Tuesday, July 30, 2019

बालकथा : मीना की परीक्षा


बालकथा
मीना की परीक्षा
ब्रजेश कानूनगो

एक थी मीना. उसके पिता किसी दुर्घटना के शिकार हो गए थे. मीना को अपनी मां का प्यार ही मिला. उसकी मां घर पर अपने मोहल्ले वालों के कपड़े सिलती तथा अपना और मीना का खर्च चलाती.

मीना की मां उसे अच्छी अच्छी कहानियां सुनाती. यही कारण था कि मीना में अच्छी आदतें देखने को मिलती. वह हमेशा सच बोलती थी, मां की बातों का पालन करती थी, दूसरों के लिए हमेशा दया का भाव रखती थी. पढ़ने में वह हमेशा आगे रही. परीक्षाओं में अपनी कक्षा में वह दूसरे अथवा तीसरे नंबर पर ही रहती थी. ऐसी स्थिति कभी नहीं आने देती कि उसे कक्षा में बेंच पर खड़ी होकर अपमानित होना पड़े.

स्कूल में मीना का एक पीरियड कटाई सिलाई बुनाई कला का भी होता था. मीना घर पर अपनी मां को सिलाई करते देखती थी. उसे भी सिलाई में रुचि थी. माँ उसे बचे हुए कपड़ों के टुकड़े जोड़ जोड़ कर बनाया गया कपड़ा सिलाई सीखने के लिए स्कूल ले जाने को देती थी. कक्षा में दूसरे बच्चे मीना के कपड़े को देखकर हंसते लेकिन मीना को बुरा नहीं लगता. वह  जानती थी कि उसकी मां रोज रोज नया कपड़ा बाजार से खरीदकर नहीं दे सकती. वह माँ के द्वारा बनाए टुकड़े दार कपड़े से ही अच्छी से अच्छी सिलाई करने की कोशिश करती.

परीक्षाओं के दिन आए. सिलाई की परीक्षा के पहले सभी बच्चों को बता दिया गया कि किसे क्या ड्रेस बनाना है. सभी बच्चों को कपड़े का इंतजाम अपने अपने घर से ही करना था. मीना ने अपनी मां को बताया उसे परीक्षा में फ्रॉक बनाना है, वह उसके लिए कपड़ा तैयार कर दे, लेकिन मीना की मां को मालूम था कि अगर मीना परीक्षा में भी जुड़े हुए कपड़ों से ड्रेस बनाएगी तो उसे नंबर बहुत कम मिलेंगे. इसलिए मीना की मां ने बाजार से नया कपड़ा खरीदकर मीना को दिया.

सिलाई की परीक्षा शुरू हो गई थी लेकिन मीना स्कूल नहीं पहुंची थी. तभी मीना लगभग दौड़ती हुई आई और टीचर से सुई धागा और कैंची मांगने लगी. टीचर मीना को क्रोध से देखते हुए बोली ‘तुम्हे आज ही देर से आना था, जानती नहीं आज परीक्षा का दिन है, चलो जल्दी करो और सिलाई शुरू करो.’  मीना रुआंसी हो गई.

वह धीरे धीरे टीचर से कहने लगी ‘मैडम क्या मुझे फ्रॉक की बजाय रुमाल बनाने का नहीं कह सकती.’
टीचर का क्रोध सर पर पहुंच गया. वह बोलीं ‘एक तो परीक्षा में देर से आ रही हो, ऊपर से आसान सा रुमाल बनाने को कह रही हो, क्या फ्राक बनाना कठिन लग रहा है?’
‘नहीं नहीं मैडम, ऐसा नहीं है, मेरे पास कपड़ा कम है, उसका सिर्फ रुमाल ही बन सकता है.’ मीना ने कहा तो टीचर कहने लगी- ‘जब तुम्हें पहले ही बता दिया गया था कि परीक्षा में फ्रॉक बनाना है फिर कपड़ा कम क्यों लाई. उसी दिन क्यों नहीं बताया कि कपड़ा नहीं ला सकती हो, हम स्कूल से दिलवा देते.’  
‘नहीं कपड़ा तो मैं पूरा लाई थी, पर मैडम, जब मैं स्कूल के लिए आ रही थी, रास्ते में एक बूढ़े बाबा को एक साइकिल वाले ने जोर से टक्कर मार दी और उनके पैर से खून बहने लगा. साइकिल वाला तो तुरंत साइकिल उठाकर भाग गया. मुझसे बूढ़े बाबा तकलीफ देखी नहीं गई. परीक्षा के लिए लाया कपड़ा फाड़कर मैंने उनके पैर में बांध दिया. जब तक उनके घर से उनके परिजन नहीं पहुँचे मैं उनके पास ही बैठी रही. इसलिए मुझे स्कूल आने में देर हो गई. यदि आप मुझे फ्राक बनाने का ही कहेंगीं तो मैं फेल हो जाउंगी, आप मुझे रुमाल ही बनाने दीजिए ना मैडम.’  मीना की आंखों में आंसू आ गए.

मीना की बात सुनकर टीचर ने उसे अपने गले लगा लिया. उन्हें अपनी गलती का एहसास हो गया था. उन्होंने मीना को निरर्थक ही डांटा था. वह तो बिना परीक्षा दिए ही पास हो गई थी.

ब्रजेश कानूनगो  


Saturday, July 27, 2019

बालकथा : फूल शुभकामनाओं के

बालकथा 
फूल शुभकामनाओं के
ब्रजेश कानूनगो

पिंकी अपने नए घर में आकर बहुत खुश थी. पिछला घर इतना छोटा था कि न तो वहां वह भली प्रकार खेल ही पाती थी और ना ही पौधे लगाने के लिए खुली जगह थी. नए घर में उसे दोनों ही सुविधाएं मिल गई थी.

पिंकी के पापा नर्सरी से बहुत से पौधे लाए जिनमें गुलाब के पौधे भी थे. पिंकी ने उन्हें बड़े प्यार से अपनी बगिया में लगाया. वह रोज फव्वारे से पौधों को सींचती और हर नई निकलने वाली पत्ती को देखती और खुश हो जाती. उसे कलियों  के आने का इंतजार रहता. एक दिन अचानक उसने गुलाब के पौधे में दो नयी नयी ताजा कलियां देखी तो वह खुशी से दौड़ती अपनी मम्मी को बुला लाई. उसकी मम्मी को पिंकी की मेहनत के फूल खिलते देख बहुत खुशी हुई.

अगले दिन कलियां खिल कर गुलाब के फूलों में बदल गई थी. स्कूल पहुंचकर वह दिन भर अपनी सहेलियों से अपने घर खिले गुलाब के फूलों की ही चर्चा करती रही. वह शाम को घर लौट कर घर में खिले पहले फूलों को अपने पापा को भेंट कर रोमांचित कर देना चाहती थी. लेकिन घर पहुंचते ही उसे भारी झटका लगा. फूल अपने स्थान पर नहीं थे. वह रुआंसी हो गयी. उसने सोचा भी नहीं था कि फूलों की इस तरह चोरी हो जाएगी. 

अगली सुबह फिर बगिया में कुछ गुलाब खिल गए थे. पिंकी का चेहरा भी उन्हें देख कर खिल उठा. लेकिन शाम को जब वह स्कूल से घर लौटी, फूल फिर गायब थे. वह फूलों की रोज-रोज होने वाली चोरी से परेशान हो उठी.
अगले दिन रविवार था. स्कूल की छुट्टी होने के कारण पिंकी ने तय कर लिया कि आज चुपके चुपके वह अपने फूलों पर नजर रखेगी और देखेगी कि गुलाबों की चोरी आखिर कौन करता है? सुबह से ही उसने अपना खेलना पढ़ना आदि बगिया के आसपास ही जारी रखा. बरामदे से हर आने-जाने वाले पर अपनी निगाह रखती रही.

कमलाबाई पिंकी के घर रोज काम करने आती थी. लेकिन चार-पांच दिनों से उसकी जगह उसका दस-बारह  साल का लड़का राजू घर का छोटा-मोटा काम निपटाने आ जाया करता. उस दिन भी राजू आया था. उसने पिंकी के घर का गेहूं पिसवाया और बाजार से सब्जी ला कर दी. जब काम समाप्त करके वह घर लौटने लगा तब उसने चुपके से गुलाब के फूल पौधों से तोड़ लिए.

पिंकी यह सब देख रही थी. उसकी इच्छा हुई कि वह जोर जोर से चिल्लाए – ‘चोर चोर’, लेकिन कुछ सोचकर उसने ऐसा नहीं किया. वह जानना चाहती थी कि राजू फूलों का आखिर करता क्या है? वह राजू के पीछे-पीछे चल पड़ी. राजू का घर कुछ ही दूर था. राजू जब घर पहुंचा तो पिंकी भी उसके पीछे पीछे होकर दरवाजे की ओट से अंदर देखने लगी.

एक चारपाई पर राजू की मां कमलाबाई सोई हुई थी. एक तिपाही पर एक बोतल में कुछ मुरझाए हुए से फूल सजे थे. राजू ने बोतल से बासी फूल निकालकर उनकी जगह ताजे फूलों को सजा दिया. कमलाबाई ने राजू को प्यार से अपनी बाहों में भर लिया.

तभी कमलाबाई की निगाह दरवाजे की ओट में छिपी पिंकी पर पड़ी. उन्होंने पिंकी को अपने पास बुलाया. पिंकी तो पहले ही गुस्से से भरी पड़ी थी, वह बोल उठी – ‘यह गुलाब हमारे हैं.. राजू ने इन्हें चुराया है.’ कमला बाई ने राजू की ओर देखा. राजू रो पड़ा , बोला ‘अम्मा गुरु जी ने कहा था फूलों को बीमार व्यक्ति के पास सजाने से बीमारी जल्दी भाग जाती है इसलिए मैंने......’ उसने सिसकते हुए अपना चेहरा कंबल में छुपा लिया. कमला बाई ने राजू को समझाया- ‘बेटा फूलों के कारण बीमारी तो जरूर भाग जाती है मगर फूल चोरी के नहीं होना चाहिए, देखो तभी तो मैं ज्यों की त्यों तीन  दिनों से ऐसी ही बीमार पड़ी हुई हूँ.’

अगले दिन जब सुबह राजू पिंकी के यहां काम करने आया तो पिंकी ने एक सुंदर सा गुलदस्ता बनाकर कमलाबाई के लिए उसे दिया. राजू ने गुलदस्ता अपने हाथों में लिया तो उसकी आंखें भर आईं. अब उसकी मां जल्दी स्वस्थ हो जाएगी, क्योंकि फूल चोरी के नहीं सच्ची शुभकामनाओं के थे.

पिंकी को ओस की बूंद पर सूरज के प्रकाश के पडने से बगिया के पौधों पर सैकड़ों सतरंगे फूल खिले नजर आने लगे.

ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रीजेंसी, चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर 452018


बालकथा : रावण दहन

बालकथा
रावण दहन
ब्रजेश कानूनगो

हर साल की तरह मोहल्ले के बच्चों ने फिर से तय किया कि दशहरे पर रावण दहन किया जाए. राजू, दीपक, बबलू, चिंटू, स्माइल, बलवीर, दीपा, भावना, सब बच्चे जमा हुए. रावण दहन की रुपरेखा तैयार हुई. यह भी तय किया गया कि हर बच्चा अपने जेब खर्च में से कुछ बचा कर रावण दहन समिति को देगा तथा कुछ धन मोहल्ले की  दुकानों से चंदा करके इकट्ठा किया जाएगा.

चुन्नू के बाडे में शाम को रोज सब बच्चे एकत्र होने लगे. देखते ही देखते रावण का पुतला आकार लेने लगा. दो लंबे बांसों को अंग्रेजी के अक्षर ‘ए’ की तरह बांधा गया. बीच में टाट के बोरे को बांधकर रावण का पेट बनाया गया, जिसमें मोहल्ले भर का कचरा, कागज, कपड़ों की चिंदियां आदि समाते चले गए. एक  बाँस आड़ा बांधकर उसे हाथों की शक्ल दी गई और टाट लपेट कर उसमें घास भर दी गई. हां, आतिशबाजी और पटाखे रखने के लिए पर्याप्त जगह रखी गई ताकि चंदा इकट्ठा होने पर पटाखे खरीद कर उसमें लगाए जा सकें.
इस्माइल एक अच्छा चित्रकार था उसने एक मटके पर रावण का बहुत ही शानदार चेहरा बनाया. बड़ी बड़ी मूछें, गोल-गोल डरावनी सी आंखें. बाकी के नौ  सिर एक गत्ते को काटकर बनाए गए और उन्हें मटके के आसपास बांधकर रावण की गर्दन से जोड़ दिया गया.

रावण निर्माण के बाद बच्चे चंदा अभियान में जुट गए और देखते ही देखते हैं उन्होंने हजार रुपए जमा कर लिए जो मोहल्ले के रावण का पेट खाने के लिए पर्याप्त थे. पटाखे खरीद कर उन्हें रावण के पुतले में लगाया गया. दोनों हाथों में दो राकेट पकड़ाए और नाभि में एक शक्तिशाली ‘एटम बम’ रखा. नाभि से ही एक सुतली निकाली गई जो लगभग तीन मीटर लंबी रही होगी. रावण दहन के समय इसी सुतली में आग लगाने की योजना थी.
और आ पहुंचा विजयादशमी का दिन. बच्चों की सप्ताह भर की मेहनत रावण का आदम का पुतला मोहल्ले के लोगों के सामने चौराहे पर खड़ा हुआ था. लेकिन इधर बच्चों का दल किसी बहस में उलझा हुआ था वह तय नहीं कर पा रहे थे कि रावण के पुतले का अग्नि संस्कार कौन करेगा? तभी बलवीर ने सलाह दी कि मोहल्ले के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति से रावण के पुतले में आग लगवाई जाए.

भावना के दादा जी यानी प्रधान जी एक रिटायर्ड अध्यापक थे और वही सबसे बुजुर्ग भी थे. बच्चों का दल उनके पास प्रार्थना करने गया कि शाम को सात बजे वे अपने करकमलों से रावण दहन की रस्म  पूरी करें. प्रधान जी बच्चों की सक्रियता एवं कार्यक्रम से बहुत खुश हुए.  उन्होंने बच्चों से पूछा कि क्या वह जानते हैं रावण क्या है? और उसे क्यों जलाया जाता है? बच्चों ने पढ़ी हुई पौराणिक कथा के आधार पर रावण का परिचय दिया तो प्रधान जी बोले- ‘नहीं रावण तो एक प्रतीक मात्र है बुराइयों का, जो हम सब में विद्यमान है उसके दस सर दस बुराइयां हैं. एक सिर काटा जाए तो वहां दूसरा निकल आता है. अकेले-अकेले बुराइयों को नष्ट नहीं किया जा सकता. इन सबके प्राण रावण की ‘नाभि’ में होते हैं अगर नाभि को लक्ष्य किया जाए तो ही रावण पर विजय प्राप्त की जा सकती है. और  सारी बुराइयां एक साथ नष्ट की जा सकती है, नाभि का लक्ष्य सिर्फ ‘संकल्प’ रूपी बाण से ही किया जा सकता है. रावण दहन हमारे अंदर के रावण को नष्ट करने के संकल्प का वार्षिक नवीनीकरण है. जानते हो रावण के दस सिर क्या हैं ?  झूठ, क्रोध, घृणा, हिंसा, आलस्य, ईर्ष्या, अनादर कठोरता, देशद्रोह, और कुविचार, अगर तुम रावण दहन से पूर्व अपने अंदर बैठे रावण को खत्म करने का संकल्प लो तो ही मैं तुम्हारे रावण के पुतले का दहन करूंगा.’
सभी बच्चे सभी बच्चे प्रधान जी की विद्वता से पूर्ण तरह परिचित थे. उनका सम्मान करते थे. उन्होंने प्रधान जी को आश्वस्त किया कि वे अपने अंदर रावण के किसी भी सिर को सर नहीं उठाने देंगे.

शाम को चौराहा मोहल्ले के बड़े बूढ़ों और बच्चों से भरा था. रावण की नाभि से निकली सुतली तीन  मीटर दूर तक लाई गई थी. प्रधान जी ने ज्यों ही अग्नि बताई, सुतली सुलगती हुई रावण की नाभि की ओर बढ़ने लगी, एक धमाका हुआ और सारा पुतला धू-धू कर के जल उठा. पटाखों की लड़ें तड़ तड़ करने लगी...तभी एक रॉकेट सुलगा और आकाश की ओर उड़ चला और फिर दूसरा... आकाश में सितारे बिखर गए.
रावण का पुतला जल गया था लेकिन बुराइयों पर विजय का बच्चों का संकल्प फिर नया हो गया था.

ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रीजेंसी, चमेली पार्क कनाडिया रोड, इंदौर-452018


बालकथा: मित्रता के फूल

बाल कथा
मित्रता के फूल
ब्रजेश कानूनगो

अमित के पापा ने जब नए घर में रहना शुरू किया तो अमित के सारे पुराने साथी छूट गए. नई  जगह वह अपने आप को बेहद अकेला महसूस करने लगा. घर में भी वह सबसे छोटा था. नया मकान बिल्कुल नई बनी कॉलोनी में था, इसलिए आस-पड़ोस के क्वार्टर भी खाली पड़े थे.

छुट्टियों में खेलता भी तो भला किसके साथ?  वह दिन भर बेचैन रहता और शाम का इंतजार करता ताकि उसके पापा जब दफ्तर से लौटे हैं तो वह उनके साथ कुछ देर बैदामिन्टन खेल सके.

अमित की मम्मी ने जब अपने छोटे से आंगन में कुछ पौधे लगाए तो अमित खुश हो गया. वह सुबह शाम पौधों को पानी पिलाता, उनकी देखभाल करने में उसका मन लगा रहता और रोज फूलों के खिलने का इंतजार करता.
पौधे जब बड़े हुए तो एक  दिन कुछ आवारा पशु उसके आंगन में प्रवेश कर गए और हरे हरे पौधों को चर गए. अमित को बहुत दुख हुआ. उस के आंगन के आस-पास कांटेदार तारों की बागड नहीं होने से पौधों के कुछ बड़े होते ही आवारा पशुओं उन्हें नष्ट कर डालते.

उन्हीं दिनों अमित के पड़ोस वाले क्वाटर में एक कुत्तिया ने चार सलोने पिल्लों को जन्म दिया. अमित को देख कर बहुत खुशी हुई. वह उन्हें गोद में उठा लेता और प्यार करता. अपने हिस्से के दूध में से वह आधा उन्हें पिला देता.
उनमें से एक पिल्ला तो उसे बहुत ही प्यारा लगता था. काले बालों वाले गबरु पिल्ले के माथे पर सफेद तिलक था. पिल्ले  के थोड़ा बड़ा होने पर अमित अपनी मम्मी से पूछ कर उसे घर ले आया. अमित का पूरा दिन अब पिल्ले के साथ खेलने में उसे दुलारने में निकल जाता. वह उसे नहलाता, कंघी करता, बगीचे में घूमता. दोपहर को अपने कमरे में बैठा कर उसे ट्रांजिस्टर सुनाता. शाम को उसके साथ गेम खेलता. और रात को दोनों टीवी  देखते. अमित ने उसका नाम भी रख दिया बब्बर.

जितना अमित बब्बर को प्यार करता, उतना ही बब्बर भी अमित को चाहता था. दोनों एक दूसरे के पक्के मित्र बन गए. एक दिन जब अमित नहा रहा था, उसने बब्बर के भौंकने की आवाज सुनी. वह फौरन बाथरूम से निकला और दौड़कर आंगन में आ गया. उसने देखा बब्बर आवारा पशुओं पर भौंक-भौंक कर उन्हें पौधों से दूर भगा रहा था. अमित और बब्बर ने पशुओं को खदेड़ कर बाहर निकाल दिया.
अब अमित प्रतिदिन अपनी बगिया के पौधों को सींचता और बब्बर उनकी रक्षा करता. कुछ ही दिनों में बगिया में अमित और बब्बर की मित्रता के सतरंगे फूल खिल उठे, जहां रंग बिरंगी तितलियां आती थी, भौरों का मधुर गायन होता था और फूलों की सुगंध मन को प्रसन्न कर देती थी.

ब्रजेश कानूनगो

बालकथा : लोहे के पंजे वाला बच्चा


बालकथा
लोहे के पंजे वाला बच्चा
ब्रजेश कानूनगो
 
चुन्नू दौड़ता हुआ अपने घर में घुसा उसके एक पैर के पंजे से खून बह रहा थाउसको पता ही नहीं चला कि उसके पैर में चोट लगी है और खून बह कर फर्श को भी लाल कर रहा है  

चुन्नू की मम्मी ने जैसे ही फर्ज की ओर देखा वह चौंक पड़ी। 'इसका मतलब चुन्नू को आज भी चोट लगी है'। वह बड़बड़ाती हुई चुन्नू के कमरे में पहुंची। चुन्नू जल्दी-जल्दी अलमारी से गेंद और बल्ला निकाल रहा था। 

'चुन्नू तुम्हारे पैर में चोट लगी है और तुम्हें पता ही नहीं है।' चुन्नू की मम्मी ने घबराकर चुन्नू से कहा। 
'अरे!' आश्चर्य से चुन्नू अपना पंजा देखने लगा। लाल लाल खून देखकर उसे रोना आ गया। 

चुन्नू की मम्मी ने चुन्नू के पांव को देखा। तलवे में कांच चुभने का स्पष्ट निशान था और खून निकल रहा था। चुन्नू की मम्मी ने तुरंत दवा से उसका घाव धोया और मरहमपट्टी कर दी। 

चुन्नू को घर से बाहर खेलने जाने से मना कर दिया गया। चुन्नू को जब तब पैरों में चोट लगती रहती थी और उसकी मम्मी उसे कईबार समझाकर परेशान हो चुकी थी कि खेलते घूमते समय कैनवास के जूते पहनकर या स्लीपर पैरों में डालकर बाहर निकला करे। लेकिन चुन्नू पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। वह खेलने की जल्दी में मम्मी की बात पर ध्यान नहीं देता और नंगे पैर मैदान की ओर दौड़ जाता। नतीजा यह होता कि अक्सर कांच के टुकड़े या लोहे की कतरन उसके पैरों को जख्मी बना देते। 

शाम को चुन्नू की मौसी लखनऊ से आई। चुन्नू को अपनी मौसी से विशेष लगाव था। मौसी बहुत बातूनी थी और रात को चुन्नू को अच्छी कहानियां सुनाया करती थी। 

चुन्नू के पैर में पट्टी बंधी देखकर उन्होंने चुन्नू की मम्मी से चोट का कारण पूछा।  मम्मी ने सारी बात मौसी को बताई और कहा कि वह हर तरह से चुन्नू को समझाने में असफल रही हैं कि बगैर जूते पहने बाहर नहीं घूमा करे। 

रात को जब वह मौसी के पास कहानी सुनने आया तो उसकी मौसी ने कहा कि आज वे एक ऐसे लड़के की कहानी सुनाएंगीं जिसके पैर अपनी गलतियों के कारण लोहे के बन गए थे। चुन्नू आश्चर्य से अपनी मौसी की ओर देखने लगा। 

मौसी ने कहानी सुनाना शुरू की- 'एक लड़का बड़ा शैतान था। अपनी मां की बातों पर अमल नहीं करता था।उसकी मां उसे समझाती की सड़कों पर नंगे पैर ना घूमें मगर वह मां की हिदायत टाल देता। 

नंगे पैर घूमने की वजह से कभी कांच के टुकड़े तो कभी पत्थर या लोहे की कील चुभ जाया करती मगर वह परवाह नहीं करता। कुछ दिनों बाद उसके पैरों में कठोरता आने लगी। धीरे-धीरे कठोरता बढ़ती ही गई। एक दिन उसने महसूस किया कि उसके पैर के पंजे लोहे के बन गए हैं। 

चुन्नू बड़े ध्यान से कहानी सुन रहा था। कहानी उसको अपनी लग रही थी। इसलिए उसकी उत्सुकता भी बहुत बढ़ गई थी। वह सोच रहा था कि काश उसके पैर भी लोहे के हो जाएं तो उसे किसी भी बात की परवाह न रहे। जूते चप्पल पहनने की जरूरत ही नहीं रहे।

चुन्नू की मौसी ने कहानी आगे बढ़ाई। 'लोहे के पंजे पाकर पहले तो वह लड़का बहुत खुश हुआ मगर धीरे-धीरे उसके लिए परेशानी बढ़ गई। भारी-भरकम पंजे उठाते उठाते उसकी टांगे दुखने लगती। उसके दोस्त उसे लोहे की टांगों वाला दानव बच्चा कहकर चिढ़ाने लगे।

एक दिन उस लड़के के पंजे ऐसे चुंबक के संपर्क में आ गए कि उसके पंजों में भी चुंबकत्व आ गया। अब उसके पंजों के संपर्क में जो भी लोहे की चीज आती वह चिपक जाती। जहां जहां वह जाता लोहे की कीलें, ब्लेड, वगैरह  चिपक कर उसके साथ घिसटती जाती।

मौसी की कहानी अभी इतनी ही हुई थी कि चुन्नू की घबराहट बढ़ने लगी। इसी घबराहट में उसको नींद आ गई। सपने में भी उसे उसी लड़के की कहानी दिखती रही। 

उसे लगा जैसे कहानी वाला लड़का और कोई नहीं स्वयं वही हो। अगर सचमुच ऐसा हो गया तोउसके पैरों में अगर सारे मोहल्ले का कचरा चिपकता रहा तोधीरे-धीरे वह इतना भारी हो जाएगा कि उसका एक कदम भी आगे बढ़ना मुश्किल होगा। 

अचानक वह चिल्ला पड़ा 'नहीं नहीं'। उसकी नींद खुल गई थी।सुबह हो चुकी थी। रसोई घर में मम्मी चाय बना रही थी। वह दौड़ता हुआ मम्मी के पास पहुंचा और बोला 'मम्मी मैं अब कभी नंगे पैर बाहर नहीं निकलूंगा।

चुन्नू की मौसी दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी। उन्होंने बहुत ही बुद्धिमानी से चुन्नू को सबक सिखा दिया था। फिर चुन्नू को कभी नंगे पैर घूमते खेलते नहीं देखा गया।

ब्रजेश कानूनगो


Friday, July 26, 2019

बालकथा : बड़ी बात


बालकथा
बड़ी बात

दीपक के घर का बहुत सा काम सीताबाई करती थी। सीताबाई दीपक के यहां काम करने वाली महरी थी। सीताबाई का एक बेटा भी था, जिसकी उम्र दीपक के बराबर ही थी। उसका नाम चुन्नीलाल था लेकिन सब उसे चुन्नू ही कहते थे। 

चुन्नू के बापू किसी कारखाने में काम करने जाते थे, इसलिए सीताबाई चुन्नू को घर पर अकेला नहीं छोड़ती थी और अपने साथ दीपक के यहां ले जाती थी। 
चुन्नू दीपक को अपने खिलौनों से खेलते देखता, उसकी इच्छा भी होती कि वह भी दीपक के साथ खेले। चुन्नू दीपक के किसी खिलौने को हाथ लगाने लगता तो दीपक चिल्लाकर बोलता 'उसे हाथ मत लगाओ वह मेरा है' 

दीपक को अपनी चीजों से बड़ा लगाव था। वह केवल चुन्नू ही नहीं, किसी भी दोस्त को अपनी चीजों को हाथ नहीं लगाने देता था। 

दीपक की मम्मी ने उसे कई बार समझाने की कोशिश करी थी  कि बार-बार 'मेरी है या मेरा है' कहना अच्छी बात नहीं होती है लेकिन दीपक पर इसका कोई असर नहीं होता था। 

एक दिन जब दीपक के स्कूल की छुट्टी हुई तो उसने देखा कि आकाश में बादल छाए हुए थे। वह तेजी से अपने घर की ओर बढ़ा। अभी वह कुछ दूर ही पहुंचा था कि बरसात शुरू हो गई। वह पानी में भीग गया। 
उसकी कक्षा का ही एक दोस्त प्रकाश उसके पास से गुजरा,उसके पास छाता भी था। दीपक दौड़कर प्रकाश के छाते में आ गया लेकिन प्रकाश ने उसके ऊपर से अपना छाता हटा लिया। और बोला 'ये छाता मेरा है निकलो बाहर' 
दीपक को बहूत बुरा लगा, मगर वह कर भी क्या सकता था। भीग जाने के कारण दीपक को सर्दी लगने लगी। वह कांपने लगा था।उसके दांत बजने लगे थे। 

तभी उसकी निगाह छाते वाले अन्य लड़के पर पड़ी। उस लड़के की छतरी टूटी थी और वह खुद को भी बरसात से बचा नहीं पा रहा था। दीपक ने जैसे ही उस लड़के का चेहरा देखा, उसकी हिम्मत नहीं हुई कि वह उसके छाते के नीचे हो ले। 
वह लड़का और कोई नहीं चुन्नू ही था। चुन्नू ने दीपक को जैसे ही देखा तो तुरंत अपना टूटा छाता उसके ऊपर कर दिया। 

पास ही चुन्नू का घर था वह दीपक को अपने घर ले गया। चुन्नू की माँ सीताबाई उस वक्त घर पर ही थी। दीपक को भीगा देखकर घबरा गई। 
सीताबाई ने दीपक के गीले कपड़े उतारे और चुन्नू के धुले हुए कपड़े उसे पहनाए। दीपक को बहुत अच्छा लगा। उसकी ठंड भी अब कम पड़ गई थी। 

थोड़ी देर में सीताबाई एक गिलास लेकर आई। 'इसमें गरम गरम दूध है, इसे पी लो तुम्हें आराम मिलेगा' सीताबाई बोली।
दीपक को सीताबाई का व्यवहार बहुत अच्छा लग रहा था। उसने दूध का गिलास ले लिया और धीरे धीरे पीने लगा। कुछ समय बाद सीताबाई दीपक को उसके घर तक छोड़ने गई। 

रात को जब दीपक अपने पलंग पर लेटा हुआ था तब उसके नन्हें से दिमाग में कई सवाल चक्कर काट रहे थे। 'अगर चुन्नू  आज अपने छाते में नहीं आने देता तो? अगर चुन्नू अपने सूखे कपड़े उसे ना पहनने देता तो? अगर सीताबाई उसे प्यार करने के बजाय दूर छिटक देती तो ? चुन्नू भी अगर प्रकाश की तरह या खुद उसी की तरह बोलता 'मेरा छाता है, मेरे कपड़े हैं, मेरी मां है तब क्या होता? उसे कितनी परेशानी उठानी पड़ती। मगर चुन्नू ने ऐसा नहीं किया था।

अगले दिन चुन्नू दीपक को गेंद खेलते देख रहा था। तभी दीपक उसके पास आया और बोला 'चुन्नू मैं गेंद से खेल रहा हूँ, तुम साइकिल चलाओ ना। और अपनी साइकिल लाकर चुन्नू को दे दी। 

एक छोटी सी घटना ने दीपक को सच्चा सबक सिखा दिया था कि 'यह तेरा है यह मेरा है' कहने में कोई बड़ी बात नहीं है, बड़ी बात तो तब है जब अपनी चीजें दूसरों के काम आएँ।

ब्रजेश कानूनगो 

Saturday, July 20, 2019

बाल कथा : एकता का अस्पताल

बाल कथा
एकता का अस्पताल
ब्रजेश कानूनगो

एकता का नया घर बहुत सुंदर स्थान पर था। सामने खुला मैदान था और दूर पहाड़ियाँ नजर आती थीं। शाम को जब सूरज पहाड़ियों की ओट में छिपने लगता तो एकता बहुत देर तक प्रकृति के इस सौंदर्य  को निहारती रहती।

सैकड़ों तोते, कबूतर और अन्य पक्षी सांझ ढले रोज पहाड़ियों की ओर जाते तो एकता को उन्हें निहारना बहुत अच्छा लगता था।

एकता के घर के ऊपर से बिजली के तार भी होकर निकलते थे। शाम को जब पक्षी बहुत नीचे से गुजरते तो एक न एक पक्षी रोज ही तारों से टकराकर घायल हो जाता और दम तोड़ देता। एकता को बहुत दुख होता पर वह कर ही क्या सकती थी।

ऐसे ही एक दिन शाम को एकता अपने घर की खिड़की से पक्षियों को उड़ते देख रही थी कि तोते का एक बच्चा बिजली के तारों से टकराकर सड़क पर आ गिरा।

एकता ने देखा वह मरा नहीं था। वह तुरंत दौड़कर सड़क पर आई। तोते के बच्चे पर उसने पानी छिड़का और उठाकर अपने साथ घर में ले गई। तोते के घावों पर उसने मरहम पट्टी की और कमरे के एक कोने में बैठा दिया।

दूसरे दिन उसने अपने पापा से कह कर बाजार से एक पिंजरा मंगवाया और तोते को उसमें बंद कर दिया।

एकता रोज उसे हरी मिर्च खिलाती। बिस्कुट खिलाती। पानी का सिकारा भरकर पिंजरे में रखती।
उसका अकेलापन तोते को पाकर बहुत कुछ कम हो गया था। उसे रोज 'राम-राम' बोलना सिखाने का प्रयास करती।



एक रात जब वह सो रही थी तो अचानक उसे लगा जैसे वह अपने मम्मी पापा से बिछड़ गई है और एक तोते के बच्चे में बदल गई है। किसी शैतान बच्चे ने उसे एक पिंजरे में बंद कर रखा है।

वह घबरा गई ।नींद में ही उसके मुंह से चीख निकल गई। 'मम्मी...' । चीख सुनकर उसके मम्मी पापा भी जाग गए। एकता ने अपना डरावना सपना उन्हें सुनाया।

पापा ने उसे समझाया कि तोते के बच्चे को कैद करके जहां उसे एक दोस्त मिला है वहीं उसके मन में उसे कैद कर लेने का दुख भी सता रहा है। यही कारण है कि उसे ऐसा बुरा सपना दिखाई दिया।

सुबह उठकर एकता ने तोते को पिंजड़े से आजाद कर दिया। अब एकता रोज शाम को खिड़की के खिड़की में बैठकर तोतों को आसमान से गुजरते देखती है। कभी कोई पक्षी तारों से टकराकर गिरता तो उसकी देखभाल और इलाज करती है। स्वस्थ  हो जाने पर पुनः आकाश में स्वच्छंद विचरण करने के लिए आजाद कर देती है। उसका पिंजरा पक्षियों का कैदखाना नहीं बल्कि एक छोटा सा अस्पताल बन गया था जिसकी डॉक्टर  एकता थी।

ब्रजेश कानूनगो