जाते तो बुआ को कथा सुनाते भी देख लेते। वे इतने भावुक होकर अभिनय के साथ बोलते थे कि न सिर्फ उनकी बल्कि श्रोताओं, श्रद्धालुओं की आँखों से भी आँसुओं की झड़ी लग जाती थी। प्रंगानुसार उनकी प्रस्तुति होती थी। बाहर बारिश होती थी और भीतर बुआ संवेदनाओं की बारिश करवा दिया करते थे। सब कुछ भीग भीग जाता था।
बच्चों का लालच तो वस्तुत: आखिर में वितरित किया जानेवाला प्रसाद होता था। अद्भुत स्वादवाले उस विशेष प्रसाद को गोपाल काळा’ कहते थे। जुवार की धानी को दही में मथ कर वह बनाया जाता था, जिसमें नमक, हरी मिर्च, अदरख व हरे धनिए का स्वाद समाहित होता था। दोना भर कर मिलने वाले इस प्रसाद के जायके का स्वाद आज भी बकुलेशजी की जबान पर कायम है।

अब तो वसुधा बरसात होते ही अलग-अलग तरह की पकौडियाँ परोसती रहती है लेकिन उनका   मन स्मृतियों की बारिश के बीच बचपन के उस गोपाल काळा की ख्वाहिश लिए लगातार अन्दर से भीगता रहता है।

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टेबल टेनिस का बैट 

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बच्चों, आज से आप लोगों का यह 21 दिवसीय टेबल टेनिस प्रशिक्षण शिविर शुरू हो रहा है। इस केम्प की खास बात यह है कि बस्तियों में रहने वाले ज्यादातर बच्चों ने खेल का असली टेबल और सही बैट को देखा तक नहीं है, खेलना तो बहुत दूर की बात है।'  प्रदेश टेबल टेनिस संघ के अध्यक्ष सोनी जी शिविर के औपचारिक शुभारंभ समारोह  में बच्चों को संबोधित कर रहे थे।
 
कोई तीन साल पहले आनन्द बाबू ने ही जिला टेबल टेनिस संघ की बैठक में तन्गबस्ती के बच्चों के लिए प्रशिक्षण का सुझाव रखा था. टेबल टेनिस संघ द्वारा शहर के कई क्षेत्रों में प्रति वर्ष समर केम्प लगाकर मध्यम और संपन्न वर्ग के बच्चों को प्रशिक्षण दिया ही जाता था.  उनका कहना था कि तंगबस्ती के निर्धन बच्चों के लिए भी ऐसे प्रयास होना चाहिए। यह सुझाव इतना महत्वपूर्ण, तर्कपूर्ण और नैतिक था कि इसके अस्वीकार की तो कोई गुंजाइश ही थी। उसी वर्ष से जिला टेबल टेनिस संघ ने समाजसेवा प्रकोष्ठ के साथ मिलकर तंगबस्ती के बच्चों के लिए भी इसकी शुरुआत कर दी थी। यह भी बहुत बढ़िया बात थी कि नियमित व्यक्तित्व विकास शिविर के तुरंत बाद इक्कीस दिवसीय खेल प्रशिक्षण शिविर शुरू कर दिए जाते थे। इससे बच्चों की रूचि लगातार बनी रहती थी.

सोनी जी आगे बोल रहे थे 'जो बच्चे इस शिविर में श्रेष्ठ साबित होंगे उनमें से पांच बच्चों को साल भर जिला टेबल टेनिस संघ निशुल्क गहन प्रशिक्षण देगा और जिला टीम में चयनित भी होने का अवसर मिलेगा।' उनके घोषणा  करते ही बच्चों में उत्साह की लहर दौड़ गई और तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल गूंज उठा।

तीन साल पूर्व तंगबस्ती के बच्चों के खेल शिविर में से भी पांच बच्चों का गहन प्रशिक्षण के लिए चयन हुआ था।  निशुल्क यूनिफॉर्म, खेल सामग्री और प्रशिक्षण सुविधा के साथ खेल प्रशाल जैसे सुसज्जित और भव्य इंडोर स्टेडियम में साल भर अभ्यास के बाद होनहार बिरवान पंकज चौरसिया को जिला टीम में खेलने का अवसर भी मिला था।

पंकज के पिता मिल एरिया श्रमिक क्षेत्र में पान की दूकान चलाते थे. बनारस उत्तर प्रदेश से पंकज के पडदादा इंदौर की कपड़ा मिल में कामकाज की तलाश में आये थे. कुशल कारीगर तो वे थे ही साथ ही बहुत अच्छे मूर्तिकार भी थे. इंदौर के प्रसिद्द गणेश विसर्जन समारोह के चल समारोह में उनकी बनाई झाँकियों को हमेशा पुरस्कार मिलते थे. कुछ वर्षों पूर्व देश में आर्थिक नीतियाँ कुछ ऐसी कि कपड़ा मिलें बंद हो गईं, कपास उगाना किसानों ने कम कर दिया. सिंथेटिक का ज़माना आया तो जीवन भी रासायनिक होता गया. मिलों के सायरन मौन हो गए, कभी अपने सौन्दर्य पर इतराती कपड़ा मिलों की चिमनियाँ ध्वस्त होकर मिट्टी में मिलती गईं.. गिरवी रखी जमीनों को  बैंकों ने अपने कब्जे में ले लिया.. उत्पादन के आंकड़े सिकुड़ते गए.. कोर्ट प्रकरणों का आंकड़ा बड़े से और बड़ा होता गया. पंकज के पिता को परिवार का पेट भरने के लिए अंततः पुश्तैनी धंधा अपनाने के लिए विवश होना पडा...
हुनरमंद चौरसिया परिवार के इतिहास और उसके दुखों से नई पीड़ी अनभिज्ञ थी. वास्तविकता तो यह थी कि ‘फिकर नॉट पान भण्डार’ के प्रोप्राइटर चौरसिया बाबू का प्रतिभावान बेटा पंकज आज खेल शिविर में प्रशिक्षक की भूमिका में शामिल होकर सम्मानित महसूस कर रहा था।

कार्यक्रम का संचालन कर रहे पांडेयजी ने जैसे ही पंकज की उपलब्धियों के बारे में बताया, आनन्द बाबू ने अपने स्थान पर खड़े होकर फूलों का हार पंकज के गले में डाल दिया।  बकुलेशजी की आंखें भर आईं थीं। साधारण परिवार में पैदा होकर छोटी छोटी सफलताओं की सीढ़ियां चढ़ने में कितनी खुशी होती है यह वे बहुत अच्छे से समझ सकते थे। अतिथियों ने दीप प्रज्ज्वलित करने के बाद थोड़ा –सा टेबल टेनिस खेलकर केम्प का शुभारंभ कर दिया था। आभार प्रदर्शन की जिम्मेदारी आज बकुलेशजी के पास थी। 

उधर पंकज चौरसिया बच्चों को टेबल टेनिस के बैट को ठीक से पकड़ना और कलाई के मूवमेंट के बारे में समझाने में व्यस्त हो गया।



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चेन्नई टू हाँकाँग

बैंक अधिकारियों के संगठन का अखिल भारतीय अधिवेशन इस बार चेन्नई में होने वाला था। बैंककर्मियों की समस्याओं के अलावा ग्लोबलाइजेशन और उदारीकरण के बाद आई आर्थिक नीतियों को लेकर भी गंभीरता से चर्चाएं होना प्रस्तावित था। एक दो  व्याख्यान आनन्द बाबू को भी बैंकों के विलय के प्रयासों और पब्लिक सेक्टर बैंकों के निजीकरण के दुष्प्रभावों  के संदर्भ में देने थे। 

'मालवा बैंक' के कर्मचारी अब तक सेवानिवृति के बाद पेंशन योजना में शामिल नहीं किये गए थे। 'भारतीय बैंक' में पेंशन और भविष्य निधि दोनों सुविधाएं उपलब्ध थीं, जबकि उसी के  नियम कायदों पर इस सहयोगी बैंक को भी चलना होता था। आनन्द बाबू के नेतृत्व में पेंशन सुविधा की मांग को लेकर लगातार धरना, प्रदर्शन ज्ञापन आदि हो ही रहे थे। इस मुद्दे को भी अखिल भारतीय सम्मेलन में प्रमुखता से रखा जाना था।

जिंदलजी और आनन्द बाबू इस प्रयास में थे कि मालवा बैंक की पेंशन सुविधा की मांग को लेकर सारे बैंककर्मी संगठन एकजुट होकर उनका साथ दें।
उनका तो मानना था कि इस लड़ाई को उन सभी बैंकों के कर्मचारियों के लिए व्यापकता से लड़ा जाना चाहिए जिनमें यह सुविधा अब तक उपलब्ध नहीं है।

आनंद बाबू से पहले जिंदलजी अपने साथियों के साथ चेन्नई के लिए एक दिन पूर्व रवाना हो चुके थे। आनन्द बाबू की इधर अनुकंपा नियुक्ति के संदर्भ में एक अधिकारी के प्रकरण में प्रबंध निदेशक से बातचीत की तारीख तय थी। वे फ्लाइट से अगले दिन निकले।

चेन्नई एयरपोर्ट पर लगेज बेल्ट पर अपने सूटकेस का इंतजार कर रहे थे आनन्द बाबू। तभी अचानक एक युवक ने आकर उनके पैरों को छू लिया। 
'नमस्कार सर! पहचाना आपने मुझे?' 
आनन्द बाबू अचरज में थे, यहां इतनी दूर दक्षिण भारत के चेन्नई जैसे शहर में हिंदी में बातचीत करने वाला यह कौन व्यक्ति होगा ? जो ठेठ मालवी अंदाज में चरण स्पर्श निसंकोच कर रहा है।
'सर, मैं पंकज चौरसिया, आपके शिविर का विद्यार्थी।

आनन्द बाबू ने पुनः युवक को ऊपर से नीचे तक गौर से देखा। अरे यह तो सचमुच वही है। शिविर से निकला टेबल टेनिस का होनहार खिलाड़ी। 

'अरे, तुम यहाँ कैसे?' आनन्द बाबू ने उसे पहचान लिया था। आनन्द बाबू का ध्यान अब इस ओर गया कि युवक ने एक अंतरराष्ट्रीय एयर लाइंस के पायलट की यूनिफॉर्म पहन रखी थी।

'सर, टेबल टेनिस के प्रशिक्षण के साथ साथ मैं अपनी पढ़ाई भी करता रहा , फिर एक दिन जब आपने कैरियर मार्गदर्शक डॉ भंडारी की क्लास लगाई थी तो वहीं से मैंने विमान पायलट बनने का लक्ष्य तय कर लिया। खूब तैयारी की, परीक्षाएं दीं, पायलट का प्रशिक्षण लिया। अब सर आपकी कृपा से जूनियर पायलट हूँ और थोड़ी देर में विमान को हाँकाँग
उड़ाकर ले जाऊंगा।'

पंकज जैसे सब कुछ एक साथ कह देना चाहता था। पहले भी शिविरों में वह खूब बोलता रहता था जल्दी-जल्दी। कई बार तो उसके बोलने पर रोक लगानी पड़ती थी।

'सर, टेबल टेनिस के मेरे एक कोच मुझसे बहुत स्नेह रखते थे। उनके खुद के बच्चे लंदन में रहते थे। मुझे उन्होंने पुत्रवत संभाल लिया। पिताजी को भी कोई आपत्ति नहीं थी, वे उनकी देखभाल आखिरी तक करते रहे। पिछले महीने उनका निधन हो गया सर। लंदन से उनकी बेटी आई थी. अंतिम संस्कार के बाद हिसाब किताब करके पति के साथ वापिस लौट गईं।'

आनन्द बाबू से कुछ बोला नहीं जा रहा था। तन्गबस्ती के एक गरीब बालक को आसमान की ऊंचाइयों को छूते हुए वे अपने सामने देख पा रहे थे.. अपने कार्यों के सुखद परिणामों से खुश होने से कौन किसे रोक पाया है.. पंकज के करीब आये और उसे अपनी बाहों में भर लिया। आंसू की बूंदों ने युवा पायलट की वर्दी पर स्नेह के कुछ गीले निशान बना दिये थे। लेकिन वे जानते थे भीगे हुए मन का गीलापन इतनी जल्दी नहीं मिट सकता था।
 
टैक्सी वाला एक तख्ती लिए उनका इंतजार करता दिखाई दिया-' वेलकम मिस्टर आनन्द खरे'
पंकज के कंधे को अपने दाहिने हाथ से थपथपाते हुए आनन्द बाबू टैक्सी की ओर बढ़ गए।

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