बालकथा
मीना की परीक्षा
ब्रजेश कानूनगो
एक थी मीना. उसके पिता किसी दुर्घटना के शिकार हो
गए थे. मीना को अपनी मां का प्यार ही मिला. उसकी मां घर पर अपने मोहल्ले वालों के
कपड़े सिलती तथा अपना और मीना का खर्च चलाती.
मीना की मां उसे अच्छी अच्छी कहानियां सुनाती.
यही कारण था कि मीना में अच्छी आदतें देखने को मिलती. वह हमेशा सच बोलती थी, मां
की बातों का पालन करती थी, दूसरों के लिए हमेशा दया का भाव रखती थी. पढ़ने में वह
हमेशा आगे रही. परीक्षाओं में अपनी कक्षा में वह दूसरे अथवा तीसरे नंबर पर ही रहती
थी. ऐसी स्थिति कभी नहीं आने देती कि उसे कक्षा में बेंच पर खड़ी होकर अपमानित
होना पड़े.
स्कूल में मीना का एक पीरियड कटाई सिलाई बुनाई
कला का भी होता था. मीना घर पर अपनी मां को सिलाई करते देखती थी. उसे भी सिलाई में
रुचि थी. माँ उसे बचे हुए कपड़ों के टुकड़े जोड़ जोड़ कर बनाया गया कपड़ा सिलाई
सीखने के लिए स्कूल ले जाने को देती थी. कक्षा में दूसरे बच्चे मीना के कपड़े को
देखकर हंसते लेकिन मीना को बुरा नहीं लगता. वह जानती थी कि उसकी मां रोज रोज नया कपड़ा बाजार
से खरीदकर नहीं दे सकती. वह माँ के द्वारा बनाए टुकड़े दार कपड़े से ही अच्छी से
अच्छी सिलाई करने की कोशिश करती.
परीक्षाओं के दिन आए. सिलाई की परीक्षा के पहले
सभी बच्चों को बता दिया गया कि किसे क्या ड्रेस बनाना है. सभी बच्चों को कपड़े का
इंतजाम अपने अपने घर से ही करना था. मीना ने अपनी मां को बताया उसे परीक्षा में
फ्रॉक बनाना है, वह उसके लिए कपड़ा तैयार कर दे, लेकिन मीना की मां को मालूम था कि
अगर मीना परीक्षा में भी जुड़े हुए कपड़ों से ड्रेस बनाएगी तो उसे नंबर बहुत कम
मिलेंगे. इसलिए मीना की मां ने बाजार से नया कपड़ा खरीदकर मीना को दिया.
सिलाई की परीक्षा शुरू हो गई थी लेकिन मीना स्कूल
नहीं पहुंची थी. तभी मीना लगभग दौड़ती हुई आई और टीचर से सुई धागा और कैंची मांगने
लगी. टीचर मीना को क्रोध से देखते हुए बोली ‘तुम्हे आज ही देर से आना था, जानती नहीं
आज परीक्षा का दिन है, चलो जल्दी करो और सिलाई शुरू करो.’ मीना रुआंसी हो गई.
वह धीरे धीरे टीचर से कहने लगी ‘मैडम क्या मुझे
फ्रॉक की बजाय रुमाल बनाने का नहीं कह सकती.’
टीचर का क्रोध सर पर पहुंच गया. वह बोलीं ‘एक तो
परीक्षा में देर से आ रही हो, ऊपर से आसान सा रुमाल बनाने को कह रही हो, क्या फ्राक
बनाना कठिन लग रहा है?’
‘नहीं नहीं मैडम, ऐसा नहीं है, मेरे पास कपड़ा कम
है, उसका सिर्फ रुमाल ही बन सकता है.’ मीना ने कहा तो टीचर कहने लगी- ‘जब तुम्हें
पहले ही बता दिया गया था कि परीक्षा में फ्रॉक बनाना है फिर कपड़ा कम क्यों लाई.
उसी दिन क्यों नहीं बताया कि कपड़ा नहीं ला सकती हो, हम स्कूल से दिलवा देते.’
‘नहीं कपड़ा तो मैं पूरा लाई थी, पर मैडम, जब मैं
स्कूल के लिए आ रही थी, रास्ते में एक बूढ़े बाबा को एक साइकिल वाले ने जोर से
टक्कर मार दी और उनके पैर से खून बहने लगा. साइकिल वाला तो तुरंत साइकिल उठाकर भाग
गया. मुझसे बूढ़े बाबा तकलीफ देखी नहीं गई. परीक्षा के लिए लाया कपड़ा फाड़कर मैंने
उनके पैर में बांध दिया. जब तक उनके घर से उनके परिजन नहीं पहुँचे मैं उनके पास ही
बैठी रही. इसलिए मुझे स्कूल आने में देर हो गई. यदि आप मुझे फ्राक बनाने का ही
कहेंगीं तो मैं फेल हो जाउंगी, आप मुझे रुमाल ही बनाने दीजिए ना मैडम.’ मीना की आंखों में आंसू आ गए.
मीना की बात सुनकर टीचर ने उसे अपने गले लगा लिया.
उन्हें अपनी गलती का एहसास हो गया था. उन्होंने मीना को निरर्थक ही डांटा था. वह तो
बिना परीक्षा दिए ही पास हो गई थी.
ब्रजेश कानूनगो